रूस के साइबेरिया में एक लैब टेक्नीशियन की मौत के बाद प्लेग को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान महामारी की तैयारी पर खींच दिया है. इरकुत्स्क के एंटीप्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट में काम करने वाली एक महिला की गंभीर निमोनिया के बाद मौत हुई और उसके बाद संपर्क में आए लोगों की निगरानी और सुरक्षा उपायों की खबरें सामने आईं. हालांकि, उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के मुताबिक इस मौत को प्लेग संक्रमण के तौर पर कंफर्म नहीं किया गया है.

ऐसे में इस घटना को लेकर सामने आ रहे दावों और आशंकाओं को तथ्य से अलग रखना जरूरी है. लेकिन रूस की इस घटना ने एक अहम सवाल जरूर खड़ा किया है कि अगर कोरोना जैसी कोई नई संक्रामक बीमारी अचानक फैलने लगे, तो भारत उसे कितनी जल्दी पहचान और रोक सकता है? कोरोना महामारी ने भारत समेत पूरी दुनिया को दिखाया था कि महामारी से लड़ाई केवल अस्पताल और डॉक्टर बढ़ाने तक सीमित नहीं हो सकती.
₹64,180 करोड़ का PMABHIM
बीमारी की जल्दी पहचान, लैब जांच, संक्रमण की निगरानी, जीनोम सीक्वेंसिंग, गंभीर मरीजों के इलाज और केंद्रराज्य के बीच तेज तालमेल की भी जरूरत होती है. इसी अनुभव के बाद भारत ने हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर काम शुरू किया.
इनमें 64,180 करोड़ रुपये का PMABHIM, 163 जांच लैब का नेटवर्क, 4 जीनोम सीक्वेंसिंग हब, 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक और वन हेल्थ मिशन जैसी पहल शामिल हैं. हालांकि, इन योजनाओं की घोषणा और जमीन पर उनका पूरा इस्तेमाल ये दो अलग बातें हैं. यूपी के कुछ वित्तीय आंकड़े इसी अंतर की ओर इशारा करते हैं.
भारत की महामारी तैयारी के 5 बड़े आंकड़े
₹64,180 करोड़: PMABHIM के लिए 202122 से 202526 तक प्रावधान.
163 लैब: ICMR के VRDL नेटवर्क में संक्रामक रोगों की जांच के लिए.
4 जीनोम हब: नए रोगजनकों और उनके जेनेटिक बदलावों की जांच के लिए.
602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक: गंभीर मरीजों के इलाज की क्षमता बढ़ाने की योजना.
22 BSL3/4 लैब: वन हेल्थ मिशन के तहत उच्च जोखिम वाले रोगजनकों की जांच के नेटवर्क में.
बीमारी की पहचान के लिए 163 लैब का नेटवर्क
महामारी के समय सबसे पहला सवाल होता है कि बीमारी आखिर है क्या. कोरोना के शुरुआती दौर में टेस्टिंग क्षमता बढ़ाना बड़ी चुनौती थी. इसी अनुभव के बाद भारत में ICMR के वायरल रिसर्च एंड डायगनोस्टिक लैब्रोटरी यानी VRDL नेटवर्क को 163 लैब तक बढ़ाया गया है. इनमें 11 रीजनल, 27 स्टेट और 125 मेडिकल कॉलेज लैब शामिल हैं. इस नेटवर्क का मकसद देश के अलगअलग हिस्सों में संक्रामक बीमारियों की जांच की क्षमता बढ़ाना है.
अगर किसी इलाके में कोई नया संक्रमण सामने आता है तो हर सैंपल को किसी एक बड़े शहर की लैब में भेजने की जरूरत कम हो सकती है. इससे बीमारी की पहचान और रिपोर्टिंग तेजी से करने में मदद मिल सकती है. रूस के मौजूदा मामले को देखें तो वहां भी सबसे अहम सवाल यही है कि बीमारी वास्तव में क्या है. केवल निमोनिया, क्वारंटीन या किसी रिसर्च लैब में काम करने के आधार पर प्लेग की पुष्टि नहीं होती. बीमारी की सही पहचान के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी है.
सिर्फ बीमारी नहीं, उसके बदलाव पर भी नजर
आज महामारी की तैयारी में केवल यह पता लगाना काफी नहीं है कि वायरस या बैक्टीरिया मौजूद है. यह देखना भी जरूरी है कि उसमें कोई महत्वपूर्ण जेनेटिक बदलाव तो नहीं आया. इसी उद्देश्य से भारत में 4 इलाके में आधुनिक जीन जांच केंद्र बनाए गए हैं. जीनोम जांच से वैज्ञानिक किसी रोगजनक के जेनेटिक बदलावों को समझ सकते हैं. इससे बीमारी के फैलने के तरीके और उसके संभावित बदलावों पर निगरानी रखने में मदद मिलती है.
महामारी में गंभीर मरीजों के लिए 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक
कोरोना ने यह भी दिखाया कि महामारी के दौरान अस्पतालों में सबसे ज्यादा दबाव गंभीर मरीजों के इलाज पर पड़ता है. ऑक्सीजन, ICU और क्रिटिकल केयर बेड की मांग अचानक बढ़ सकती है. इसी को ध्यान में रखते हुए PMABHIM के तहत 602 क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक बनाने की योजना है.
साथ ही 3,382 ब्लॉक पब्लिक हेल्थ यूनिट और 730 इंटीग्रेटेड पब्लिक हेल्थ लैब विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है. इसके अलावा 17,788 सबहेल्थ सेंटरों को आयुष्मान आरोग्य मंदिर में अपग्रेड करने की मंजूरी दी गई है और शहरों में 11,024 अर्बन आयुष्मान आरोग्य मंदिर बनाए जा रहे हैं. इसका उद्देश्य बीमारी की रोकथाम और शुरुआती इलाज को स्थानीय स्तर तक पहुंचाना है.
महामारी पर नजर रखने के लिए रियल टाइम सिस्टम
महामारी से लड़ने के लिए सिर्फ अस्पताल और लैब पर्याप्त नहीं हैं. बीमारी कहां बढ़ रही है, कितने मामले सामने आ रहे हैं और संक्रमण किस दिशा में जा रहा है—इसकी लगातार निगरानी भी जरूरी है. इसके लिए NCDC का इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम यानी IDSP काम करता है. वहीं इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफार्मेशन प्रोग्राम यानी IHIP के जरिए बीमारी की रिपोर्टिंग और निगरानी को मजबूत करने की कोशिश की गई है.
संभावित प्रकोप की स्थिति में विशेषज्ञों की टीम जांच और जोखिम का आकलन कर सकती है. इसके अलावा मॉक ड्रिल और सिमुलेशन एक्सरसाइज के जरिए यह भी परखा जाता है कि स्वास्थ्य एजेंसियां आपात स्थिति में कितनी तेजी से प्रतिक्रिया कर सकती हैं. वेस्टवॉटर सर्विलांस भी कुछ रोगजनकों के शुरुआती संकेत पकड़ने की कोशिश का हिस्सा है.
इंसानों के साथ जानवरों पर भी नजर
नई महामारी का खतरा केवल इंसानों से नहीं आता. कई संक्रमण जानवरों से इंसानों तक पहुंच सकते हैं. इसी वजह से भारत ने नेशनल वन हेल्थ मिशन शुरू किया है. इस मिशन में 13 से ज्यादा मंत्रालय और विभाग जुड़े हैं. इसका उद्देश्य इंसान, जानवर और पर्यावरण की सेहत को एक साथ समझना है. मिशन के तहत 22 BSL3/4 लैब के नेटवर्क पर भी काम किया जा रहा है.
नागपुर में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वन हेल्थ को विकसित किया जा रहा है और ICMR को मिशन लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है. इसमें बीमारी की निगरानी, आउटब्रेक की जांच, रिसर्च और डेटा शेयरिंग पर जोर है.
यूपी के आंकड़े बताते हैं जमीन पर चुनौती भी है
देश की तैयारी के साथ यह देखना भी जरूरी है कि राज्यों में पैसा और सुविधाएं कितनी तेजी से जमीन पर पहुंच रही हैं. उत्तर प्रदेश के 202526 के आंकड़ों के मुताबिक, NHM के तहत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 1,500.93 करोड़ रुपये मंजूर किए गए थे. उपलब्ध प्रोविजनल आंकड़ों में 83.66 करोड़ रुपये खर्च दिखाया गया है. PMABHIM के तहत यूपी के लिए 211.88 करोड़ रुपये केंद्र से जारी किए गए, जबकि रिपोर्ट में कुल खर्च 511.46 करोड़ रुपये बताया गया है.
इसमें राज्य की हिस्सेदारी और पिछली बची राशि भी शामिल हो सकती है. यूपी में PMABHIM के तहत 74 क्रिटिकल केयर ब्लॉक्स को मंजूरी भी मिली है. ये आंकड़े बताते हैं कि महामारी की तैयारी में केवल बजट मंजूर करना ही काफी नहीं है, बल्कि उसका समय पर इस्तेमाल और सुविधाओं का संचालन भी उतना ही जरूरी है.
2026 के हेल्थ बजट में भी तैयारी पर जोर
केंद्रीय बजट 202627 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 1,06,530.42 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. PMABHIM के लिए 4,770 करोड़ रुपये रखे गए हैं, जो पिछले संशोधित अनुमान के 2,845 करोड़ रुपये से 67.66% ज्यादा है. इसके अलावा NHM के लिए 39,390 करोड़ रुपये, PMJAY के लिए 9,500 करोड़ रुपये और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के लिए 4,821.21 करोड़ रुपये का प्रावधान है. ICMR के लिए 4,000 करोड़ रुपये रखे गए हैं.
क्या भारत कोरोना जैसी महामारी के लिए तैयार?
आंकड़े बताते हैं कि भारत ने कोरोना के बाद अपनी तैयारी को सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रखा. 163 लैब, 4 जीनोम हब, 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक, निगरानी सिस्टम और वन हेल्थ मिशन मिलकर एक व्यापक ढांचा तैयार करने की कोशिश हैं.



