23 जुलाई 1906 को जन्मे और महज 2425 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए. वे आजादी के ऐसे दीवाने थे कि नाम के आगे भी आजाद लगा लिया. अंग्रेज उनसे थरथर कांपते थे. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित क्रांतिकारियों में थे. वे साहसी थे. तेज़ निर्णय लेते थे. अपने साथियों की सुरक्षा को बहुत महत्व देते थे. उनकी एक खास पहचान उनका सटीक निशाना भी था. ऐसे ही थे भारतीयों के रगरग में बसे चंद्रशेखर आजाद.

आइए, उनकी जन्म जयंती के बहाने जानते हैं कि वे निशानेबाजी में महारथ हासिल करने में कैसे कामयाब हुए? किस उम्र में पिस्टलगोलियों से खेलने लगे?
कम उम्र में ही पक्के निशानेबाज हो गए थे
आज़ाद की निशानेबाजी केवल प्राकृतिक प्रतिभा नहीं थी. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। इसके पीछे बचपन का अभ्यास, मजबूत शरीर, धैर्य, सतर्कता और कठिन परिस्थितियों में शांत रहने की क्षमता थी. क्रांतिकारी जीवन में पिस्तौल उनके लिए शौक की वस्तु नहीं थी. वह आत्मरक्षा, साथीसुरक्षा और संगठन की जिम्मेदारी का साधन थी.
चंद्रशेखर आज़ाद का बचपन मध्य भारत के भाबरा क्षेत्र में बीता. यह क्षेत्र वन, पहाड़ और आदिवासी जीवन से जुड़ा था. वहां भील समुदाय के लोग रहते थे. भील समुदाय को तीरकमान चलाने की पारंपरिक कला के लिए जाना जाता है. आज़ाद ने बचपन में भील बच्चों के साथ तीर चलाने का अभ्यास किया. यह अभ्यास उनके लिए बहुत उपयोगी बना. तीरंदाजी में आंख, हाथ और लक्ष्य के बीच सही तालमेल चाहिए होता है. निशाना लगाते समय सांस, शरीर और ध्यान को नियंत्रित रखना पड़ता है. यही गुण आगे चलकर पिस्तौल चलाने में भी उनके काम आए. तीरकमान से मिला अभ्यास उनके हाथों की स्थिरता और नजर की एकाग्रता का आधार बना.
क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद.
इसलिए रखते थे पिस्तौल और गोलियां
जब आज़ाद क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े, तब परिस्थितियां बदल गईं. अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ संघर्ष बहुत कठिन था. पुलिस, खुफिया तंत्र और सरकारी बल लगातार क्रांतिकारियों की तलाश में रहते थे. ऐसी स्थिति में क्रांतिकारियों को अपनी रक्षा करनी पड़ती थी. साथियों को सुरक्षित निकालना भी जरूरी होता था, इसलिए आज़ाद ने तीरकमान के स्थान पर पिस्तौल और गोलियां रखना शुरू किया. लेकिन इसे केवल हथियार रखने की कहानी नहीं मानना चाहिए. आज़ाद के लिए पिस्तौल जिम्मेदारी का प्रतीक थी. उन्हें कई बार संगठन के वरिष्ठ साथियों की रक्षा करनी होती थी. वे खतरे के समय पीछे हटने वाले व्यक्ति नहीं थे. उनका उद्देश्य अंधाधुंध गोली चलाना नहीं था. वे परिस्थितियों को समझकर फैसला लेते थे. यही बात उन्हें सामान्य हथियारबंद व्यक्ति से अलग बनाती है.
नियमित शारीरिक अभ्यास उनकी पहचान
आज़ाद का शरीर बहुत मजबूत था. वे नियमित रूप से दंडबैठक करते थे. उनका शरीर गठा हुआ था. उनकी मांसपेशियां मजबूत थीं. वे पेड़ों पर चढ़ने में भी कुशल थे. शारीरिक फिटनेस का निशानेबाजी से गहरा संबंध है. मजबूत शरीर का मतलब केवल ताकत नहीं होता. इसका अर्थ है बेहतर संतुलन. निशाना लगाते समय हाथ कांपना नहीं चाहिए. शरीर का नियंत्रण जरूरी है. तनाव में भी शरीर को स्थिर रखना पड़ता है. आज़ाद कठिन जीवन जीते थे. वे कम साधनों में रहते थे. कई बार जमीन पर अखबार बिछाकर सो जाते थे. फिर भी उनका अनुशासन नहीं टूटता था. यह अनुशासन उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता को मजबूत करता था.
अपने मन पर जबरदस्त काबू रखते थे आजाद
अच्छा निशानेबाज केवल अच्छी आंख वाला व्यक्ति नहीं होता. उसे डर और दबाव में भी शांत रहना पड़ता है. आज़ाद इस गुण के लिए प्रसिद्ध थे. वे लंबे समय तक अंग्रेज पुलिस से बचते रहे. वे लगातार अपना भेष बदलते. कभी व्यापारी तो कभी कुली बनते. कभी साधु का रूप धारण करते थे तो कभी अंग्रेज़ी पहनावे में दिखाई देते थे. इस जीवन में हर समय पकड़े जाने का खतरा था. ऐसी स्थिति में घबराहट स्वाभाविक थी, लेकिन आज़ाद में मानसिक संतुलन था. वे खतरे के बीच भी स्थिति को पढ़ते थे. वे समझते थे कि कब रुकना है, कब आगे बढ़ना है और कब अपने साथी को बचाना है. यह मानसिक स्थिरता उनके निशाने को मजबूत बनाती थी.
साथियों की सुरक्षा पहली जिम्मेदारी समझते थे आजाद
चंद्रशेखर आज़ाद की निशानेबाजी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष साथियों की सुरक्षा था. वे अक्सर अपने साथियों को बचाने के लिए पीछे रहते थे. उनका काम केवल हमला करना नहीं था. उनका पीछा कर रहे लोगों को रोकना भी था. लाहौर में सांडर्स की हत्या के बाद ऐसा ही एक प्रसंग सामने आता है. योजना में भगत सिंह और राजगुरु मुख्य भूमिका में थे. आज़ाद को पीछे से सुरक्षा देने की जिम्मेदारी मिली थी. घटना के बाद भगत सिंह और राजगुरु वहां से निकल रहे थे. हेड कॉन्स्टेबल चानन सिंह उनका पीछा कर रहा था. आज़ाद ने उसे रुकने की चेतावनी दी. जब उसने पीछा जारी रखा, तो आज़ाद ने गोली चलाई. यह घटना बताती है कि आज़ाद केवल निशाना लगाने में कुशल नहीं थे. वे संकट में अपने साथियों की रक्षा करने के लिए तैयार रहते थे. उनके लिए संगठन और साथियों की जान बहुत महत्वपूर्ण थी.
अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से हुई अंतिम लड़ाई
चंद्रशेखर आज़ाद की निशानेबाजी की चर्चा उनकी अंतिम लड़ाई के कारण भी होती है. 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने उन्हें घेर लिया. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। आज यह पार्क चंद्रशेखर आज़ाद के नाम से ही जाना जाता है. उस समय वे अकेले नहीं थे. उनके साथ सुखदेव भी थे. आज़ाद ने पहले अपने साथी को सुरक्षित निकलने का अवसर दिया. उसके बाद वे पुलिस का सामना करते रहे.
बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के आईजी रहे हॉलिंस के हवाले से आज़ाद के निशाने की प्रशंसा का उल्लेख मिलता है. हॉलिंस ने लिखा कि आज़ाद की पहली गोली नॉट बावर के कंधे में लगी थी. पुलिस इंस्पेक्टर विशेश्वर सिंह को भी गंभीर चोट लगी थी. हॉलिंस के अनुसार आज़ाद की गोलियां पेड़ पर इंसान की औसत ऊंचाई के आसपास लगी थीं. दूसरी ओर पुलिस की कई गोलियां काफी ऊपर लगी थीं. इस विवरण से यह संकेत मिलता है कि घिर जाने और घायल होने के बाद भी आज़ाद का नियंत्रण खुद पर बना हुआ था. यह उनके धैर्य और अभ्यास की बड़ी मिसाल है.
आजाद के लिए पिस्तौल का अर्थ क्या था?
आज़ाद के जीवन में पिस्तौल का अर्थ हिंसा का प्रदर्शन नहीं था. वह औपनिवेशिक दमन के दौर में आत्मरक्षा और प्रतिरोध का साधन थी. उस समय अनेक क्रांतिकारियों का मानना था कि अंग्रेज़ी शासन के सामने केवल अपील से आज़ादी नहीं मिलेगी. हालांकि, स्वतंत्रता आंदोलन में कई विचारधाराएं थीं. महात्मा गांधी अहिंसा और जनआंदोलन के पक्षधर थे. दूसरी ओर आज़ाद, भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारी प्रतिरोध का रास्ता चुन रहे थे. दोनों धाराओं का लक्ष्य भारत की आज़ादी था, लेकिन तरीके अलग थे. आज़ाद की पिस्तौल उनके चुने हुए रास्ते का हिस्सा थी. फिर भी उनका व्यक्तिगत जीवन अनुशासन, सादगी और साथियों के प्रति समर्पण से भरा था.
कम शब्दों में कहें तो चंद्रशेखर आज़ाद निशानेबाजी में इसलिए पक्के थे क्योंकि उन्होंने बचपन से लक्ष्य साधने का अभ्यास किया था. भील बच्चों के साथ तीरंदाजी ने उनकी नजर और हाथों को प्रशिक्षित किया. क्रांतिकारी जीवन ने उन्हें पिस्तौल का कुशल उपयोग सिखाया. उनकी शारीरिक शक्ति, मानसिक संतुलन और अनुशासन ने इस कौशल को और मजबूत बनाया. वे निशानेबाज जरूर थे, लेकिन उनकी पहचान केवल इसी तक सीमित नहीं थी. उनका जीवन यह बताता है कि किसी भी कौशल के पीछे अभ्यास, अनुशासन और स्पष्ट उद्देश्य का बड़ा महत्व है.



