रीनीट 2026 परीक्षा के दौरान पश्चिम बंगाल के मालदा स्थित एक परीक्षा केंद्र पर हुई कथित फ्रिस्किंग को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. छात्रा ऋषिका पाल ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि परीक्षा केंद्र में सुरक्षा जांच के दौरान उनसे पूछा गया कि क्या वे पीरियड्स में हैं. छात्रा के अनुसार, ‘हां’ कहने के बाद उन्हें सैनिटरी पैड की जांच के लिए कपड़े नीचे करने को कहा गया. उन्होंने इसे अपमानजनक और मानसिक रूप से परेशान करने वाला अनुभव बताया. यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और देखते ही देखते देशभर के कई छात्रों ने अपने अनुभव साझा करने शुरू कर दिए.

ऋषिका पाल की पोस्ट के नीचे सैकड़ों कमेंट सामने आईं, जिनमें कई छात्राओं ने दावा किया कि उन्हें भी इसी तरह की जांच से गुजरना पड़ा था. कुछ छात्राओं ने आरोप लगाया कि सुरक्षा जांच के नाम पर उनके निजी अंगों को छुआ गया, जबकि कुछ ने कहा कि उन्हें ब्रा या अन्य कपड़ों की जांच के लिए असहज स्थिति में डाला गया. कई अभ्यर्थियों ने दावा किया कि उनसे भी पीरियड्स के बारे में सवाल पूछे गए थे. हालांकि कुछ छात्राओं ने यह भी कहा कि उनके परीक्षा केंद्रों पर जांच सामान्य और सम्मानजनक तरीके से की गई थी.

क्या यह सिर्फ एक केंद्र की बात थी?
सोशल मीडिया पर सामने आए अनुभवों ने इस मामले को एक छात्रा की शिकायत से कहीं बड़ा बना दिया. कई अभ्यर्थियों ने दावा किया कि उन्हें नीट, रीनीट, CUET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान भी इसी तरह की असहज जांच का सामना करना पड़ा था. हालांकि सभी केंद्रों पर ऐसा नहीं हुआ. यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है कि यदि कुछ परीक्षा केंद्र सुरक्षा जांच को सम्मानजनक तरीके से कर सकते हैं, तो कुछ जगहों पर छात्रों को असुविधा और अपमान का सामना क्यों करना पड़ा?

मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी छात्र को परीक्षा से ठीक पहले अपमान, असहजता या निजी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप जैसा अनुभव होता है, तो उसका सीधा असर प्रदर्शन पर पड़ सकता है. मनोविज्ञान से जुड़े शोध बताते हैं कि ऐसी परिस्थितियां तनाव, घबराहट, ध्यान भटकने और आत्मविश्वास में कमी जैसी समस्याएं पैदा कर सकती हैं. कई छात्राओं ने सोशल मीडिया पर लिखा कि वे परीक्षा से पहले मानसिक रूप से विचलित हो गई थीं और पेपर पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रही थीं.

सुरक्षा और गरिमा के बीच संतुलन कैसे बने?
परीक्षा सुरक्षा को लेकर कोई विवाद नहीं है. पेपर लीक और नकल रोकने के लिए सुरक्षा जांच जरूरी मानी जाती है. लेकिन अब छात्र और अभिभावक सवाल उठा रहे हैं कि सुरक्षा के नाम पर व्यक्तिगत गरिमा की सीमा कहां तय की जानी चाहिए. यदि एयरपोर्ट, अदालत और अन्य संवेदनशील स्थानों पर सम्मानजनक तरीके से सुरक्षा जांच संभव है, तो परीक्षा केंद्रों पर भी ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती? यही सवाल इस पूरे विवाद के केंद्र में है.

क्या चाहिए छात्रों को?
छात्राओं की मांग है कि सुरक्षा जांच के लिए स्पष्ट और एक समान दिशानिर्देश लागू किए जाएं. साथ ही ऐसी व्यवस्था हो जिसमें परीक्षा की सुरक्षा भी बनी रहे और किसी भी अभ्यर्थी की गरिमा, निजता और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित न हो. फिलहाल यह मामला सोशल मीडिया पर बहस का विषय बना हुआ है और कई लोग परीक्षा केंद्रों पर फ्रिस्किंग के तरीकों की समीक्षा की मांग कर रहे हैं.