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अंग्रेजी शासनकाल में चंबा इतना विकसित था की विश्व के बड़े बड़े शहर चंबा के आगे नहीं टिकते थे

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चंबा। रियासती काल में चंबा विकास की दृष्टि से इस कदर विकसित था कि विश्व के कई शहर चंबा के आगे नहीं टिकते थे। भारत में अंग्रेजी शासनकाल के चलते चंबा में इंग्लैंड के प्रारूप को फोलो किया जाता था। रावी नदी के उपर बना पुराना शीतला पुल इसका जीवंत उदाहरण है।

लेकिन आजादी के 70 वर्षों में जिला इस कदर उपेक्षा का शिकार हुआ कि वर्तमान में यह देश के 115 सबसे पिछड़े जिलों में शुमार हो गया है। ये वो जिले हैं जो विकास कार्यों में पूरी तरह से पीछड़े हैं। लेकिन एक समय था जब आजादी से पहले ही जिले में कई विकासात्मक कार्य हो चुके थे।

चंबा शहर देश का दूसरा शहर था जो बिजली से जगमग हुआ। उत्तर भारत का पहला और देश के दूसरा हाइड्रो पावर हाउस चंबा में बना था। 1908 में हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के तत्कालीन शासक भूरी सिंह ने हाइड्रो पावर हाउस (35 किलोवाट-डीसी) का निर्माण करवाकर चंबा को रोशन किया था। इसके पहले 1902 में कर्नाटक के शिवानासमुद्रा में देश का पहला हाइड्रो पावर प्लांट बनाया गया था। भूरी सिंह पावर हाउस साल नदी के किनारे पर बना है।

भूरी सिंह पावर हाउस के सूचना पट्ट पर इस बात का उल्‍लेख है। स्थापना के बाद से ही पावर हाउस में विद्युत उत्पादन का सिलसिला जारी है। पावर हाउस में उत्पादित बिजली की आपूर्ति शहर के विभिन्न हिस्सों में की जाती है। वर्तमान में बिजली बोर्ड ने इस पावर हाउस को आउटसोर्स कर निजी हाथों में सौंप दिया है। हालांकि उत्पादित बिजली की खरीद-फरोख्त बोर्ड के माध्यम से होती है। इस पावर हाउस में रोजाना छह हजार यूनिट विद्युत उत्पादित की जाती है।

जब पहली बार भूरी सिंह हाइड्रो पावर हाउस को बनाया गया था तो उस वक्त इस पर 2.75 लाख रुपये खर्च आया था। फिर 1938 तक इस स्‍टेशन की क्षमता 35 किलोवाट (डीसी) यानी लगभग 47 ब्रेक हॉर्सपावर थी। एक और रोचक बात यह है कि वर्तमान में बना भूरी सिंह पावर हाउस शुरू में यहां से करीब 125 किमी दूरी पर बनाया गया था जिसे 1938 में तत्कालीन शासक राजा शाम सिंह ने यहां शिफ्ट किया था। 1938 में इस स्‍टेशन की क्षमता 100 किलोवाट (डीसी) और बढ़ा दी गई जिससे इसकी कुल क्षमता 250 किलोवाट हो गई।

1938 के बाद चंबा के स्टेट चीफ इंजीनियर गुरूदितामल महाजन इस पावर हाऊस की देखरेख करते रहे। उन्होंने अपने ऑफिस के दस्तावेजों में इस बात का जिक्र किया है कि जब वे चंबा में मैट्रिक के पेपरों की तैयारी कर रहे थे तो बिजली की रोशनी में पढ़ाई की और किसी काम से लाहौर गए तो केरोसिन तेल के दीये की रोशनी में काम करना पड़ा।

1984 में चंबा के स्टेट चीफ इंजीनियर गुरूदिता लाल महाजन के बेटे और एचपीएसईबी के चेयरमैन कैलाश चंद महाजन ने 50 लाख रुपये खर्च कर इसकी क्षमता 250 किलोवाट और बढ़ाई जो कि कुल 450 किलोवाट हो गई। वर्तमान में इसकी क्षमता 450 किलोवाट है।

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