अयोध्या में राम मंदिर में दानपात्र से चोरी का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है. इस मामले में अब तक 8 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर हो चुकी हैं. ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा अपने पदों से इस्तीफा दे चुके हैं. इस मामले में एक और नाम है, जिसकी मंदिर की व्यवस्थाओं और संचालन में उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं. यह नाम है मंदिर के निर्माण सहायक रहे और अब व्यवस्थापक गोपाल राव का.

अखिलेश यादव ने भी सीधे तौर पर गोपाल राव का नाम ना लेते हुए उनपर हमला किया है. उन्होंने कहा कि राम मंदिर के चढ़ावे की हेराफेरी के तार कर्नाटक और महाराष्ट्र से जुड़े हो सकते हैं. इसमें मंदिर को मिलने वाले दान प्रबंधन से जुड़े कुछ प्रमुख लोगों का हाथ हो सकता है. वहीं, श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के ट्रस्टी दिनेंद्र दास ने भी गोपाल राव की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए हैं.
मुख्य बातें
- अधिकारिक और प्रशासनिक पद ना होने के बावजूद मंदिर प्रबंधन में दूसरे सबसे प्रभावशाली शख्स
- पहले निर्माण सहायक फिर मंदिर व्यवस्थापक बनाए गए गोपाल राव
- मंदिर जमीन खरीद और वीवीआईपी पास जारी करने की भी गोपाल राव की भूमिका आई सामने
महंत दिनेंद्र दास ने गोपाल राव पर लगाए ये आरोप
महंत दिनेंद्र दास ने कहा कि गोपाल राव को निर्माण कार्य में सहयोग के लिए लाया गया था लेकिन उन्हें पैसों का लेन देन का काम नहीं देना चाहिए. उन्होंने यह आरोप लगाते हुए कहा कि लेनदेन के मामले में गोपाल राव ही शामिल थे. चंपत राय और अनिल मिश्रा की इसमें कोई भूमिका नहीं है. उनके अनुसार ट्रस्ट में पहले से अनुभवी और सक्षम लोग मौजूद हैं, इसलिए बाहरी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी.
कर्नाटक से अयोध्या कैसे पहुंचे गोपाल राव
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर के निर्माण का काम शुरू हुआ. इसके बाद आने वाले वर्षों में संघ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े देशभर के कई पदाधिकारियों को अयोध्या बुलाया गया. कइयों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई. कुछ को सहायक के तौर पर विभिन्न कामों की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया था. कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के रहने वाले गोपाल राव भी उन्हीं में एक थे.
पहले निर्माण सहायक फिर व्यवस्थापक बनाए गए
उत्तर कन्नड़ जिले के रहने वाले गोपाल राव भौतिकी विज्ञान से पोस्ट ग्रेजुएट हैं. अयोध्या आने से पहले वह कर्नाटक में संघ के प्रांत प्रचारक थे. फिर, साल 2020 अयोध्या आने के बाद उन्हें सबसे पहले सहायक निर्माण प्रभारी बनाया गया. फिर बाद में उन्हें व्यवस्थापक बना दिया गया. साल 2025 में उन्हें ट्रस्ट में विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर शामिल किया गया. लेकिन इसकी अधिकारिक घोषणा कभी नहीं की गई. वर्तमान में गोपाल राव विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय सह मंत्री पद पर हैं.
चंपत राय के बाद मंदिर प्रबंधन में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माने जाते रहे
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में कोई प्रशासनिक या पदाधिकारी स्तर का पद नहीं होने के बाद भी चंपत राय के बाद गोपाल राव को मंदिर प्रबंधन में दूसरे प्रभावशाली व्यक्ति माने जाता रहा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मंदिर से जुड़े लगभग सभी कामों में उनका हस्तक्षेप रहता रहा है. परिसर में चाहे कोई आयोजन हो या फिर भगवान के भोग की सामग्री की खरीद से पुजारियों के प्रबंधन तक के काम में इनकी भूमिका बताई जाती रही है.
भूमि खरीद और वीवीआईपी पास को लेकर गोपाल राव पर ये आरोप
गोपाल राय परट्रस्ट के लिए भूमि खरीद में भी इनकी अपरोक्ष भूमिका के आरोप भी लगाए गए हैं. साथ ही मंदिर परिसर में वीवीआईपी दर्शन के लिए अपने नाम से पास जारी करने की उनकी भूमिका पर सवाल खड़े हुए हैं. लोगों का कहना है कि दोनों ही कामों की जिम्मेदारी ट्रस्ट के कुछ चुनिंदा पदाधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों को होती है. लेकिन गोपाल राय के पास ना तो ट्रस्ट से जुड़ा अधिकारिक पद है और ना ही प्रशासनिक, फिर वह कैसे मंदिर दर्शन के पास जारी कर रहे थे और किस अधिकार से जमीन खरीद में भूमिका निभा रहे थे.
इसलिए गोपाल राव की भूमिका सवालों में
राम जन्मभूमि में गोपाल राव बिना किसी अधिकारिक और प्रशासनिक पद के भी मंदिर प्रबंधन के प्रभावशाली शख्स बने हुए थे. मंदिर के हर हिस्से और हर विभाग तक उनकी पहुंच थी. हर फैसले में उनकी राय होती थी. पत्थरों की खरीद से लेकर सामाग्री की उपलब्धता जैसे व्यवस्थाओं में गोपाल राव की निर्माण सहायक रहने के दौरान अहम भूमिका रही है.
निर्माण संबंधी कई तकनीकी प्रक्रियाओं को लेकर निर्णयों में गोपाल राव भूमिका अहम रही है. ऐसे में सवाल यह उठ रहा है, इतने मंदिर परिसर में इतनी पकड़ और प्रभाव होने के बावजूद, क्या यह संभव है कि उनको दानराशि में लगातार हुई चोरी को लेकर उन्हें कोई जानकारी नहीं रही होगी.



