छत्तीसगढ़ में गिरदावरी का डिजिटल सिस्टम किसानों और पटवारियों दोनों के लिए परेशानी का कारण बन गया है. सरकार ने इस बार खेतों के भौतिक सत्यापन के लिए नया पीवी ऐप लागू किया है. पटवारियों को खेत में जाकर फसल की तस्वीरें खींचनी हैं और GPS लोकेशन के साथ इसे ऐप पर अपलोड करना है. सरकार का उद्देश्य गिरदावरी में पारदर्शिता लाना और फसल नुकसान की स्थिति में सैटेलाइट व फील्ड डेटा के आधार पर किसानों को सटीक मुआवजा दिलाना है. हालांकि, तकनीकी खामियों के चलते यह व्यवस्था अपने उद्देश्य से भटकती नजर आ रही है.

इस डिजिटल व्यवस्था की गड़बड़ी का हैरान करने वाला मामला कवर्धा जिले से सामने आया है. यहां एक गांव की गिरदावरी के दौरान पूरे गांव की जमीन एक ही खसरे में दर्ज हो गई. यानी अलगअलग खेतों की पहचान के बजाय ऐप में पूरे गांव को एक ही खेत नंबर के तहत दिखाया जाने लगा. इसी तरह भाठागांव में एक खेत की लोकेशन ऐप पर अपलोड की गई तो वह छत्तीसगढ़ में दिखने के बजाय अफ्रीका के समंदर के बीच पहुंच गई. ऐसी गड़बड़ियों ने पटवारियों को भी हैरान कर दिया है. उन्हें समझ नहीं आ रहा कि ऐप में यह समस्या किस स्तर पर आ रही है.
सर्वर अटक रहा, गलत पकड़ रहा लोकेशन
नए पीवी ऐप में हर खेत की मेढ़ के चारों तरफ से तस्वीरें लेना अनिवार्य किया गया है. इसके साथ ही खेत की GPS लोकेशन कैप्चर कर उसी समय डेटा अपलोड करना होता है. लेकिन कई जगह सर्वर ठीक से काम नहीं कर रहा है. बारबार अटकने और गलत लोकेशन दर्ज होने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं.
पटवारियों का कहना है कि ऐप को कहीं से भी ऑपरेट किया जा सकता है. ऐसे में खेत की सही मैपिंग करना चुनौती बन गया है. कई बार किसान की मौजूदगी के बिना खेत की वास्तविक स्थिति और उसकी सीमाओं का मिलान करना मुश्किल हो जाता है.
गलत रिकॉर्ड से जमीन विवाद का डर
पटवारियों को सबसे ज्यादा चिंता डिजिटल रिकॉर्ड की शुद्धता को लेकर है. उनका कहना है कि अगर एक बार गलत लोकेशन या गलत खसरा नंबर अपलोड हो गया तो भविष्य में उसे लेकर जमीन के विवाद खड़े हो सकते हैं. किसान के पास जमीन की वास्तविक लोकेशन का रिकॉर्ड होगा, जबकि ऐप में वही खेत कहीं और दिख सकता है.
गिरदावरी क्या है?
आसान भाषा में समझें तो जब पटवारी किसी गांव के खेतों में जाकर यह जानकारी जुटाता है कि किस किसान के पास कितनी जमीन है और उसमें कौनसी फसल उगाई गई है, तो इस प्रक्रिया को गिरदावरी कहते हैं.
- इसमें मुख्य रूप से ये जानकारियां दर्ज होती हैं:
- खेत का खसरा नंबर और रकबा .
- खेत का मालिक या खातेदार कौन है.
- खेत में कौनसी फसल बोई गई है, जैसे धान, गेहूं या मक्का.
- फसल की वास्तविक स्थिति क्या है.
- खेत में सिंचाई की व्यवस्था है या नहीं.
पटवारी संघ रायपुर के जिलाध्यक्ष कमलेश तिवारी का कहना है कि सरकार ने बिना पर्याप्त ट्रेनिंग दिए ही नई व्यवस्था लागू करने का आदेश जारी कर दिया. ऐप को पहले ठीक से टेस्ट किया जाना चाहिए था. तकनीकी खामियों को दूर करने और पटवारियों को प्रशिक्षण देने के बाद ही इसे लागू करना उचित होता.
फसल बीमा और मुआवजे पर भी पड़ सकता है असर
पिछले साल इसी ऐप के जरिए सामान्य सत्यापन किया गया था और उस दौरान ऐसी समस्याएं सामने नहीं आई थीं. लेकिन इस बार खेतों की चारों तरफ से तस्वीरें लेने, GPS लोकेशन दर्ज करने और तत्काल अपलोड करने की अनिवार्यता ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
अगर इन तकनीकी खामियों को समय रहते दूर नहीं किया गया तो गिरदावरी का डिजिटल रिकॉर्ड गलत हो सकता है. इसका असर किसानों के फसल बीमा, नुकसान के मुआवजे और जमीन से जुड़े रिकॉर्ड पर पड़ सकता है. ऐसे में डिजिटल व्यवस्था लागू करने का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब ऐप सही तरीके से काम करे और किसानों की जमीन का डेटा पूरी तरह सटीक दर्ज हो.



