हिमाचल: पेंशन नहीं तो इच्छामृ*त्यु दे दो..! कर्मचारी की एक गलती से 100% दिव्यांग को 10 माह से नहीं मिली पेंशन

श्रेणी बदलने से बंद हुई पेंशन, सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर दिव्यांग
ऊना। हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले से सरकारी व्यवस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आई हैए जहां एक कथित विभागीय गलती का खामियाजा 100 फीसदी दिव्यांग व्यक्ति को भुगतना पड़ रहा है। जिसके चलते इस दिव्यांग व्यक्ति को पिछले 10 माह से पेंशन नहीं मिली है। 49 वर्षीय साहित्यकार सुभाष चंद पारस करीब 35 वर्षों से बिस्तर पर हैं। उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह परिवार पर निर्भर है, लेकिन अब उनकी दिव्यांगता पेंशन बंद होने से परिवार के सामने रोटी से लेकर दवाइयों तक का खर्च जुटाना चुनौती बन गया है।
सुभाष चंद का आरोप है कि ईकेवाईसी के दौरान कर्मचारी की गलती से उनकी दिव्यांग पेंशन की श्रेणी बदलकर वृद्धावस्था पेंशन दर्ज कर दी गई। बाद में उम्र कम होने के कारण सॉफ्टवेयर से यह नामांकन हटा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि उन्हें मिलने वाली पेंशन ही बंद हो गई।
सुभाष चंद को करीब दो दशक से नियमित रूप से दिव्यांगता पेंशन मिल रही थी। हर महीने मिलने वाली 1700 रुपये की पेंशन भले ही बड़ी रकम न हो, लेकिन उनके लिए यही राशि जीवन की बुनियादी जरूरतों का महत्वपूर्ण सहारा थी। वित्तीय वर्ष 2026 में कल्याण विभाग की ओर से पेंशन बंद होने के बाद उन्होंने अधिकारियों से लेकर उपायुक्त तक अपनी समस्या पहुंचाई। उनका कहना है कि कई बार जरूरी दस्तावेज भी दिखाए गए और ईकेवाईसी सहित आवश्यक सत्यापन की प्रक्रिया पूरी की गई, लेकिन अब तक पेंशन बहाल नहीं हो पाई है।
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सुभाष चंद बताते हैं कि जब वह सातवीं कक्षा में पढ़ते थे, तब पैरों से शुरू हुई बीमारी के कारण उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई। आज हालात यह हैं कि वह रोटी खाने, पानी पीने, दवा लेने और यहां तक कि करवट बदलने के लिए भी परिवार के सदस्यों पर निर्भर हैं। ऐसे में पिछले 10 महीने से पेंशन नहीं मिलने ने उनकी मुश्किल और बढ़ा दी है। परिवार के सामने रोजमर्रा के खर्च के साथ दवाइयों और देखभाल का खर्च उठाने की चुनौती है।
पूरे मामले की जड़ ईकेवाईसी प्रक्रिया के दौरान हुई श्रेणी संबंधी गलती बताई जा रही है। जिला कल्याण अधिकारी के अनुसार, ईकेवाईसी करते समय फील्ड कर्मचारी की ओर से सुभाष चंद की श्रेणी दिव्यांगता के बजाय वृद्धावस्था पेंशन दर्ज कर दी गई। बाद में उनकी उम्र कम होने के कारण सॉफ्टवेयर ने इस नामांकन को हटा दिया। इसके परिणामस्वरूप उनकी पेंशन भी रुक गई।
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जिला कल्याण अधिकारी आवास पंडित के अनुसार, श्रेणी गलत दर्ज होने के कारण यह समस्या सामने आई। उन्होंने बताया कि सुभाष चंद को फौरी राहत के लिए दिव्यांग श्रेणी में नए सिरे से आवेदन करने के लिए कहा गया है। अधिकारी के अनुसार, पिछली रुकी हुई पेंशन की राशि मिलने की प्रक्रिया अलग और लंबी हो सकती है। फिलहाल विभाग का कहना है कि नई प्रक्रिया के जरिए पेंशन दोबारा शुरू करवाने का प्रयास किया जाएगा।
मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद सुभाष चंद ने साहित्य को अपना साथी बनाया। वह अब तक करीब 10 पुस्तकें लिख चुके हैं और ऑनलाइन काव्य गोष्ठियों में भी हिस्सा लेते हैं। बिस्तर तक सीमित रहने के बावजूद साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय रहना उनके संघर्ष की अलग कहानी बयां करता है। लेकिन आर्थिक संकट ने अब उनके इस जीवन को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
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सुभाष चंद की देखभाल उनके वृद्ध और बीमार स्वजन कर रहे हैं। परिवार के पास पेंशन के अलावा आय का कोई अन्य प्रमुख साधन नहीं होने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल सिर्फ 10 महीने की पेंशन का नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी का है, जो पूरी तरह दूसरों पर निर्भर है और जिसके लिए पेंशन की छोटीसी रकम भी दवा, भोजन और जीवन की दूसरी जरूरी जरूरतों का सहारा है।
लंबे समय से पेंशन बहाल नहीं होने से आहत सुभाष चंद ने सरकार के सामने बेहद गंभीर गुहार लगाई है। उन्होंने कहा है कि सरकार उनकी दिव्यांगता पेंशन तत्काल बहाल करवाए, अन्यथा परिवार की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति देने पर विचार किया जाए। उन्होंने जिलाधीश से दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत मामले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने और बंद पड़ी पेंशन को जल्द बहाल करवाने की मांग की है।
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इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि वर्षों से दिव्यांगता पेंशन प्राप्त कर रहे व्यक्ति की ईकेवाईसी के दौरान श्रेणी गलत दर्ज हो जाती है, तो उसका खामियाजा लाभार्थी को क्यों भुगतना पड़े? एक तरफ सरकार डिजिटल सत्यापन और ऑनलाइन सेवाओं को आसान बनाने पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी तरफ रिकॉर्ड में एक गलत एंट्री ने 100 फीसदी दिव्यांग व्यक्ति के लिए 10 महीने की आर्थिक परेशानी खड़ी कर दी।



