झारखंड में पुलिस महानिदेशक यानी DGP की नियुक्ति को लेकर केंद्र और राज्य सरकार आमनेसामने हैं. केंद्र सरकार ने राज्य में DGP की नियुक्ति के लिए बनाए गए 2025 के नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. केंद्र का कहना है कि इन नियमों में पुलिस सुधार से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया है.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर झारखंड के 2025 के नियमों को गैरकानूनी घोषित करने की मांग की है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार को अर्जी पर जल्द सुनवाई की मांग की. CJI सूर्य कांत ने कहा कि अर्जी पर गुरुवार को सुनवाई की जाएगी.
केंद्र का मुख्य तर्क प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से जुड़ा है. केंद्र के मुताबिक झारखंड सरकार ने DGP के चयन और नियुक्ति से जुड़े नियम बनाने से पहले सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी नहीं ली. राज्य सरकार ने इन नियमों के आधार पर DGP की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव किया.
कब से शुरू हुआ विवाद?
मामला सबसे पहले अनुराग गुप्ता की नियुक्ति को लेकर उठा था. झारखंड सरकार ने 2 फरवरी 2025 को उन्हें दो साल के लिए DGP नियुक्त किया था. उस समय उनकी नियमित सेवा में करीब तीन महीने ही बचे थे. उनकी सेवानिवृत्ति 30 अप्रैल 2025 को होनी थी. कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी यानी गृह मंत्रालय ने 22 अप्रैल, 3 मई और 23 मई 2025 को पत्र भेजकर इस नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी.
इसके बाद राज्य सरकार ने 29 दिसंबर 2025 को एक प्रस्ताव के जरिए DGP नियुक्ति के लिए छह महीने की न्यूनतम बची सेवा की शर्त हटा दी. इसके अगले दिन यानी 30 दिसंबर को तदाशा मिश्रा को DGP नियुक्त किया गया. हालांकि, वह 31 दिसंबर 2025 को ही रिटायर होने वाली थीं.
MHA ने 6 जनवरी 2026 को राज्य सरकार से नए नियम और तदाशा मिश्रा की नियुक्ति वापस लेने को कहा. केंद्र का आरोप है कि राज्य ने DGP को दो साल का कार्यकाल देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का चयनात्मक इस्तेमाल किया और निर्धारित चयन प्रक्रिया का पालन नहीं किया.
सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई 2026 को झारखंड में एक्टिंग DGP के काम करने का संज्ञान लेते हुए राज्य से अनुपालन हलफनामा मांगा था. अब केंद्र चाहता है कि अदालत 2025 के नियमों के तहत की गई DGP नियुक्तियों को गैरकानूनी घोषित करे.



