रिलायंस जियो के बहुप्रतीक्षित आईपीओ की हलचल बाजार में तेज हो गई है. जियो प्लेटफॉर्म्स लिमिटेड ने बाजार नियामक सेबी के पास अपने ड्राफ्ट पेपर जमा कर दिए हैं. इस ड्राफ्ट से एक बेहद चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है. एचएफसीएल के संस्थापक और प्रबंध निदेशक महेंद्र नाहटा को अपने शुरुआती निवेश पर 11,983 फीसदी का भारीभरकम मुनाफा हुआ है. नाहटा ने जियो में केवल 10 रुपये प्रति शेयर के भाव पर हिस्सेदारी खरीदी थी, जिसकी वैल्यू अब करीब 5,800 करोड़ रुपये हो चुकी है. इस आईपीओ के तहत कंपनी कोई पुराना शेयर नहीं बेचेगी , बल्कि सीधे नए शेयर जारी करके पूंजी जुटाएगी. फिलहाल नाहटा समेत कोई भी मौजूदा निवेशक अपनी हिस्सेदारी नहीं बेच रहा है.

47 करोड़ का निवेश बना 5800 करोड़ की दौलत

बाजार के दिग्गज ब्रोकरेज हाउस मोतीलाल ओसवाल ने जियो प्लेटफॉर्म्स की कुल इक्विटी वैल्यू 10.7 लाख करोड़ रुपये आंकी है. इस मूल्यांकन के आधार पर, महेंद्र नाहटा की 0.54% हिस्सेदारी अब लगभग 5,800 करोड़ रुपये की हो गई है. यह स्थिति रातोंरात नहीं बनी. जियो प्लेटफॉर्म्स के अस्तित्व में आने के आठ महीने बाद, 7 जुलाई 2020 को नाहटा परिवार ने दो किस्तों में ये शेयर हासिल किए थे. नाहटा परिवार ने 10 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से डिबेंचर को बदलकर 37.04 मिलियन शेयर प्राप्त किए. इसके साथ ही रिलायंस ने उन्हें 10.83 मिलियन शेयर अतिरिक्त आवंटित किए. इस पूरे सौदे में उनकी कुल लागत महज 47.87 करोड़ रुपये आई थी, जो आज 121 गुना बढ़ चुकी है.

विदेशी दिग्गजों की तुलना में कौड़ियों के भाव मिले शेयर

इस सौदे की सबसे दिलचस्प बात शेयरों की कीमत है. जिस दिन नाहटा परिवार को 10 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से जियो में हिस्सेदारी मिली, उसी दिन दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियों ने काफी ऊंची कीमत पर निवेश किया था. रिलायंस ने मेटा को 488.34 रुपये प्रति शेयर के भाव पर शेयर आवंटित किए. इसके अलावा गूगल, केकेआर, मुबाडाला और टीपीजी जैसे 13 बड़े वैश्विक निवेशकों ने मिलकर कंपनी का 33% हिस्सा खरीदने के लिए 1,52,056 करोड़ रुपये लगाए. इनमें से ज्यादातर निवेशकों ने प्रति शेयर 549.31 रुपये चुकाए. यानी दुनिया के सबसे बड़े संस्थागत निवेशकों ने जो भारीभरकम कीमत दी, उसके सामने नाहटा परिवार की एंट्री प्राइस ना के बराबर थी.

एक दशक पहले लिखी गई थी मुनाफे की स्क्रिप्ट

इस ऐतिहासिक मुनाफे की कहानी साल 2010 में ही शुरू हो गई थी. 11 जून 2010 को महेंद्र नाहटा की कंपनी ‘इन्फोटेल ब्रॉडबैंड सर्विसेज’ ने 12,872 करोड़ रुपये में पूरे भारत के लिए टेलीकॉम स्पेक्ट्रम जीता था. इसके कुछ ही घंटों बाद, रिलायंस इंडस्ट्रीज ने 4,800 करोड़ रुपये में इन्फोटेल ब्रॉडबैंड की 95% हिस्सेदारी खरीद ली. नाहटा के पास सिर्फ 5% हिस्सा बचा रहा. रिलायंस ने बाद में उस स्पेक्ट्रम की पूरी कीमत चुकाई जिसे इन्फोटेल ने जीता था. यही 5% हिस्सेदारी आगे चलकर जियो प्लेटफॉर्म्स की नींव बनी, जिसने आज इस निवेश को मुनाफे के एक विशाल पहाड़ में बदल दिया है.

आईपीओ से जुटाई रकम का इस्तेमाल

जियो ने अपने इस नए आईपीओ से जुटाई जाने वाली रकम के इस्तेमाल का खाका भी साफ कर दिया है. कंपनी इस इश्यू से मिलने वाले 27,500 करोड़ रुपये का इस्तेमाल अपनी मुख्य टेलीकॉम सब्सिडियरी, रिलायंस जियो इन्फोकॉम के कर्ज चुकाने के लिए करेगी. बाकी बची हुई रकम सामान्य कॉर्पोरेट जरूरतों पर खर्च की जाएगी. कंपनी के मौजूदा शेयर होल्डिंग पैटर्न को देखें, तो रिलायंस इंडस्ट्रीज का 66.43% हिस्सेदारी के साथ मजबूत नियंत्रण बना हुआ है. बाहरी निवेशकों में मेटा 9.98% के साथ सबसे बड़ा हिस्सेदार है, जिसके बाद गूगल की 7.73% हिस्सेदारी है.