नोएडा के एक अपार्टमेंट की बालकनी पर एक शख्स बाहर की ओर लटका है. कुछ लोग उसे रोकने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन वो नहीं रुकता और नीचे कूद जाता है. सोशल मीडिया पर वायरल ये वीडियो दिल दहला रहा है. लेकिन क्या ये बस एक सुसाइड की कहानी भर है? उस बालकनी तक पहुंचने से पहले उस आदमी ने अपने भीतर कितनी लड़ाइयां लड़ी होंगी, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है.

सॉफ्टवेयर इंजीनियर संभव जैन की मौत ने कई गंभीर सवाल छोड़ दिए हैं. पत्नी से विवाद और तलाक का केस, प्रीमैच्योर पैदा हुए बच्चे के इलाज का 30 लाख रुपये से ज्यादा का खर्च और ऊपर से कोर्ट के पूर्व पत्नी को 15 लाख रुपये एलिमनी देने का आदेश. बढ़ता कर्ज और फाइनेंशियल बोझ संभव की जान पर भारी पड़ गया.

पहले भी सामने आए ऐसे मामले

ये अपनी तरह का इकलौता मामला नहीं है. दिसंबर 2024 में बेंगलुरु के टेक प्रोफेशनल अतुल सुभाष की मौत के बाद मैरिज डिस्प्यूट और उनके फाइनेंशियल स्ट्रेस पर देशभर में बहस हुई. उनके परिवार ने केस और बच्चे से मिलने को लेकर भारी रकम की मांग के आरोप लगाए. बच्चे के लिए हर महीने 40 हजार रुपये मेंटेनेंस तय होने की बात भी सामने आई थी.

20 अगस्त 2026 को लखनऊ में एसबीआई मैनेजर मानस बाजपेयी ने अपनी पत्नी और बहन की हत्या कर खुदकुशी कर ली. इसमें भी पारिवारिक विवाद और एलिमनी की चर्चा हुई. ये घटनाएं सवाल उठाती हैं कि तलाक, फाइनेंशियल रिस्पॉसिबिलिटी और मेंटल प्रेशर जब एक साथ आते हैं तो पुरुषों की जिंदगी पर कितना असर पड़ता है?

तलाक के बाद खर्च सिर्फ एलिमनी तक सीमित नहीं

मनोचिकित्सक डॉ समीर मल्होत्रा कहते हैं इसे केवल एलिमनी के कारण देखना सही नहीं होगा. तलाक व्यक्ति की पूरी आर्थिक संरचना बदल देता है. पहले जो खर्च दो लोगों या एक साझा हाउसहोल्ड में बंटे होते हैं, वे अलगअलग घरों में दोबारा मैनेज करने पड़ सकते हैं.

मेंटेनेंस/एलिमनी, बच्चों की एजूकेशन और देखभाल का खर्च, घर का किराया या नया घर, कानूनी खर्च, एग्जिस्टिंग लोन, EMI और प्रॉपर्टी से जुड़ी जिम्मेदारी आर्थिक दबाव बढ़ा सकते हैं. अगर व्यक्ति पहले से कर्ज में है या इनकम लिमिटेड है तो प्रेशर और फील होगा. समस्या सिर्फ रकम नहीं है, घर टूटने का इमोशनल प्रेशर और फाइनेंशियल रिस्पॉसिबिलिटी एक साथ स्ट्रेस बढ़ा सकती हैं.

क्या सिर्फ सैलरी देखकर तय होनी चाहिए एलिमनी?

भारत में एलिमनी तय करने का कोई एक तय फॉर्मूला या कैलकुलेटर नहीं है. ये केस की कंडीशन पर डिपेंड करता है. कई मामलों में पति की आय का 25 फीसदी भी मेंटेनेंस तय होता है. लेकिन ये फिक्स नियम नहीं माना जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में एक मामले में दोनों पक्षों से अपनी आय, संपत्ति, कर्ज और खर्चों की जानकारी देने वाले एफिडेविट की व्यवस्था पर जोर दिया था, ताकि एक्चुअल इकॉनमिक कंडीशन देखकर मेंटेनेंस तय किया जा सके.

पुरुष अपनी परेशानी बताते क्यों नहीं?

डॉ समीर मल्होत्रा कहते हैं कि पुरुषों से अक्सर मजबूत और परिवार का आर्थिक सहारा बने रहने की उम्मीद की जाती है. पुरुषों के मेंटल हेल्थ इशूज कम नहीं हैं, लेकिन वो उसके बारे में कम बात करते हैं कम मदद लेते हैं. पुरुष को मातापिता, भाईबहन, पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारियां निभानी होती हैं वो कई बार अपनी जरूरतों और हेल्थ को प्रॉयॉरिटी नहीं देते. डिवोर्स, फाइनेंशियल लॉस, बच्चों से दूरी, सोसायटी मे इमेज चेंज और लोनलीनेस इस प्रेशर को बढ़ा सकते हैं.

‘मर्द को मजबूत रहना चाहिए’ वाली सोच

रिलेशनशिप एक्सपर्ट काउंसलर निशा खन्ना कहती है सोसायटी पुरुषों को प्रोवाइडर और ब्रेड अर्नर के रूप में देखती है. फाइनेंशियल अनस्टेबिलिटी पर कई पुरुष खुद को फेलियर, वर्थलेस और इंट्रोस्पेक्शन करने लगते हैं. तलाक के बाद बच्चों या पार्टनर के खर्च, बदली लाइफस्टाइल, लीगल कॉस्ट और वकीलों की फीस स्ट्रेस बढ़ाती है.

‘मर्द रोता नहीं’ वाली सोशल कंडीशनिंग पुरुषों को अपनी वीकनेस या दुखी भावनाओं को पहचानने और एक्सप्रेस करने से रोकती है. कई बार मेंटल स्ट्रेस गुस्से, चिड़चिड़ेपन, ज्यादा काम, सोशल मीडिया या सब्सटेंस एब्यूज के तौर पर निकलता है.

नॉनजजमेंटल स्पेस मिलना जरूरी

डॉ समीर मल्होत्रा भी कहते हैं कि पुरुषों को अपनी परेशानी व्यक्त करने के लिए सेफ और नॉनजजमेंटल स्पेस मिलना जरूरी है. तलाक के बाद प्रेशर बढ़ता है क्योंकि पति, पिता, कमाने वाले व्यक्ति की सामाजिक भूमिका में चेंज का सामना होता है. कुछ पुरुषों को डर भी रहता है कि मानसिक परेशानी बताने से उन्हें कमजोर समझा जाएगा.

क्या कहते हैं सुसाइड के आंकड़े?

NCRB के डेटा के हिसाब से साल 2024 में भारत में कुल 1,70,746 सुसाइड रजिस्टर हुए. इनमें 73.5 फीसदी पीड़ित पुरुष और 26.5 फीसदी महिलाएं थीं. सुसाइड की सबसे बड़ी दर्ज वजह पारिवारिक परेशानियां थीं.

फाइनेंशियल प्रेशर को जेंडर वॉर नहीं

डॉ समीर मल्होत्रा कहते हैं कि तलाक के बाद आर्थिक या मानसिक दबाव को जेंडर वॉर की तरह देखने के बजाय व्यक्ति की सिचुएशन, सैलरी, लोन, बच्चों की जिम्मेदारी, कानूनी दायित्व, सोशल सपोर्ट और मेंटल हेल्थ के तौर पर देखना जरूरी है.

रिलेशनशिप एक्सपर्ट निशा खन्ना भी कहती हैं कि पुरुषों के लिए ऐसा माहौल बनना चाहिए जहां इमोशनल पेन के बारे में बात करना कमजोरी न माना जाए. क्योंकि तलाक बस रिश्ता ही खत्म नहीं करता. इसके साथ घर, पैसा, बच्चों की जिम्मेदारी, सोशल स्टेटस और फ्यूचर प्लानिंग सब बदल जाता है सारा स्ट्रेस एक साथ मिलकर फाइनेंस मैटर नहीं मेंटल हेल्थ का भी सवाल बन जाता है.