गोरखपुर में समाजवादी पार्टी के प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हुआ थप्पड़कांड अब सिर्फ पार्टी के अंदर का विवाद नहीं रह गया है. मामला धीरेधीरे जातीय गोलबंदी की तरफ बढ़ता दिख रहा है. एक तरफ निषाद समाज के नेता और निषाद पार्टी अध्यक्ष संजय निषाद ने इस घटना को समाज के सम्मान से जोड़ते हुए सपा नेतृत्व पर कार्रवाई का दबाव बनाया, तो दूसरी तरफ अंशुमान सिंह के समर्थन में क्षत्रिय समाज के लोगों की लामबंदी सामने आई है.

शुरुआत कहां से हुई?

2 अक्टूबर को गोरखपुर प्रेस क्लब में समाजवादी पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बैठने की जगह को लेकर विवाद हुआ. आरोप है कि सपा नेता अंशुमान सिंह के बेटे कमलेश सिंह ने पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष राम नगीना साहनी को थप्पड़ मार दिया. विवाद बढ़ा तो वहां हाथापाई और हंगामा हुआ. राम नगीना साहनी ने खुद को निषाद समुदाय से जोड़ते हुए आरोप लगाया कि उनके साथ जातीय आधार पर भी व्यवहार किया गया.

हालांकि दूसरी तरफ अंशुमान सिंह ने इसे राजनीतिक साजिश बताया. विवाद के बाद सपा ने अंशुमान सिंह को पार्टी से बाहर कर दिया और गोरखपुर की जिलामहानगर इकाइयों को भी भंग कर दिया. मामले में पुलिस ने अलगअलग शिकायतों के आधार पर मुकदमे भी दर्ज किए हैं.

फिर मैदान में उतरे संजय निषाद

निषाद पार्टी के अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री संजय निषाद ने खुलकर राम नगीना साहनी के पक्ष में आवाज उठाई. उन्होंने अखिलेश यादव से कार्रवाई की मांग की और चेतावनी दी कि कार्रवाई नहीं हुई तो सपा कार्यालय का घेराव किया जाएगा. संजय निषाद ने यह भी कहा कि निषाद समाज के किसी कार्यकर्ता के साथ ऐसा व्यवहार स्वीकार नहीं किया जाएगा. संजय निषाद की बयानबाजी के बाद विवाद का दूसरा पक्ष भी सक्रिय हुआ. अंशुमान सिंह के समर्थन में क्षत्रिय समाज की बैठक और लामबंदी की खबरें सामने आईं. संजय निषाद के कुछ तीखे बयानों पर क्षत्रिय समाज ने भी आपत्ति जताई और विरोध दर्ज कराया.

गोरखपुर में जातीय राजनीति नई नहीं

गोरखपुर की राजनीति में ठाकुर और ब्राह्मण ध्रुवीकरण की चर्चा लंबे समय से होती रही है, लेकिन पिछले कुछ सालों में इस समीकरण में एक महत्वपूर्ण तीसरा सामाजिक समूह मजबूती से उभरा है, वो है निषाद. गोरखपुर और पूर्वांचल में निषाद समुदाय की अच्छीखासी मौजूदगी है. निषाद आबादी करीब 4.5 से 5 प्रतिशत मानी जाती है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़, बलिया, मऊ, गाजीपुर, मिर्जापुर, भदोही और जौनपुर समेत कई जिलों में इस समुदाय की राजनीतिक अहमियत बताई जाती है.

BJP के साथ निषादों का गठजोड़

2017 के बाद BJP ने गैरयादव OBC और छोटी पिछड़ी जातियों को अपने सामाजिक समीकरण में जोड़ने की रणनीति को मजबूत किया. इसी दौर में निषाद पार्टी के साथ BJP का राजनीतिक गठबंधन हुआ और निषाद समाज को सत्ता और संगठन में प्रतिनिधित्व देने का संदेश गया. निषादों की राजनीतिक ताकत को लेकर 2019 तक राष्ट्रीय स्तर पर भी यह चर्चा थी कि समुदाय अब पूर्वी यूपी में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बॉर्गेनिंग ग्रुप बन चुका है.

2024 के लोकसभा चुनाव में BJP के रवि किशन ने गोरखपुर सीट जीती, लेकिन समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार काजल निषाद ने करीब 4.82 लाख वोट हासिल किए. वहीं 2024 में गोरखपुर लोकसभा की पांचों विधानसभा सीटों पर BJP उम्मीदवार आगे रहे, लेकिन ग्रामीण इलाके में मुकाबला काफी करीबी रहा. गोरखपुर ग्रामीण में BJP की बढ़त महज करीब 3 हजार वोट की थी. ऐसे में अगर निषाद नाराज होते हैं तो बीजेपी का समीकरण बिगड़ सकता है.

बीजेपी से वैसे भी निषाद नाराज!

इस मामले में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा समय में निषाद, बीजेपी से नाराज हैं… ऐसे में यह घटना जितनी बड़ी होती जाएगी, उतना बीजेपी को नुकसान होगा… बीजेपी से निषादों की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह उनको अनुसूचित जाति में शामिल न करना है. कई दशकों से निषाद अपने आपको SC में शामिल करने की मांग कर रहे हैं. इसी मांग को लेकर संजय निषाद ने निषाद पार्टी भी बनाई. 10 साल से संजय निषाद बीजेपी के साथ हैं, लेकिन यह मांग पूरी नहीं हुई.

सपा के लिए भी मामला आसान नहीं

इस विवाद में सपा की मुश्किल यह है कि घटना उसके ही कार्यक्रम में हुई. पार्टी ने कार्रवाई करके संदेश देने की कोशिश की है. अंशुमान सिंह को बाहर किया गया और गोरखपुर की जिलामहानगर इकाइयों को भंग किया गया. इसके अलावा मारपीट के मामले में कई सपा नेताओं के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए हैं, लेकिन दूसरी तरफ निषाद समाज की नाराजगी को BJP अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर सकती है.