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कुल्लू की इस जगह अनहोनी से पहले ही मिल जाते हैं संकेत, जानिए कैसे

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हिमाचल प्रदेश की देवभूमि कुल्लू में अनहोनी से पूर्व देव कृपा सेपहले ही संकेत मिल जाते हैं, जिन्हें समझकर लोग पहले ही अलर्ट हो जाते हैं। कुल्लू की शांत वादियों में लगभग हर किलोमीटर की दूरी पर किसी न किसी देवी-देवता का स्थान है। इनमें कई जगहें ऐसी हैं जहां नियमों का कड़ाई से पालन करना जरूरी है। इन जगहों पर नियम तोड़े तो किसी न किसी अनिष्ट से साक्षात्कार हो जाता है। इसलिए लोग भी ऐसी जगहों से गुजरते समय नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं। कई स्थान ऐसे हैं जहां शोर-शराबा कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। प्रकृति के मनमोहक नजारों के साथ-साथ कुल्लू की वादियां कई नियमों से भी बांध देती हैं। कई जगहें ऐसी हैं जहां रात के समय अधिक देर तक रुकना ठीक नहीं माना जाता है। इन जगहों में ज्यादातर ऐसे स्थान हैं जहां पर प्राकृतिक जलस्रोत भी हैं।

दैवीय शक्तियों से प्रभावित हैं कई स्थान
कुल्लू के देव कारकू नों में मंगलेवश्वर महादेव के कारदार नानक चंद नेगी बताते हैं कि देवता अपने दूसरे स्थान पर जाते समय एक जगह ठहर जाते हैं। चौंग पंचायत में एक ऐसा पहाड़ है जहां महर्षि मार्कंडेय का मोहरा आज भी शैल रूप में मौजूद है। सदियों पूर्व हुई मूसलाधार बारिश में आई बाढ़ में यह मोहरा यहां फंस गया था और तब से यहीं पर है। इस जगह से पहले एक सड़क है जहां पर कभी एक राक्षस का अधिपत्य हुआ करता था। इस सड़क से गुजरते समय वाद्य यंत्रों को नहीं बजाया जाता।

कई नियमों से बंध जाते हैं देवी-देवता
जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम बताते हैं कि कई जगहों पर आम लोग ही नहीं बल्कि देवी-देवता भी कई नियमों से बंध जाते हैं। कई स्थान ऐसे हैं जहां देवी-देवताओं को रुकना पड़ता है और बजंतरी इन स्थानों पर पूरी ताकत के साथ वाद्य यंत्रों को बजाते हैं। इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया कि ऐसा सदियों से चला आ रहा है क्योंकि ये जगहें किसी न किसी देवता या किसी अन्य दैवीय शक्ति से प्रभावित हैं। नियम तोडऩे पर पहले ही देव कृपा से किसी अनिष्ट के संकेत भी मिलते हैं।

टाहुक हादसे से पहले बुजुर्ग महिला ने दिए थे अनिष्ट के संकेत
4 सितम्बर, 2002 के टाहुक हादसे को याद कर घाटी के लोग आज भी सिहर उठते हैं। इस हादसे में एक निजी बस उफनती पार्वती नदी में गिरी थी जो आज तक नहीं मिल पाई। लग घाटी के भुठी गांव की करीब 40 से अधिक महिलाएं व अन्य लोग खीरगंगा से लौटते समय इस हादसे में मारे गए थे। ग्रामीण एवं बुद्धिजीवी लोगों ने बताया कि इस हादसे से पहले भी देव कृपा से कुछ संकेत मिले थे। गांव के आसपास ढोल-नगाड़े बजने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। हादसे वाले दिन भी खीरगंगा से लौटते समय लोगों को ऐसे सुनसान स्थान पर एक बुजुर्ग महिला मिली जहां आबादी नहीं बसती। बुजुर्ग महिला ने भी अनिष्ट के संकेत दिए थे लेकिन देव आदेश पर किसी तरह के उपाय से पूर्व ही हादसा हो गया।

2006 में गदौरी में भी आई थी जमीन से आवाजें
2006 में भुंतर से सटे गदौरी गांव में भी जमीन से अजीबो-गरीब आवाजें सुनाई दे रही थीं। कभी शंख ध्वनि जैसी आवाजें तो कभी किसी के रोने के जैसी आवाजें आती थीं। गदौरी सहित आसपास के गांवों के लोग इन आवाजों को सुनने के लिए गदौरी पहुंच रहे थे। हालांकि कुछ समय बाद ये आवाजें बंद हो गई थीं। उस दौरान भू-गर्भ वैज्ञानिकों ने तर्क दिया था कि हवा किसी पत्ते या किसी अन्य चीज से टकराती होगी तभी ऐसी आवाजें आ रही हैं। इसका और भी कोई कारण हो सकता है। लोग उस दौरान दैवीय प्रकोप के कारण अनिष्ट को लेकर भी डर गए थे। हालांकि इलाके में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिसे लोगों ने देव कृपा माना।

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