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जज ने रेप के दोषी को 20 दिन के अंदर फांसी की सुनाई सजा, भावुक होकर सुनाई कविता

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जज ने रेप के दोषी को 20 दिन के अंदर फांसी की सुनाई सजा, भावुक होकर ने सुनाई कविता- राजस्थान के झुंझनू कोर्ट ने तीन साल की मासूम बच्ची के साथ बलात्कार करने वाले को 20 दिन में फांसी की सजा सुनाई है. फैसला सुनाने वाली जज भी इस दौरान भावुक हो गईं.
राजस्थान की झुंझुनू अदालत ने महज तीन साल की बच्ची से रेप के मामले में दोषी को फांसी की सजा सुनाई है. बच्ची दिल की बीमारी से ग्रस्त है. खास बात है कि मामले में वारदात के महज 20 दिन के अंदर ही ये फैसला आया है. मामले की सुनवाई कर रही महिला जज ने फैसले के साथ ही एक कविता भी लिखकर सुनाई.
ये घटना 2 अगस्त को झुंझुनू में करीब सवा नौ बजे घटित हुई. तीन साल की मासूम अपनी नानी के यहां रहने आई थी. बच्ची घर के बाहर खेल रही थी और दौसा के मंडावरी का रहने वाला विनोद कुमार फेरी लगाकर बर्तन बेच रहा था.
उसने घर में बच्ची को अकेला देखा और उसकी नीयत खराब हो गई. बच्ची के साथ हैवानियत के बाद उसे लहूलुहान हालत में छोड़कर विनोद बाइक से भाग रहा था, तभी बच्ची की नानी मौके पर पहुंच गई.
शाम 7 बजे परिवार ने थाने में जाकर मामला दर्ज कराया और अगले दिन चिड़ावा से विनोद को गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने महज 9 दिन के भीतर यानी 13 अगस्त को आरोपी के खिलाफ कोर्ट में चालान पेश कर दिया.
तीन साल की मासूम के साथ की गई दरिंदगी के दोषी को मौत की सजा सुनाते वक्त जस्ट‍िस निरजा दाधीच बेहद भावुक हो उठीं और फैसले में कविता लिखकर सुनाई.
वह मासूम नाज़ुक आंगन की कली थी
मां-बाप की आंख का तारा थी अरमानों से बनी थी
जिसकी मासूम अदाओं से मां-बाप का दिल बन जाता था
कुछ छोटी सी बच्ची थी ढ़ंग से बोल नहीं पाती थी
दिखाकर जिसकी मासूमियत उदासी बन जाती थी
जिसने जीवन के केवल तीन बसंत ही देखे थे
उससे यह हुआ अन्याय कैसे विधि के लेखे थे
एक 3 साल की बेटी पर यह कैसा अत्याचार हुआ
एक बच्ची को दंगों से बचा नहीं सके
ऐसा मुल्क लाचार हुआ
उस बच्ची पर जुल्म हुआ वह कितना रोई होगी
मेरा कलेजा फट गया तो मां कैसे सोई होगी
इस मासूम को देख मन में प्यार भर जाता है
देख उसी को मन में कुछ हैवान उतर आता है
कपड़ों के कारण होते हैं रेप, कहे उन्हें कैसे बतलाऊं मैं
आज 3 साल की बच्ची को साड़ी कैसे पहनाऊं मैं
अगर अब भी न सुधर सके तो एक दिन ऐसा आएगा
इस देश को बेटी देने में भगवान भी घबराएगा.
जज ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह के काम कर सजा पाने वाले लोगों को समाज में सुधार का कोई हक नहीं मिलना चाहिए.
साथ ही उन्होंने कहा कि आज हालात इतने भयानक हो गए हैं कि अपने ही घर में तीन साल की मासूम बच्ची को अकेले छोड़ना भी सुरक्षित नहीं है. इस तरह के मामलों में अभिभावकों की स्थिति समाज में क्या होती है? क्या उनकी सोशल डेथ नहीं मानी जाएगी?

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