सड़क पर चलते हुए आम तौर पर लोगों को लगता है कि चौड़ी सड़क और तेज रफ्तार सफर को आसान बना देगी. लेकिन देश के राष्ट्रीय राजमार्गों से जुड़े आंकड़े एक अलग तस्वीर दिखाते हैं. सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सामने आया कि राष्ट्रीय राजमार्ग देश की कुल सड़कों की लंबाई का करीब 2 प्रतिशत हैं, लेकिन सड़क दुर्घटनाओं में उनका योगदान करीब 30 प्रतिशत तक है. यही आंकड़ा अब सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है कि आखिर जिन सड़कों को देश की सबसे बेहतर और सुरक्षित सड़कों में गिना जाता है, वहीं हादसों और मौतों का आंकड़ा इतना ज्यादा क्यों है?

यह मामला सिर्फ सड़क की चौड़ाई या उसकी गुणवत्ता का नहीं है. हाईवे पर वाहन ज्यादा तेज रफ्तार से चलते हैं, लंबी दूरी के ट्रक और भारी वाहन लगातार दौड़ते हैं और कई जगह वाहन सड़क के किनारे या गलत जगह पर खड़े मिल जाते हैं. ऐसे में अगर निगरानी कमजोर हो, ब्लैक स्पॉट पर पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम न हों या सड़क पर अचानक कोई बाधा आ जाए तो हादसा बेहद गंभीर हो सकता है.
2025 में एक्सीडेंट में 1.83 लाख मौतें
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी NHAI से पूछा कि उसके पास संसाधन होने के बावजूद हाईवे पर खड़े वाहनों की तुरंत निगरानी के लिए इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम क्यों नहीं है. यह सवाल बताता है कि समस्या सिर्फ ड्राइवर की गलती नहीं, बल्कि हाईवे की निगरानी और प्रबंधन से भी जुड़ी है. 2026 के जुलाई में सड़क परिवहन मंत्रालय ने संसद को बताया था कि 2025 में सड़क दुर्घटना से कुल 1 लाख 83 हजार लोगों की मौत हुई है. इनमें 57,482 मौतें एनएचआई पर हुई है.
क्या कहता है बाकी सारा आंकड़ा?
सड़क परिवहन मंत्रालय के मुताबिक NHAI पर ओवर स्पीडिंग के कारण सबसे ज्यादा मौतें हो रही है. रॉन्ग साइड और शराब पीकर गाड़ी चलाने से 7 प्रतिशत मौतें हो रही है. सभी आंकड़ों की बात करें, तो 2024 में देश में करीब 4.73 लाख सड़क हादसे हुए और इनमें करीब 1.70 लाख लोगों की मौत हुई. इनमें 52,600 से ज्यादा मौतें नेशनल हाईवे पर दर्ज की गईं. यानी देश के सबसे महत्वपूर्ण सड़क नेटवर्क पर होने वाली मौतों की संख्या अब भी बेहद बड़ी है.
आंकड़ों में समझिए हाईवे का खतरा
- 1.46 लाख किमी: देश में नेशनल हाईवे नेटवर्क की लंबाई.
- 52,600+ मौतें: 2024 में नेशनल हाईवे पर दर्ज हुईं.
- 35.7%: 2019 में कुल सड़क मौतों में NH की हिस्सेदारी.
- 36.4%: 2020 में नेशनल हाईवे की मौतों में हिस्सेदारी.
- 13,795 ब्लैक स्पॉट: देश के नेशनल हाईवे पर चिन्हित किए गए.
- 5,036 ब्लैक स्पॉट: मार्च 2025 तक जहां स्थायी सुधार पूरा हो चुका था.
पिछले सालों के आंकड़ों का कैसा रहा है हाल?
नेशनल हाईवे की लंबाई देश की कुल सड़कों के मुकाबले छोटी है, लेकिन हादसों में इसका हिस्सा काफी ज्यादा रहता है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2019 में देश की कुल सड़क लंबाई में नेशनल हाईवे की हिस्सेदारी करीब 2.1% थी, जबकि सड़क हादसों में मौतों में उनका हिस्सा 35.7% था. 2020 में भी यह हिस्सेदारी 36.4% रही. 2022 में नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे पर 1,51,997 हादसे और 61,038 मौतें दर्ज हुईं, जो देश में कुल सड़क हादसों का 32.94% और कुल मौतों का 36.22% था.
हाईवे पर सबसे बड़ा खतरा तेज रफ्तार
हाईवे पर हादसों की गंभीरता का एक बड़ा कारण तेज रफ्तार है. केंद्र सरकार के 2022 के आंकड़ों में देशभर में 1,19,904 मौतें ओवरस्पीडिंग से जुड़ी थीं. यह उस साल सड़क हादसों में हुई कुल मौतों का करीब 71% था. इसके अलावा गलत दिशा में वाहन चलाने और शराब के सेवन जैसी वजहें भी जानलेवा हादसों से जुड़ी रहीं.
हाईवे पर वाहन आम सड़कों की तुलना में ज्यादा तेज चलते हैं. ऐसे में अचानक सामने आने वाला खड़ा ट्रक, गलत दिशा से आने वाला वाहन, सड़क पर पैदल व्यक्ति या खराब तरीके से डिजाइन किया गया मोड़ हादसे को बेहद गंभीर बना सकता है. इसलिए सिर्फ सड़क को चौड़ा करना सुरक्षा की गारंटी नहीं है.
13,795 ब्लैक स्पॉट बने बड़ी चुनौती
हाईवे पर कुछ जगहों पर बारबार गंभीर हादसे होते हैं. इन्हें ब्लैक स्पॉट कहा जाता है. सरकार ने मार्च 2025 में बताया था कि देश के नेशनल हाईवे पर कुल 13,795 ब्लैक स्पॉट चिन्हित किए गए थे. इनमें से 5,036 पर स्थायी सुधार पूरा किया जा चुका था.
इन जगहों पर सुधार के लिए सड़क की मार्किंग, साइन बोर्ड, क्रैश बैरियर, रोड स्टड और डिवाइडर में बदलाव जैसे तत्काल उपाय किए जाते हैं. लंबे समय के लिए सड़क की डिजाइन में सुधार, जंक्शन को बेहतर बनाना, अंडरपास या ओवरपास बनाना और सड़क को चौड़ा करना जैसे काम किए जाते हैं.
सरकार ने दुर्घटनाओं की जानकारी जुटाने के लिए eDAR यानी Electronic Detailed Accident Report सिस्टम भी बनाया है. इसका मकसद हादसों का डेटा एक जगह जुटाना और दुर्घटना वाले स्थानों पर तेजी से सुरक्षा उपाय करना है.
सिर्फ ड्राइवर की गलती नहीं
सड़क हादसे के बाद अक्सर ड्राइवर की गलती को सबसे पहले जिम्मेदार माना जाता है. इसमें कोई शक नहीं कि ओवरस्पीडिंग, गलत दिशा में गाड़ी चलाना, शराब पीकर ड्राइविंग और मोबाइल फोन का इस्तेमाल बड़े जोखिम हैं. लेकिन सरकार खुद मानती है कि हादसे कई कारणों के मेल से होते हैं, इनमें मानवीय गलती, सड़क और मौसम की स्थिति तथा वाहन की हालत शामिल हैं.
इसलिए हाईवे की सुरक्षा में सड़क बनाने वाली एजेंसी की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है. सड़क पर पर्याप्त रोशनी है या नहीं, ज्यादा तेज ट्रैफिक के साथ सुरक्षा की जिम्मेदारी भी बढ़ी है. ज्यादा लेन, ज्यादा वाहन खत्म करना, ओवरस्पीडिंग पर नियंत्रण, खड़े वाहनों की निगरानी और हादसे के बाद तेज मेडिकलिवाइडर और बैरियर सही हैं या नहीं, साइनेज साफ दिखाई दे रहा है या नहीं और किसी दुर्घटना के बाद एंबुलेंस कितनी जल्दी पहुंचती है, इन सभी चीजों का असर जान बचाने पर पड़ता है.
हाईवे नेटवर्क बढ़ा, तो सुरक्षा की चुनौती भी बढ़ी
2014 में देश में नेशनल हाईवे नेटवर्क करीब 91,287 किमी था, जो 2024 के अंत तक बढ़कर 1,46,195 किमी हो गया. यानी करीब एक दशक में नेटवर्क लगभग 60% बढ़ा. इसी दौरान चार लेन और उससे ज्यादा वाले नेशनल हाईवे की लंबाई भी 18,278 किमी से बढ़कर 45,947 किमी हो गई.
इस विस्तार से सफर तेज और कनेक्टिविटी बेहतर हुई है, लेकिन ज्यादा तेज ट्रैफिक के साथ सुरक्षा की जिम्मेदारी भी बढ़ी है. ज्यादा लेन, ज्यादा वाहन और ज्यादा गति का मतलब है कि छोटी गलती भी बड़े हादसे में बदल सकती है.



