अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरी प्रकरण के बाद अब मंदिर से जुड़े प्रशासन और प्रबंधन को लेकर व्यवस्था बनाई जा रही है. इसी कवायद के तहत राम मंदिर ट्रस्ट को आज बुधवार को पहला मुख्य कार्यपालक अधिकारी मिलने जा रहा है. CEO के चयन के लिए बनाई गई समिति ने अपनी प्रक्रिया पूरी कर ली है और 3 नामों का पैनल एक दिन पहले ही ट्रस्ट को सौंप दिया. आज लखनऊ में ट्रस्ट की बैठक हो रही है और यहीं एक नाम पर अंतिम मुहर लगने की संभावना जताई जा रही है.

चयनित पैनल में पूर्व IAS योगेश्वर राम मिश्रा के अलावा पूर्व IPS राजेश पांडेय और सेना के एक रिटायर्ड अधिकारी का नाम शामिल बताया जा रहा है. ऐसे में सवाल यह है कि राम मंदिर के प्रशासन की कमान किसे मिल सकता है? मिश्रा के पास गहरा प्रशासनिक अनुभव है तो पांडेय के पास पुलिस और सुरक्षा का खासा अनुभव है, या फिर ट्रस्ट किसी तीसरे नाम पर भरोसा जताएगा? देखिए ये खास रिपोर्ट…

5 हजार आवेदन में से 3 नाम तक कैसे आए

राम मंदिर में चंदा चोरी की घटना के बाद श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने यहां के कामकाज को देखने के लिए CEO की नियुक्ति का फैसला किया. राम मंदिर के पहले CEO के चयन की कहानी अपने आप में बेहद खास है. इस खास पद के लिए देशभर से 5,585 लोगों ने अप्लाई किया. फिर जांच समिति ने आवेदनों की शुरुआती छंटनी की.

इनमें से 3,577 उम्मीदवारों ने निर्धारित गूगल फॉर्म के जरिए अपनी योग्यता और अनुभव की जानकारी दी. फिर 600 अंकों के मूल्यांकन के आधार पर उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया गया. इस तरह से 470 या उससे ज्यादा अंक हासिल करने वाले 108 उम्मीदवारों का चयन वर्चुअल इंटरैक्शन के लिए किया गया.

योगेश्वर राम मिश्रा का नाम सबसे आगे

चार दिनों तक चली इस प्रक्रिया के बाद 17 उम्मीदवारों को आगे की इंटरव्यू के लिए चुना गया. इनमें से 16 उम्मीदवार अयोध्या पहुंचे. 2 दिनों तक इनका इंटरव्यू हुआ और आखिरकार 3 नामों का पैनल तैयार हुआ. अब इन 3 में से एक नाम पर ट्रस्ट को फैसला करना है. 3 नामों में सबसे ज्यादा चर्चा IAS अधिकारी रहे योगेश्वर राम मिश्रा की हो रही है. मिश्रा उत्तर प्रदेश कैडर के 2005 बैच के IAS अधिकारी रहे हैं. इससे पहले वह PCS अधिकारी के तौर पर भी काम कर चुके हैं.

मिश्रा के प्रशासनिक करियर की सबसे बड़ी खासियत है कि उनके पास धार्मिक नगरियों और बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम करने का अनुभव है. वाराणसी से लेकर अयोध्या तक… ऐसे शहरों में प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालने का खास अनुभव है, जहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. ऐसे में यहां की सुरक्षा, ट्रैफिक, भीड़ प्रबंधन और कई सरकारी विभागों के बीच तालमेल बेहद अहम होता है. यही वजह है कि मिश्रा CEO की रेस में सबसे मजबूत दावेदार के तौर पर देखे जा रहे हैं. उनके पक्ष में सबसे बड़ा फैक्टर है कि उनके पास ‘काशी और अयोध्या का अनुभव’ है.

उन्हें वाराणसी में काम करने के दौरान बड़े विकास कार्यों और केंद्र सरकार की प्राथमिकता वाली प्रोजेक्ट्स से जुड़ने की वजह से प्रशासनिक व्यवस्था का अनुभव मिला. अयोध्या में पोस्टिंग के दौरान उन्हें राम जन्मभूमि क्षेत्र के बदलते स्वरूप और बढ़ती श्रद्धालु संख्या से जुड़ी प्रशासनिक चुनौतियों को समझने का मौका मिला. वह बाराबंकी के जिलाधिकारी और मिर्जापुर मंडल के मंडलायुक्त जैसे अहम पदों पर भी रह चुके हैं. मिर्जापुर में विंध्याचल कॉरिडोर जैसे धार्मिक और विकास प्रोजेक्ट से जुड़ा अनुभव भी उनकी प्रोफाइल को खास बनाता है.

राम मंदिर के पहले CEO की जिम्मेदारी सिर्फ मंदिर के प्रशासनिक कामकाज तक सीमित नहीं होगी. अयोध्या में आने वाले वर्षों में श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है. ऐसे में पार्किंग से लेकर ट्रैफिक तक, सुरक्षा से लेकर श्रद्धालुओं की सुविधाओं तक ही नहीं बल्कि होटल और इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर अलगअलग सरकारी एजेंसियों के बीच तालमेल तक बनाना भी अहम चुनौती होगी. उन्हें कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा. और सबसे बड़ी चुनौती होगी आर्थिक पारदर्शिता और क्राउड मैनेजमेंट.

राजेश पांडेय का नाम भी चर्चा में

CEO की रेस में एक और नाम कम महत्वपूर्ण नहीं हैं, पूर्व IPS अधिकारी राजेश पांडेय. पुलिस सेवा से आने वाली उनकी प्रोफाइल योगेश्वर राम मिश्रा से बिल्कुल अलग दिखती है. पांडेय का 1986 में UPPSC से चयन हुआ था. 1989 में बतौर DSP पुलिस सेवा की शुरुआत की. फिर वह 2003 बैच के IPS अधिकारी बने. करीब 32 साल की पुलिस सेवा के बाद 30 जून 2021 को IG से रिटायर हुए. उनका पुलिस करियर कानूनव्यवस्था, सुरक्षा और ऑपरेशनल पुलिसिंग से जुड़ा रहा है.

राजेश पांडेय ने लखनऊ के अलावा अलीगढ़ और मेरठ जैसे अहम जिलों में SSP की जिम्मेदारी भी संभाली. UPSTF और ATS से भी उनका नाता रहा. पुलिस सेवा के दौरान कई बड़े ऑपरेशंस और एनकाउंटर के कारण उनकी प्रोफाइल चर्चा में रही. राम मंदिर जैसे हाईप्रोफाइल धार्मिक परिसर में सुरक्षा अपने आप में बड़ी चुनौती है.

इन तमाम मोर्चों पर उनके पास पुलिस प्रशासन का अनुभव बेहद महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि राजेश पांडेय का नाम भी CEO की रेस में मजबूती से देखा जा रहा है. अगर ट्रस्ट का फोकस सुरक्षा, ऑपरेशनल मैनेजमेंट और बड़े पैमाने पर भीड़ नियंत्रण पर रहता है, तो पांडेय की प्रोफाइल को भी नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.

CEO की रेस में तीसरा नाम किसका?

मंदिर से जुड़े प्रशासन से जुड़ी यह कहानी सिर्फ मिश्रा और पांडेय तक सीमित नहीं है. तीसरा नाम एक रिटायर सैन्य अधिकारी का बताया जा रहा है. हालांकि यह नाम अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है. सेना की बैकग्राउंड वाले अधिकारी के पास अनुशासन, बड़े स्तर पर मानव संसाधन प्रबंधन, ऑपरेशनल प्लानिंग और संकट के समय निर्णय लेने का अनुभव हो सकता है. यानी ट्रस्ट के सामने 3 अलगअलग तरह की विशेषज्ञता वाले विकल्प हैं प्रशासन, पुलिस और सेना.

हालांकि, चंदा चोरी से हुई किरकिरी के बाद ट्रस्ट अपनी छवि सुधारने के लिए ब्रिगेडियर रैंक के किसी रिटायर सैन्य अफसर को भी CEO बना सकता है. सूत्रों का कहना है कि ये सैन्य अफसर, विवेकानंद फाउंडेशन से जुड़ा हुआ है और अपनी सख्त तथा ईमानदार छवि की वजह से जांच समिति की भी पसंद है.

अयोध्या के भव्य राम मंदिर का निर्माण एक बड़े पड़ाव तक पहुंच चुका है, लेकिन अब चुनौती है इस विशाल धार्मिक परिसर को आने वाले दशकों के लिए मजबूत और पेशेवर संस्थागत व्यवस्था देना. शायद यही वजह है कि चंदा चोरी प्रकरण के बाद पहले CEO का चुनाव सिर्फ एक पद पर नियुक्ति नहीं है. बल्कि यह तय करेगा कि राम मंदिर के प्रशासनिक मॉडल की दिशा क्या होगी? इसी वजह से ट्रस्ट की आज की बैठक पर सभी की नजरें टिकी हैं. अब अंतिम फैसला श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को करना है.