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चंबा की इस माँ को सलाम : पांव के छालों की परवाह किए बिना घोड़ा चलाकर बेटे को बनाया फौजी

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चंबा की इस माँ को सलाम : पांव के छालों की परवाह किए बिना घोड़ा चलाकर बेटे को बनाया फौजी – चंबा। ‘कौन कहता है आसमां में सुराख नही हो सकता, जरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारो’ ये पंक्तियां चुराह कि उस संघर्षशील मां पर सटीक बैठती है जिसने घोड़ा चलाकर अपने बेटे को फौजी बना दिया। लक्ष्य पक्का था, तो उसकी मेहनत रंग लाई और बेटा फौज में भर्ती हो गया।

संघर्ष क्या होता है ये कोई चुराह की खूब देई से पूछे जो मुसीबतों से टकराई, संघर्षों में आगे लड़ी और विषम हालातों एंव चुनौतियों के पहाड़ को तोड़कर आगे बढ़ी। ये दास्तां चंबा जिला के चुराह घाटी की पंचायत बघेईगढ़ के गांव कुंणगा की बहादुर महिला खूब देई की है। बात करीब 12 साल पहले की है खूब देई के दो बेटे थे एक बेटा 12 साल का दूसरा बेटा मात्र 9 साल का। उस समय खूब देई के पति को किसी मामले में जेल की सजा हो गई। ऐसे में पूरे परिवार का बोझ मां खूब देई के कंधों पर आ गया। गांव में ना कोई स्कूल था ना कमाई का साधन था।
खूब देई ने साहस नहीं हारा बल्कि मुसीबतों से लड़ने का पक्का निश्चय कर लिया। उसने तय कर लिया कि जिस गरीबी में उन्होंने गुजारा किया उसके बच्चे ना करें। खूब देई ने अपने बच्चों को किसी दूर के स्कूल में पढ़ाई के लिए दाखिल करवा दिया। यहां से खूब देई संघर्ष की दास्तां शुरू हुई। ना कोई नौकरी ना आसपास कोई मजदूरी का साधन। ऐसे में इस बहादुर मां ने निश्चय किया कि वो घोड़ा चलाकर अपने बच्चों को पढ़ाएगी और अपने परिवार का पोषण करेगी।

एक महिला का घोड़ा चलाना ना सिर्फ उसके लिए शारीरिक रूप से कष्टकारी था बल्कि समाज के ताने भी सुनने पड़े। यहां घोड़ा सिर्फ पुरुष चलाते थे किसी महिला का घोड़ा चलाना शायद कई लोगों को चुभ रहा था। संघर्षशील मां ने ना सिर्फ समाज के तानों को अनदेखा किया अपितु पांव के छाले और कड़कड़ाती धूप भी उसके साहस की नहीं डिगा सके।

खूब देई का घर सड़क से करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर था। ऐसे में रोजाना सीधी चढ़ाई में उसे 15 से 20 किलोमीटर का सफर करना पड़ता। उसने अपने बेटों से ना सिर्फ बारहवीं तक पढ़ाई करवाई बल्कि डिग्री कॉलेज चंबा में भी दाखिला करवा दिया। बीते दिनों पालमपुर में सेना की भर्ती हुई तो खूब देई का एक बेटा रवि भारतीय सेना में भर्ती हो गया।

जैसे ही बेटे की फौज में भर्ती का समाचार उस बहादुर मां को मिला तो खुशी के मारे उसकी आंखों में आंसू निकल गए। मां ने पूरे गांव में जाकर मिठाइयां बांटी। भगवान की परीक्षा भी देखिये कि जैसे ही बेटा फ़ौज में भर्ती हुआ और मां का संघर्ष खत्म हुआ पति फागणु भी जेल से छूट गया।


खूब देई के संघर्ष की आज पूरे समाज मे चर्चा हो रही है। जिस महिला को कुछ साल पहले जो समाज ताने दे रहा था घोड़ा चलाने पर उसका मजाक उड़ा रहा था वहीं आज इस महिला के संघर्ष के आगे नतमस्तक है। खूब देई का संघर्ष उन हजारों महिलाओं के लिए भी सबक है जिनका सुविधाओं के आभाव में संघर्ष दम तोड़ देता है।

पंचायत प्रधान महबूब खान व पूर्व जिला परिषद सदस्य तेज सिंह का कहना है कि उक्त महिला संघर्ष उनकी आंखों के सामने हुआ है। सबको उससे सबक लेना चाहिए। वहीं, समाजसेवी विपिन राजपूत कहते हैं कि खूब देई जैसी मां समाज की शोभा हैं। उन्होंने विषम परिस्थितियों से लड़कर मंजिल पाई है। प्रशासन व सरकार को उन्हें सम्मानित करना चाहिए। एक महिला का घोड़ा चलाना जिस समाज को चुभ रहा था आज उसी की बदौलत उसने अपने बच्चों को मंजिल तक पहुंचाया है।

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