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तिरंगे में लिपटा घर पहुंचा हिमाचल का सपूत, बर्फीले तूफान में फंसकर हुई थी मौत

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इंदौरा तहसील के मकड़ोली गांव के जवान 26 वर्षीय शम्मी कुमार पठानिया पुत्र कृपाल सिंह के शहीद होने से क्षेत्र में माहौल गमगीन हो गया। जब शहीद की पार्थिव देह वीरवार को यहां पहुंची तो शहीद के माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल था। शहीद की पार्थिव देह श्मशान भूमि में पहुंचने के बाद कंदरोड़ी से आए एफ.ओ.डी. के जवानों ने हवाई फायर करके सलामी दी।

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शहीद की पार्थिव देह को उसके चचेरे भाई जिनेश पठानिया ने मुखाग्नि दी। इस दौरान शहीद को आखिरी विदाई देने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। वहीं विधायक इंदौरा रीता धीमान, विधायक राजेश ठाकुर, एस.डी.एम. इंदौरा गौरव महाजन, 9 एफ.ओ.डी. कमांडैंट पारितोष उपाध्याय, सी.एच.एम. प्रेमजीत, 20 डोगरा बारामुल्ला से आए जवान भी मौजूद रहे।

बर्फीले तूफान में फंसकर हुई थी मौत

बता दें कि 4 दिसम्बर 2012 को सेना में भर्ती होने वाले शम्मी कुमार पठानिया 11 दिसम्बर 2017 से ही ड्यूटी के दौरान श्रीनगर के बारामुल्ला सैक्टर के नौगांव में बर्फीले तूफान में फंसकर लापता हो गए थे। ड्यूटी के दौरान गश्त करते हुए जब सेना की एक टुकड़ी बर्फीले पहाड़ों से नीचे की ओर आ रही थी तो अचानक से आए बर्फीले तूफान में घिर गई, जिसमें से 2जवान लापता हो गए। इनमें एक जवान का शव चंद दिनों बाद मिल गया किन्तु एक जवान का शव भारी बर्फ के कारण नहीं मिल पाया था, जिस पर 13 दिसम्बर को उनके पैतृक गांव मकड़ोली उनके घर हैडक्वॉर्टर द्वारा लापता की सूचना दी गई व  6 महीने बाद बर्फ के पिघलने पर सर्च अभियान चलाया गया। इस दौरान घटनास्थल से शम्मी का शव बरामद कर लिया गया।

टूट गई माता-पिता की उम्मीदें
शहीद शम्मी पठानिया की पार्थिव देह जब घर पहुंची तो चारों तरफ चीखोपुकार के बीच उनके माता-पिता की आखिरी उम्मीद भी टूट गई कि उनका बेटा घर वापस आएगा। पिछले 6 महीने से शहीद की माता सुबह-शाम भगवान से अपने बच्चे की सलामती और वापस आने की दुआ मांग रही थी। वीरवार को शहीद की मां लगातार रोती जा रही थी और कह रही थी कि उनका एकमात्र सहारा जिंदगी भर उनको अकेला छोड़ कर इस दुनिया से विदा हो गया। जिस उम्र में सेहरा सजना था उस उम्र बेटे को कफन में देख कर मां का रो-रो बुरा हाल था।

बहनें अब किसको बांधेंगी राखी
बता दें कि शहीद शम्मी पठानिया 2 बहनों का इकलौता भाई था। दोनों छोटी बहनें हीना पठानिया व काजल पठानिया अभी पढ़ाई कर रही हैं। उनको तो विश्वास भी नहीं हो रहा कि उनका भाई अब इस दुनिया में नहीं है। बड़ी बहन के हाथ पीले करने से पहले ही भाई इस दुनिया से रुखसत हो गया और सारा बोझ अपने किसान पिता के ऊपर छोड़ गया। बहनों की आंखों से बहते आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। दोनों बहनें आते-जाते लोगों से पूछ रहीं थी कि अब वे किसकी कलाई पर राखी बांधेंगी।

लाडले पोते का सहेरे देखने का टूटा सपना
बता दें कि शहीद के दादा की 9 साल पहले ही मृत्यु हो चुकी है। दादी राज कुमारी का भी रो-रो कर बुरा हाल था। दादी जो इस उम्र में अपने पोते को घोड़े पर चढ़े हुए माथे पर सेहरा बंधा हुआ देखना चाहती थी। उसके सामने ही जब जवान पोते की अर्थी उठी तो वो मार्मिक दृश्य सबको रोने पर मजबूर कर गया।

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