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एक बार एक व्यक्ति ने स्वामी विवेकानंदजी से पूछा आप तो एक संन्यासी और बैरागी हैं, फिर आप हमेशा पैसा कमाने के लिए क्यों कहते हो और हमें पैसा कमाना ही क्यों चाहिए, विवेकानंद जी ने उसे व्यक्ति से..

एक बार एक व्यक्ति ने स्वामी विवेकानंदजी से पूछा आप तो एक संन्यासी और बैरागी हैं, फिर आप हमेशा पैसा कमाने के लिए क्यों कहते हो और हमें पैसा कमाना ही क्यों चाहिए, विवेकानंद जी ने उसे व्यक्ति से..

एक बार एक व्यक्ति ने स्वामी विवेकानंदजी से पूछा आप तो एक संन्यासी और बैरागी हैं, फिर आप हमेशा पैसा कमाने के लिए क्यों कहते हो और हमें पैसा कमाना ही क्यों चाहिए, विवेकानंद जी ने उसे व्यक्ति से..

सुखी और सफल जीवन के लिए पैसों के साथ ही ईमानदारी और आत्म सम्मान बहुत जरूरी है। इन गुणों के साथ ही हमें दूसरों की धन-संपत्ति देखकर अपनी नीयत खराब नहीं करनी चाहिए। ये बात स्वामी विवेकानंद जी के एक किस्से से समझ सकते हैं।

प्रचलित किस्से के अनुसार एक दिन किसी व्यक्ति ने स्वामी जी से पूछा कि आप तो संन्यासी हैं, वैरागी हैं और आप कहते रहते हैं कि पैसा कमाओ, लेकिन आप ये बताएं कि हमें पैसा क्यों कमाना चाहिए?

विवेकानंद जी ने उस व्यक्ति कि मैं दो प्रकार के धन कमाने के कहता हूं। एक धन वह है, जिससे घर-संसार चलता है और दूसरा धन वह है, जिससे हमारा चरित्र बनता है।

स्वामी जी ने अपनी बात समझाने के लिए उस व्यक्ति को एक कहानी सुनाई। एक सेठ अपने नौकर के साथ ऊंट खरीदने गया। उसने मंडी में एक ऊंट पसंद किया और उसे खरीदकर अपने घर लेकर आ गया। सेठ ने ऊंट की पीठ से गादी हटाई तो वहां एक पोटली दिखाई दी। उस पोटली में देखा तो उसमें हीरे थे।

सेठ समझ गया कि ये हीरे ऊंट के पुराने मालिक के हैं, जिससे ऊंट खरीदा है।

पोटली में हीरे देखकर नौकर ने कहा कि हमें तो ऊंट के साथ हीरे भी मिल गए हैं।

सेठ ने नौकर से कहा कि हमने तो सिर्फ ऊंट खरीदा है, हीरे नहीं, इसलिए ये पोटली ऊंट के व्यापारी को वापस देनी होगी।

अगले दिन सेठ ऊंट बेचने वाले व्यापारी के पास पहुंच गया और हीरों की थैली लौटा दी। ऊंट के व्यापारी ने कहा कि आप तो बहुत ईमानदार हैं। ये कीमती हीरे हैं, मैं रखकर भूल गया था। आपकी नीयत एकदम साफ है। अपनी ईमानदारी के लिए आप इसमें से एक हीरा रख लीजिए।

सेठ ने कहा कि मुझे ये हीरा नहीं चाहिए। मैंने किसी भेंट के लिए ये पोटली आपको नहीं दी है। मेरा कर्तव्य था, मैंने आपको ये थैली दे दी।

हीरों के मालिक ने सेठ को हीरा देने की बहुत कोशिश की, लेकिन सेठ ने हीरा नहीं लिया। जब हीरों के मालिक ने बार-बार निवेदन किया तो सेठ ने कहा कि मैंने पहले से ही दो हीरे रख लिए हैं। इसलिए अब एक और हीरा नहीं चाहिए।

ये बात सुनते ही हीरों के मालिक को गुस्सा आ गया। उसने कहा कि मैं तो आपको ईमानदार समझ रहा था, लेकिन आपने तो पहले से ही हीरे रख लिए हैं।

हीरों के मालिक ने तुरंत ही पोटली में से हीरे निकाल कर गिनना शुरू कर दिए। उस थैली में 50 हीरे थे, गिनने के बाद उसे पूरे 50 हीरे मिल गए।

हीरों के मालिक ने कहा कि थैली में तो पूरे हीरे हैं, आप किन दो हीरों की बात कर रहे हैं।

ऊंट खरीदने वाले सेठ ने कहा कि मेरे ये दो हीरे हैं ईमानदारी और आत्म सम्मान। ये दो हीरे मैंने पहले से बचाकर रखे हैं, इसलिए आपके पूरे 50 हीरे आपको वापस मिल गए है।

ये कहानी सुनाने के बाद विवेकानंद जी ने उस व्यक्ति को समझाया कि हमें धन कमाना चाहिए, लेकिन ईमानदारी और आत्म सम्मान बनाए रखना चाहिए। दूसरों की धन-संपत्ति देखकर हमें हमारी नीयत खराब नहीं करनी चाहिए। Lover के बाहर जाते ही लड़की के बदले रंग, दोस्त के साथ की ऐसी हरकत

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