Himachalkullu

हिमाचल के इस गावं में छोटी सी चिंगारी मचा सकती है तबाही का मंजर

यहां आग की छोटी सी चिंगारी मचा सकती है तबाही का मंजर, जानिए वजह

Himachal
nn
loading...

पुरातन शैलियों के बेजोड़ नमूने से युक्त जाणा गांव में कभी भी आग की छोटी सी चिंगारी तबाही का मंजर पेश कर सकती है। यहां लकड़ियों से बने हुए घर आपस में पूरी तरह से सटे हुए हैं, साथ ही लोगों ने घरों में घास और लकड़ियां भी एकत्र करके रखी हुई हैं। कुल्लू जिला में वैसे ही आग की चिंगारी कई आशियानों को अपनी चपेट में ले सकती है। यहां हर वर्ष लाखों करोड़ों की संपदा आग के हवाले हो जाती है। नारी गरिमा के कार्यक्रम का आगाज जाणा गांव से हो चुका है तो ऐसे में यहां के लोगों ने अपने घरों को एक तरह से लाक्षागृह बनाकर रखा है। लिहाजा लापरवाही की एक छोटी सी चिंगारी कहर बरपा सकती है।  Himachal

कुल्लू में अधिकतर आग की घटनाएं सर्द मौसम में होती रही हैं। बंजार, सैंज और उझी घाटी आग के निशाने पर रहते हैं। जाणा के बाशिंदों ने भी अपने घरों को पूरी तरह से घास और लकड़ियों के भंडार में तबदील कर रखा है। पुरातन संस्कृति और पुरातन खाद्य सामग्री के लिए मशहूर जाणा गांव में लापरवाही तबाही का मंजर प्रस्तुत कर सकती है। उझी घाटी के साथ-साथ लगघाटी में भी कई घर घास और लकड़ी के कारण आग की भेंट चढ़ चुके हैं। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण कई गांवों में अभी तक भाग्य रेखा नहीं पहुंची है। लिहाजा आग भड़क जाने से उस पर काबू पाना मुश्किल हो जाता है। चंद क्षणों में ही कई घर स्वाह हो जाते हैं। दूसरी ओर गांव के एक घर में आग लगने से अन्य घरों पर ही खतरा मंडरा जाता है।

Himachal में लकड़ी के घरों की अपनी ही शान 

जाणा गांव के बाशिंदे उत्तम चंद, गंगा राम, अमर ठाकुर, शकुंतला देवी व केहर सिंह इत्यादि का कहना है कि घरों में लकड़ी और घास इत्यादि वे अपने पूर्वजों के समय से ही रखते हैं। इनका कहना है कि देव कृपा से अभी तक गांव में कोई अनहोनी नहीं हुई है। इन सभी ने माना कि लकड़ियों के घरों की अपनी ही शान होती है। इसी के कारण कई पर्यटक आज भी जाणा गांव को देखने आते हैं।

यू-ट्यूब पर खूब सुर्खियां बटोर रही है शॉर्ट फिल्म ‘द कोच’

सहूलियतों के लिए घरों में रखते हैं लकड़ियां और घास 
बर्फबारी के कारण घास और लकड़ियों को सहूलियतों के हिसाब से घरों में ही रखते हैं। सावधानी तो पूरी बरती जाती है लेकिन कई बार आग लगने से उस पर काबू पाना मुश्किल हो जाता है। लगघाटी के भुट्ठी, भल्याणी, त्यून, समालंग, भूमतीर, मड़घन, थाच, माशणा, फलियाणी, समेरग, कणौन, खारगा, डिंगडिंगी व जोंगा बुआई इत्यादि गांवों के लोग भी अपने घरों में घास और लकड़ियों को एकत्रित करके रखते हैं।

Leave a Reply