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ख़तम होने की कगार पर है गद्दी समुदाय का धण व्यापार, जानिए क्या है पूरा मामला

गद्दी समुदाय
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हिमाचल प्रदेश में अगर सबसे ज्यादा कठिन जिंदगी है तो वो है गडरियों की। प्रदेश में इनको गद्दी या घुमंतू लोगों से जाना जाता है। जब चम्बा, कांगडा, शिमला और किन्नौर के क्षेत्रों में जब सर्दी का मौसम शुरु हो जाता है और बर्फ गिरने लगती है तो यह लोग अपने परिवार व अपने पशुओं के साथ निचले इलाकों में चले जाते हैं।

इनके साथ हजारों की संख्या में भेड़-बकरियाँ तथा बोझा उठाने के लिए घोडे व कुत्ते साथ होते हैं। यह गद्दी लोग निचले इलाकों बिलासपुर, हमीरपुर, ऊना व कांगडा के जंगलो में चले आते हैं, क्योंकि बर्फ पड़ने से पशुओं के लिए घास नहीं रहता। पूरी सर्दियाँ निचले इलाकों में ही लगा देते हैं।  मार्च व अप्रैल महीने में फिर वापस लौट जाते हैं। लेकिन अब आने वाले समय में गद्दी लोगों की संख्या दिन-प्रतिदिन कम हो रही है।

जंगल में  जानवरों का डर बना रहता है पर फिर भी रहना तो जंगलों में ही पड़ता है। हर साल बिलासपुर में अपनी भेड़ बकरियाँ चराने वाले व्यक्ति सुरेश कुमार कहते हैं कि साहब जिंदगी जंगलों में जोखिम उठाते-उठाते बीत गई, अब तो आलम यह है कि पशु पालन भी मुश्किल हो गया है। जंगल कम हो गए हैं और घने नहीं रहे है, इसलिए हज़ारों पशुओं को पानी पिलाने में भारी समस्या पैदा होती जा रही है।

जंगल में जंगली जानवर बाघ, तेंदुआ, गीदड़ का डर बना रहता है, जो पशुओं को मार देते हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जंगलों में खरपतवार के कारण सारा घास खराब हो गया है। ऊपर से सरकार के नए-नए कानून हम किस हालात में हैं, हम ही जानते हैं। सरकारें तो बस कानून बना देती हैं लेकिन हमारे लिए कुछ नया नहीं कर पाती हैं।

मौसम के मिज़ाज बदलने के कारण हर साल काम कम होता जा रहा है, न समय पर बारिश होती है और न ही जंगल में घास होता है और न ही पानी, लेकिन क्या करे मजबूरी है वर्ना भूखे मरने की नौबत है। हम यह सोच के डरते हैं कि जो जिंदगी काट ली वो अच्छी जिंदगी थी, आगे क्या होगा कुछ पता नहीं। इसके अलावा रोजी-रोटी का और कोई साधन भी तो नहीं है इतने पशुओं को चराना अकेले आदमी का काम नहीं है। इसलिए चार-पांच नौकर पशुओं को चराने के लिए रखने पड़ते हैं, जिनको प्रति आदमी दस हजार महीना दो या साल के पंद्रह भेड़, बकरियाँ, पशुओं को चराने के लिए देनी पड़ती हैं तो आप ही बताओ क्या कमाया है। जैसे-जैसे समय बदल रहा है हमें लगता है कि एक दिन यह कारोबार सिमट जाएगा और परिवार का पालन पोषण भी मुश्किल हो जाएगा।

 

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