
प्रयागराज: भारतीय समाज में भले ही समलैंगिक संबंधों को कुबूल ना करता हों लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बार फिर कह दिया है कि संविधान के सामने व्यक्तिगत स्वतंत्रता सबसे ऊपर है। वाराणसी के एक अंतरधार्मिक समलैंगिक जोड़े (Lesbian Couple) की सुरक्षा से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया है कि इस जोड़े को तुरंत सुरक्षा मुहैया कराई जाए। कोर्ट ने कहा कि जब दो बालिग अपनी मर्जी से लिव-इन रिलेशनशिप में रहना चाहते हैं तो परिवार या समाज को उनके जीवन में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।
वाराणसी के अंतरधार्मिक समलैंगिक जोड़े की गुहार
यह पूरा मामला वाराणसी की दो बालिग और शिक्षित युवतियों से जुड़ा है। इनमें से एक हिंदू और दूसरी मुस्लिम धर्म से ताल्लुक रखती है। दोनों अपनी मर्जी से एक-दूसरे के साथ समलैंगिक लिव-इन संबंध में रह रही हैं। अलग-अलग धर्म और समान लिंग होने के कारण उनके परिवार और रिश्तेदार इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे। परिवार वालों की तरफ से लगातार मिल रही धमकियों और जान-माल के खतरे को देखते हुए दोनों ने अपनी शारीरिक सुरक्षा के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत में पेश होकर दोनों युवतियों ने कहा कि वे अपने फैसले के लिए पूरी तरह सक्षम हैं और बिना किसी दबाव के एक साथ रहना चाहती हैं।
सरकार की दलील- समाज में समलैंगिकता को स्वीकार्यता नहीं
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से पेश हुए स्थायी वकील ने इस याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय समाज में समलैंगिक संबंधों को सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं है। उनका कहना था कि पारंपरिक समाज विवाह को केवल पुरुष और महिला के बीच का रिश्ता मानता है, जिससे वंश आगे बढ़ता है। सरकारी वकील ने यह भी कहा कि साथी चुनना मौलिक अधिकार हो सकता है लेकिन ऐसे रिश्तों को कानूनी मान्यता देना मौलिक अधिकार नहीं है।
कोर्ट का फैसला- बालिग हैं, साथ रहने का मौलिक अधिकार है
जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी की सिंगल बेंच ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद राज्य सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हालांकि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देना विधायिका (संसद) का काम है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दो बालिगों को भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक संबंध बनाने तथा साथ रहने (लिव-इन) का पूर्ण मौलिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘लोक नैतिकता’ (Public Morality) की तुलना में ‘संवैधानिक नैतिकता’ (Constitutional Morality) की रक्षा करना ज्यादा जरूरी है। कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि दोनों युवतियों को शांतिपूर्ण जीवन जीने दिया जाए और अगर कोई परिवार वाला बाधा डालता है, तो उन्हें तत्काल प्रभाव से सुरक्षा दी जाए।
नवतेज सिंह जौहर केस क्या है, जिसका कोर्ट ने जिक्र किया?
सुनवाई के दौरान याचियों के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ’ (2018) मामले का हवाला दिया। इसी फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 377 के उस हिस्से को रद्द कर दिया था जो दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध मानता था। इस फैसले ने स्थापित किया कि किसी व्यक्ति की लैंगिक पसंद (Sexual Orientation) उसकी निजता और गरिमा का आंतरिक हिस्सा है।
FAQ
सवाल: इलाहाबाद हाई कोर्ट में वाराणसी के समलैंगिक जोड़े ने क्या मांग की थी?
जवाब: वाराणसी की दो युवतियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वे अपनी मर्जी से लिव-इन में रह रही हैं, लेकिन उनके परिवार वाले उन्हें धमकियां दे रहे हैं, इसलिए उन्हें पुलिस सुरक्षा दी जाए।
सवाल: क्या भारत में समलैंगिक जोड़े लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं?
जवाब: हां, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दो बालिग (वयस्क) व्यक्ति, चाहे वे किसी भी लिंग के हों, अपनी आपसी सहमति से एक साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं।
सवाल: इस मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का अंतिम फैसला क्या रहा?
जवाब: हाई कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया है कि युवतियों को तत्काल प्रभाव से सुरक्षा मुहैया कराई जाए और उनके परिवार या किसी अन्य व्यक्ति को उनके शांतिपूर्ण जीवन में दखल न देने दिया जाए।



