इन दिनों स्काईरूट एयरोस्पेस हर तरफ चर्चा में है. 18 जुलाई 2026 को कंपनी ने देश के पहले निजी ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल विक्रम1 का सफल प्रक्षेपण कर इतिहास रच दिया. यह भारत के स्पेस सेक्टर के लिए एक ऐतिहासिक पल है, जहां अब तक सिर्फ ISRO का दबदबा रहा है, वहां एक निजी कंपनी ने अपने दम पर रॉकेट को अंतरिक्ष में पहुंचा दिया. इस उपलब्धि के साथ ही सबकी नजरें उस शख्स पर टिक गई हैं जिसने इस सफर की नींव रखी. स्काईरूट एयरोस्पेस के सहसंस्थापक और CEO पवन कुमार चंदना की चर्चा खूब होने लगी है. हाल ही में दिया उनका एक इंटरव्यू भी खूब वायरल हो रहा है.

40 हजार की सैलरी से कंपनी के CEO तक
दिलचस्प बात यह है कि ज्यादातर IIT ग्रेजुएट्स ऊंची सैलरी वाली कॉरपोरेट नौकरियां या विदेश में मौके तलाशते हैं, लेकिन चंदना ने ग्रेजुएशन के बाद बिल्कुल अलग राह चुनी थी. एक ऐसी राह जिसमें सैलरी मामूली थी, लेकिन आगे चलकर यही फैसला उनकी उद्यमशीलता की पूरी यात्रा को आकार देने वाला साबित हुआ. CNBC इंडिया से बातचीत में उन्होंने बताया कि उन्होंने जानबूझकर ISRO जॉइन करने का फैसला लिया था, हालांकि उन्हें पता था कि यहां वह सैलरी नहीं मिलेगी जिसकी उम्मीद ज्यादातर IIT ग्रेजुएट्स अपने साथियों की तरह करते हैं. उन्होंने बताया कि मेरी शुरुआती सैलरी करीब 40,000 रुपये महीना थी और यह भी कहा कि कम सैलरी की वजह से कई IIT ग्रेजुएट्स सरकारी नौकरियां लेने से हिचकते हैं. उनके लिए हालांकि, अत्याधुनिक स्पेस टेक्नोलॉजी पर काम करने का मौका पैसों से कहीं ज्यादा मायने रखता था. उनके इसी जुनून ने उन्हें आज पूरी दुनिया में फेमस कर दिया. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है।
पवन कुमार चंदना का क्या है बैकग्राउंड?
स्काईरूट एयरोस्पेस के सहसंस्थापक और CEO पवन कुमार चंदना का जन्म हैदराबाद में 1991 में हुआ. शुरुआती समय में वह पढ़ाई में अच्छे नहीं थे. स्कूल में गणित में उन्हें सिर्फ 51 नंबर मिले थे. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। पिता के प्रोत्साहन से उन्होंने IIT की कोचिंग ली, जहां गणित का डर धीरेधीरे इंजीनियरिंग में दिलचस्पी में बदल गया. उन्होंने पहले ही प्रयास में IIT प्रवेश परीक्षा पास की और 2007 में IIT खड़गपुर में दाखिला लिया, जहां से उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में BTechMTech की डुअल डिग्री हासिल की.
उन्होंने हालिया कार्यक्रम में अपना कुछ करने वाले युवाओं को भी सलाह दी. उन्होंने कहा कि इकोसिस्टम के पूरी तरह विकसित होने का इंतजार नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब तक नीतियां, फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होते हैं, तब तक शुरुआती मूवर का फायदा कम हो जाता है. जो लोग जल्दी उतरते हैं, सोचसमझकर जोखिम लेते हैं और तेज़ी से सीखते हैं, वे अक्सर सफलता के लिए बेहतर स्थिति में होते हैं. चंदना के मुताबिक स्काईरूट को भी उस दौर में बोल्ड दांव लगाने का फायदा मिला जब भारत का निजी स्पेस सेक्टर अभी शुरुआती दौर में ही था, और आज पीछे मुड़कर देखने पर वे मानते हैं कि वे शुरुआती जोखिम अब नतीजे दे रहे हैं.
क्या है स्काईरूट कंपनी का इतिहास
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना 12 जून 2018 को हैदराबाद में हुई थी. शुरुआत में सिर्फ दस लोगों की टीम के साथ कंपनी शुरू हुई थी. फिर जून 2018 में ही कंपनी को मुकेश बंसल से 1.5 मिलियन डॉलर का सीड फंड मिला. दिसंबर 2020 में कंपनी ने अपने सॉलिडफ्यूल इंजन ‘कलाम5’ का परीक्षण किया. नवंबर 2022 में स्काईरूट ने वि्क्रमS लॉन्च कर भारत की पहली निजी कंपनी बनने का गौरव हासिल किया, जिसने अंतरिक्ष में रॉकेट भेजा. इसके बाद कंपनी ने कई फंडिंग राउंड्स में करोड़ों डॉलर जुटाए और मई 2026 में भारत का सबसे बड़ा निजी रॉकेट मैन्युफैक्चरिंग प्लांट खोला, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी ने किया.
स्पेस के लिए कितना जरूरी है स्काईरूट का मिशन?
अभी स्काईरूट ने जो आर्टिबल भेजा है वह भारतीय स्पेस सेक्टर के लिहाज से काफी मायने रखता है. क्योंकि अभी तक देश में अंतरिक्ष कार्यक्रमों का पूरा का पूरा जिम्मा एक तरीके से इसरो पर ही था. मगर नई प्राइवेट कंपनियों के आने से नए इंवेशन और नए प्रोजेक्ट के आने की उम्मीद जगई है. यह भारत के लिए गेमचेंजर माना जा रहा है. छह दशक तक सिर्फ ISRO तक सीमित रही भारत की स्पेस यात्रा में अब निजी कंपनियां भी शामिल हो चुकी हैं. 2023 की स्पेस पॉलिसी के बाद आज 400 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप्स सक्रिय हैं, और सेक्टर का राजस्व 202122 के करीब 322 करोड़ रुपये से बढ़कर 202425 में लगभग 3200 करोड़ रुपये हो गया. सरकार का लक्ष्य मौजूदा 8.4 अरब डॉलर के सेक्टर को 2030 तक 4045 अरब डॉलर और 2040 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंचाना है. विक्रम1 इसी दिशा में पहला बड़ा कदम है.
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