उत्तर प्रदेश की राजनीति को अक्सर जाति, धर्म और बड़े नेताओं के नाम से समझने की कोशिश की जाती है, लेकिन वोटर के फैसले की असली तस्वीर इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है. CSDSलोकनीति के चुनाव बाद किए गए सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि यूपी का बड़ा वोटर वर्ग पार्टी को देखकर फैसला करता है. 2022 के सर्वे में वोट डालने वालों में 74.4 प्रतिशत ने कहा कि उम्मीदवार से ज्यादा पार्टी उनके फैसले में अहम रही. वहीं 47.3 प्रतिशत मतदाताओं ने बताया कि उन्होंने चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही तय कर लिया था कि किसे वोट देना है.

यानी यूपी की चुनावी लड़ाई सिर्फ प्रचार की नहीं, बल्कि लंबे समय तक मतदाता का भरोसा जीतने की लड़ाई भी है. यूपी की सरकार का रास्ता गांवों, कम आय वाले परिवारों और बड़े सामाजिक समूहों से होकर गुजरता है. CSDS के 2022 सर्वे में शामिल 76.3 प्रतिशत मतदाता गांवों के थे, जबकि छोटे शहरों और शहरी इलाकों की हिस्सेदारी इससे काफी कम थी. यही वजह है कि खेती, रोजगार, महंगाई, राशन, सड़क, बिजली और सरकारी योजनाएं चुनावी राजनीति में लगातार अहम बनी रहती हैं.
सलाह से नहीं, खुद से लेते हैं फैसला
सर्वे में विकास को सबसे अहम चुनावी मुद्दा बताने वालों की संख्या सबसे ज्यादा थी, जबकि बेरोजगारी और महंगाई भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करने वाले बड़े मुद्दों में शामिल रहे. दिलचस्प बात यह भी है कि बहुत से मतदाता किसी की सलाह लेकर नहीं, बल्कि खुद फैसला करते हैं. इसलिए सिर्फ जातीय समीकरण या किसी खास वर्ग को साध लेना सरकार बनने की गारंटी नहीं है. यूपी जैसे विशाल राज्य में पार्टी की छवि, सरकार का काम, आर्थिक मुद्दे और गांव तक पहुंच इन सभी का मेल चुनाव का नतीजा तय करता है.
- पार्टी का भरोसा सबसे बड़ा फैक्टर: यूपी में 74.4% वोटरों ने उम्मीदवार से ज्यादा पार्टी को महत्व दिया, यानी मजबूत पार्टी की छवि चुनाव में बड़ा असर डालती है.
- आधा वोटर पहले ही मन बना लेता है: 47.3% मतदाताओं ने प्रचार शुरू होने से पहले ही तय कर लिया था कि किसे वोट देना है, जबकि मतदान के दिन सिर्फ 9.4% ने फैसला किया.
- गांवों के वोटर पर सबसे ज्यादा नजर: CSDS सर्वे में 76.3% उत्तरदाता ग्रामीण इलाकों से थे. खेती, रोजगार, महंगाई और सरकारी योजनाएं इनके लिए अहम मुद्दे हैं.
- विकास सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा: 38% मतदाताओं ने विकास को सबसे अहम मुद्दा बताया. इसके साथ बेरोजगारी और महंगाई भी वोटरों के फैसले को प्रभावित करने वाले बड़े मुद्दे रहे.
- वोटर खुद लेता है अंतिम फैसला: 77.1% मतदाताओं ने कहा कि वोट तय करते समय उन्होंने किसी की सलाह नहीं ली. यानी परिवार, जाति या स्थानीय प्रभाव के बजाय बड़ी संख्या में वोटर अपना फैसला खुद करता है.
यूपी में किसे साधना जरूरी?
पार्टी पर भरोसा रखने वाला वोटर सबसे बड़ा फैक्टर
CSDS के आंकड़ों से साफ है कि यूपी में बड़ी संख्या में मतदाता उम्मीदवार से पहले पार्टी को देखते हैं. 2022 के पोस्टपोल सर्वे में वोट डालने वाले 74.4 प्रतिशत लोगों ने पार्टी को प्राथमिकता दी, जबकि सिर्फ 16.9 प्रतिशत ने उम्मीदवार को ज्यादा महत्व दिया.सरकार के कामकाज, बड़े नेताओं की लोकप्रियता और पार्टी की विचारधारा का असर स्थानीय उम्मीदवार तक पहुंचता है. सर्वे में 49.5 प्रतिशत मतदाताओं ने अपना वोट सीधे बताया या दिखाया. यह उस मजबूत राजनीतिक पसंद की ओर इशारा करता है, जिसे चुनाव के कुछ दिनों में बदलना आसान नहीं होता.
जाति का वोट कितना असरदार?
यूपी की राजनीति में जाति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन CSDSलोकनीति के 2022 पोस्टपोल सर्वे से तस्वीर थोड़ी अलग दिखती है. वोट तय करते समय उम्मीदवार की जाति को बहुत ज्यादा अहमियत देने वालों की हिस्सेदारी 16.8% थी, जबकि 40.4% ने कहा कि उम्मीदवार की जाति उनके फैसले में बिल्कुल अहम नहीं थी. वहीं, जब पूछा गया कि कौनसी पार्टी उनकी जातिसमुदाय के हितों की सबसे अच्छी रक्षा कर सकती है, तो 43% ने BJP और 31.4% ने SP का नाम लिया, जबकि BSP को 12.2% ने चुना.
पहले से तय वोटर को साधना सबसे बड़ी चुनौती
चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही 47.3 प्रतिशत मतदाताओं ने तय कर लिया था कि उन्हें किसे वोट देना है. वहीं मतदान के दिन फैसला करने वालों की हिस्सेदारी सिर्फ 9.4 प्रतिशत थी. इसका मतलब है कि चुनावी प्रचार पूरी तरह बेअसर नहीं होता, लेकिन बड़ी आबादी का राजनीतिक झुकाव पहले से तय हो सकता है.
यही वजह है कि पार्टियां चुनाव आने से कई महीने पहले संगठन मजबूत करने, गांवों में पहुंच बनाने और सरकार की योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाने पर जोर देती हैं. आखिरी समय की रैलियां उन मतदाताओं तक पहुंचने में मदद कर सकती हैं, जो अभी फैसला नहीं कर पाए हैं, लेकिन पहले से बने समर्थन को बदलना आसान नहीं होता. CSDS के सर्वे में 77.1 प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि वोट तय करते समय उन्होंने किसी की सलाह नहीं ली.
गांव का वोटर सरकार बनाने में सबसे अहम
यूपी की राजनीति में गांव आज भी सबसे बड़ा चुनावी मैदान हैं. 2022 के CSDS सर्वे में 76.3 प्रतिशत उत्तरदाता गांवों से थे. इसके मुकाबले एक लाख से कम आबादी वाले कस्बों से 9.8 प्रतिशत और छोटे शहरों से 7.9 प्रतिशत लोग शामिल थे. इस सामाजिक तस्वीर का असर चुनावी मुद्दों पर भी दिखता है.
यूपी चुनाव में विकास का मुद्दा
ग्रामीण मतदाता के लिए खेती, रोजगार, महंगाई, फसल भुगतान और सरकारी सुविधाएं महत्वपूर्ण हो सकती हैं. सर्वे में विकास को सबसे अहम मुद्दा बताने वालों की हिस्सेदारी 38 प्रतिशत थी. बेरोजगारी को 6.8 प्रतिशत मतदाताओं ने सबसे अहम मुद्दा बताया, जबकि महंगाई भी बड़ी चिंता के रूप में सामने आई. अलगअलग मुद्दों के असर को लेकर पूछे गए सवाल में महंगाई और बेरोजगारी का प्रभाव काफी मजबूत दिखा.
कम आय वाले परिवारमहिलाओं तक पहुंच जरूरी
आंकड़ों के मुताबिक, यूपी में 50 हजार रुपये से कम आय वाले परिवारों की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से ज्यादा है और करीब 30 प्रतिशत हाउसवाइफ हैं. यह आंकड़ा बताता है कि चुनावी राजनीति में उन परिवारों की जरूरतों को समझना बेहद जरूरी है, जिनकी आय सीमित है और जिनका रोजमर्रा का बजट महंगाई से सीधे प्रभावित होता है.
ऐसे परिवारों के लिए राशन, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक मदद जैसी योजनाएं राजनीतिक रूप से अहम बन सकती हैं. महिलाओं को भी अब सिर्फ परिवार के एक हिस्से के रूप में नहीं देखा जा सकता. वो खुद मतदाता हैं और सरकार के कामकाज का असर उनके फैसले पर पड़ता है. CSDS सर्वे में उम्मीदवार के काम और प्रदर्शन को बहुत अहम बताने वालों की संख्या भी ज्यादा थी.
कोर वोटर्स को साधना क्यों जरूरी?
हर चुनाव में पार्टियों के लिए ऐसे वोटर अहम होते हैं, जिनका झुकाव पहले से किसी पार्टी की ओर मजबूत होता है. 2022 के सर्वे में 74.4% वोटरों ने कहा कि उन्होंने उम्मीदवार से ज्यादा पार्टी को महत्व दिया. वहीं 47.3% मतदाताओं ने चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही अपना वोट तय कर लिया था. इसके अलावा 82.4% वोटरों ने कहा कि उन्होंने जिस पार्टी या उम्मीदवार को वोट दिया, वास्तव में उसी को वोट देना चाहते थे. इससे संकेत मिलता है कि पार्टियों के लिए अपने पारंपरिक और पहले से जुड़े वोटरों को बनाए रखना बेहद जरूरी है.



