उत्तर प्रदेश में बरेली जिले के फतेहगंज पश्चिमी के पास भिटौरा की धरती आज भी उस जंग की कहानी अपने अंदर समेटे हुए है, जब अंग्रेजी हुकूमत की फौज और रुहेला लड़ाकों के बीच जोरदार मुकाबला हुआ था. अंग्रेजों के पास आधुनिक हथियार और तोपें थीं, लेकिन रुहेला सैनिकों ने भी आखिरी दम तक मोर्चा संभाले रखा. इस लड़ाई में बड़ी संख्या में अंग्रेज अफसर और सैनिक मारे गए. बाद में, अंग्रेजी सेना ने भारी तोपखाने का इस्तेमाल किया और रुहेला सेना के प्रमुख नज्जू खां और बुलंद खां भी शहीद हो गए.

भिटौरा की इस जंग से जुड़े परिवार आज भी अपने पूर्वजों की शहादत को याद करते हैं. इन्हीं में सद्दू खां के वंशज भी शामिल हैं. परिवार के लोग बताते हैं कि पीढ़ियों से उन्हें भिटौरा की इस लड़ाई और अपने पूर्वजों के बारे में किस्से सुनाए जाते रहे हैं. जब परिवार के सदस्य अपने पूर्वजों की जमीन और शहादत की जगह पर पहुंचते हैं तो पुरानी यादें आंखों को नम कर देती हैं.

पीढ़ियों से सुनते आ रहे हैं जंग के किस्से

सद्दू खां के वंशज बताते हैं कि उनके परिवार का इस इलाके से पुराना संबंध रहा है. परिवार के बुजुर्गों से उन्हें पता चला कि भिटौरा में अंग्रेजों के खिलाफ हुई लड़ाई में रुहेला पक्ष के लोगों ने अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया था. जंग के बाद अंग्रेजी हुकूमत के दौर में कई परिवारों को अपना इलाका छोड़ना पड़ा. यही वजह रही कि रुहेला परिवार अलगअलग जगहों पर जाकर बस गए।.

परिवार के लोगों का कहना है कि समय बीतता गया, लेकिन भिटौरा की जंग की कहानी घरों में सुनाई जाती रही. पूर्वजों की शहादत का जिक्र आते ही परिवार के लोगों में गर्व के साथ भावुकता भी देखने को मिलती है.

इतिहासकार डॉ. नवीन गुप्ता के मुताबिक भिटौरा की लड़ाई 26 अक्टूबर 1794 को हुई थी. यह संघर्ष रामपुर की नवाबी को लेकर पैदा हुए विवाद के बीच हुआ था. रामपुर के नवाब फैजुल्ला खां की मौत के बाद उत्तराधिकार को लेकर विवाद खड़ा हुआ. इसके बाद सत्ता को लेकर संघर्ष बढ़ता गया और अंग्रेजी हुकूमत भी इसमें शामिल हो गई.

तोपों के सामने भी पीछे नहीं हटे रुहेला लड़ाके

अंग्रेजी सेना ने भिटौरा की तरफ अपनी फौज भेजी. शुरुआत में रुहेला लड़ाकों ने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी. लड़ाई में अंग्रेजी सेना के कई अफसर और सैनिक मारे गए. इसके बाद अंग्रेजों ने अपनी रणनीति बदली और भारी तोपखाने का इस्तेमाल शुरू कर दिया. तोपों की लगातार गोलाबारी के बीच रुहेला सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा. इसी दौरान नज्जू खां और बुलंद खां भी शहीद हो गए. फतेहगंज पश्चिमी के भिटौरा में आज भी दोनों के मकबरे मौजूद हैं, जिन्हें इस ऐतिहासिक जंग की निशानी माना जाता है.

इतिहासकार बताते हैं कि भिटौरा की लड़ाई के बाद इस पूरे इलाके में रुहेलों का प्रभाव काफी कमजोर हो गया. हालांकि यह जंग 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से पहले की थी, लेकिन स्थानीय इतिहास में इसे अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ हुए बड़े संघर्षों में गिना जाता है.

ब्रिटिश शासन ने बनवाया था वॉर मैमोरियल

भिटौरा में अंग्रेजी सेना की जीत की याद में ब्रिटिश शासन ने एक वॉर मैमोरियल भी बनवाया था. पिरामिड जैसी आकृति वाला यह स्मारक आज भी मौजूद है और एएसआई के संरक्षण में बताया जाता है. स्मारक पर अंग्रेजी सेना के अफसरों और सैनिकों से जुड़ी जानकारी दर्ज है.

सद्दू खां के वंशजों का कहना है कि अंग्रेजों ने अपने सैनिकों की याद में स्मारक बना दिया, लेकिन इस लड़ाई में जान गंवाने वाले रुहेला योद्धाओं की याद में वैसा स्मारक नहीं बनाया गया. उनके लिए भिटौरा की मिट्टी और वहां मौजूद मकबरे ही सबसे बड़ी निशानी हैं. यही वजह है कि जब परिवार की नई पीढ़ी यहां पहुंचती है तो उन्हें अपने पूर्वजों की कहानी और उनकी कुर्बानी का एहसास फिर से होता है.