इंदौर के रानी सराय क्षेत्र में मेट्रो स्टेशन के निर्माण के लिए पुराने पेड़ों को बचाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर बुधवार को इंदौर हाई कोर्ट में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान मेट्रो कंपनी ने कोर्ट के सामने अपना जवाब पेश किया. याचिका में रानी सराय के पुराने पेड़ों पर रहने वाले तोतों के बसेरे को बचाने के लिए प्रस्तावित मेट्रो स्टेशन का स्थान बदलने की मांग की गई है. वहीं, मेट्रो कंपनी ने वैकल्पिक स्थानों से जुड़ी चुनौतियों की जानकारी कोर्ट को दी.

मेट्रो कंपनी के मुताबिक, प्रस्तावित स्टेशन के स्थान में बदलाव की संभावनाओं को देखते हुए रीगल टॉकीज, प्रीतमलाल दुआ सभागृह और गांधी हॉल के आसपास के स्थानों का जायजा लिया गया है. कंपनी ने कहा कि इन विकल्पों पर स्टेशन निर्माण की संभावना देखी गई, लेकिन जगह बदलने से परियोजना की लागत और समय दोनों बढ़ सकते हैं.
कंपनी के अनुसार, वैकल्पिक स्थान पर स्टेशन बनाने से करीब 400 करोड़ रुपये तक अतिरिक्त खर्च हो सकता है. इसके अलावा मिल्की वे परिसर समेत लगभग 5 हजार वर्ग फीट जमीन की जरूरत पड़ सकती है. जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में करीब दो साल लगने का अनुमान है. इससे पूरी मेट्रो परियोजना तीन से चार साल तक पीछे जाने की आशंका जताई गई है.
रीगल टॉकीज और दुआ सभागृह विकल्प में क्या दिक्कत?
मेट्रो कंपनी ने रीगल टॉकीज वाले विकल्प को लेकर भी जमीन और आसपास मौजूद संपत्तियों के प्रभावित होने की संभावना बताई है. कंपनी के अनुसार, स्टेशन की जगह बदलने पर होटल, सरकारी आवास और जज बंगलों पर असर पड़ सकता है.
वहीं, प्रीतमलाल दुआ सभागृह के विकल्प में भी कई चुनौतियां सामने आने की बात कही गई. यहां स्टेशन बनने पर प्रीतमलाल दुआ सभागृह, महावीर स्तंभ, सिंगापुर मार्केट और अहिल्या पुस्तकालय प्रभावित हो सकते हैं. निर्माण के दौरान हाई कोर्ट के बगीचे पर भी असर पड़ने की संभावना है. इसके अलावा गेट नंबर एक और दो को बंद रखना पड़ सकता है.
गांधी हॉल विकल्प पर रूट बदलने में अड़चन
गांधी हॉल को वैकल्पिक स्थान के तौर पर लेकर मेट्रो कंपनी ने कहा कि मौजूदा रूट और राजवाड़ा स्टेशन के निर्माण को देखते हुए यहां स्टेशन लाना संभव नहीं है. कंपनी ने गांधी हॉल को ऐतिहासिक इमारत बताते हुए कहा कि इसके प्रभावित होने पर विरोध की स्थिति बन सकती है.
पुराने पेड़ों और तोतों के बसेरे का मुद्दा
याचिका दायर करने वाले पक्ष की ओर से रानी सराय के पुराने पेड़ों और उन पर रहने वाले तोतों के बसेरे को बचाने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया है. पक्ष का कहना है कि भारी ट्रैफिक के बावजूद इस क्षेत्र में तोते लंबे समय से बसेरा बनाते आ रहे हैं.
याचिका से जुड़े अधिवक्ता अभिनव धनौतकर ने कोर्ट के समक्ष रानी सराय के करीब 50 से 60 साल पुराने पेड़ों का भी जिक्र किया. उनके मुताबिक, नए लगाए जाने वाले पेड़ों में पुराने पेड़ों के तनों जैसी प्राकृतिक संरचना नहीं होगी, जिससे पक्षियों के लिए बसेरा बनाना मुश्किल हो सकता है.
हाल ही में हाई कोर्ट के दो न्यायाधीश भी शाम के समय रानी सराय क्षेत्र में तोतों का बसेरा देखने पहुंचे थे. वकील ने उन्हें क्षेत्र में मौजूद पुराने पेड़ भी दिखाए थे. फिलहाल मामले की सुनवाई जारी है और हाई कोर्ट आने वाले दिनों में इस याचिका पर आगे सुनवाई करेगा.



