
CG Bilaspur High Court News: बिलासपुर। निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार कानून RTE के तहत आरक्षित 25 प्रतिशत सीटों को भरने की व्यवस्था को लेकर छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर नाराजगी जाहिर की है।
कोर्ट ने कहा कि RTE कानून और नियमों को लागू करने में राज्य सरकार कछुआ चाल से आगे बढ़ रही है। 8 सितंबर के आदेश के पालन में स्कूलवार आरक्षित सीटों, दाखिल बच्चों और खाली सीटों का पूरा ब्योरा नहीं देने पर कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा पेश किए गए शपथपत्र को आदेश के अनुरूप नहीं माना।
छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस कृष्ण राम महापात्र और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को विस्तृत शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके लिए कोर्ट ने 15 दिन का समय निर्धारित कर दिया है। जनहित याचिका की अगली सुनवाई के लिए डिवीजन बेंच ने 18 नवंबर की तिथि तय कर दी है।
शपथपत्र में न सीटों का पूरा ब्योरा, न योजना का पालन
जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव की ओर से शपथपत्र पेश किया गया। शपथपत्र में दी गई जानकारी, पूर्व में दिए गए निर्देशों के अनुरुप नहीं दी गई थी। शपथपत्र के साथ संबंधित दस्तावेज भी नहीं लगाया गया था।
डिवीजन बेंच ने सचिव की ओर से पेश शपथपत्र में दी गई जानकारी के संबंध में पूछा, आरटीई के तहत लागू कार्ययोजना के खंड-5 का पालन किस तरह किया जा रहा है? इसे साफतौर पर क्यों नहीं बताया गया।
राज्य शासन की ओर से पैरवी कर रहे उप महाधिवक्ता प्रसून भादुड़ी ने स्कूलों के आसपास के क्षेत्र की सीमा संबंधी नियम का हवाला देकर पक्ष रखने की कोशिश की। कोर्ट ने कहा कि संबंधित नियम आरटीई कानून में तय सीटों के प्रतिशत को बदलने की अनुमति नहीं देता। इसलिए राज्य का यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता।
2016 में भी कोर्ट ने नई व्यवस्था का सुझाव दिया था
मामले की सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने कहा, 14 सितंबर 2016 के आदेश में भी राज्य सरकार को आरटीई की 25 प्रतिशत सीटें पूरी तरह भरने के लिए नई व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया गया था। उस समय कोर्ट ने पाया था कि निजी स्कूलों में पांच साल से आरक्षित सीटें पूरी तरह नहीं भर पा रही थी।
डिवीजन बेंच ने दिए गए सुझावों की
कोर्ट ने राज्य सरकार को सुझाव दिया था कि अभिभावक सीधे संबंधित स्कूल में आवेदन करें और सरकारी अधिकारियों की भूमिका केवल पात्रता की जांच तक सीमित रहे। पड़ोस के क्षेत्र और तीन किलोमीटर से अधिक दूरी वाले आवेदकों के लिए अलग व्यवस्था तथा सीटों से अधिक आवेदन होने पर लॉटरी का सुझाव भी दिया गया था। डिवीजन बेंच ने कहा, इतने वर्षों बाद भी राज्य सरकार द्वारा पेश किए गए अलग-अलग शपथपत्रों से यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि 2016 में दिए गए निर्देशों और सुझावों पर कितना अमल हो पाया।
मामले से जुड़े एक हस्तक्षेप आवेदन पर निजी शैक्षणिक संस्था की ओर से आपत्ति दाखिल करने के लिए भी 15 दिन का समय दिया गया।



