Featured Image

Meerut Blue Drum Murder: मेरठ का एक घर…जहां एक पति अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जिंदगी बिताने के सपने लेकर विदेश से लौटा था. लेकिन उसे क्या पता था कि जिस घर को वह अपना आशियाना समझ रहा है, वही उसकी जिंदगी का आखिरी ठिकाना बन जाएगा. 3 मार्च 2025 को सौरभ राजपूत की हत्या कर दी गई. आरोप उसकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला पर लगे. पुलिस के मुताबिक, हत्या के बाद सौरभ के शव के टुकड़े किए गए और उन्हें सीमेंट से भरे नीले ड्रम में छिपा दिया गया.

विज्ञापन

विज्ञापन

18 मार्च को जब इस खौफनाक वारदात का खुलासा हुआ, तो पूरा देश सन्न रह गया. जांच आगे बढ़ी, पूछताछ हुई, सबूत जुटाए गए और रिश्तों के पीछे छिपी साजिश की परतें खुलने लगीं. इस मामले में दो युवा IPS अधिकारी भी चर्चा में आए, जिन्होंने जांच से जुड़ी अहम जानकारियां सामने रखीं. आखिरकार 14 अक्टूबर 2026 को अदालत ने मुस्कान और साहिल को मौत की सजा सुना दी. हत्या से लेकर फैसले तक करीब 590 दिनों की इस कहानी में जानिए कैसे खुला नीले ड्रम का राज, कौन थे जांच से जुड़े दो IPS अधिकारी और किस जिला जज ने सुनाया फैसला?

विज्ञापन

विदेश से लौटा सौरभ, लेकिन घर में उसका इंतजार कुछ और कर रहा था

सौरभ राजपूत मेरठ के ब्रह्मपुरी इलाके का रहने वाला था. वह विदेश में काम करता था और 24 फरवरी 2025 को वापस मेरठ लौटा था. घर लौटने के पीछे परिवार के साथ वक्त बिताने और सामान्य जिंदगी जीने की उम्मीद रही होगी, लेकिन कुछ ही दिनों में उसकी जिंदगी एक ऐसी वारदात में खत्म हो गई, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा. पुलिस की जांच के मुताबिक, 3 मार्च 2025 को सौरभ की हत्या कर दी गई. इस मामले में उसकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला आरोपी बने. जांच में दोनों के बीच संबंधों को हत्या के संभावित मकसद के तौर पर देखा गया. लेकिन इस मामले की भयावहता हत्या तक सीमित नहीं रही. पुलिस के अनुसार, हत्या के बाद शव के टुकड़े किए गए और उन्हें सीमेंट से भरे नीले ड्रम में छिपा दिया गया. यहीं से शुरू हुई एक ऐसी जांच, जिसमें पुलिस को हत्या के साथ-साथ शव छिपाने और आरोपियों की गतिविधियों की पूरी कड़ी जोड़नी थी.

नीले ड्रम में छिपा राज, 18 मार्च को कैसे खुला मामला?

हत्या के बाद सौरभ के शव को जिस तरीके से छिपाने की कोशिश की गई, उसने मामले को बेहद गंभीर बना दिया. नीले ड्रम में सीमेंट भरकर शव के अवशेष छिपाने की बात सामने आई, तो जांचकर्ताओं के सामने कई सवाल खड़े हो गए. हत्या कैसे हुई, इसमें किन लोगों की भूमिका थी और वारदात के बाद क्या-क्या किया गया? 18 मार्च 2025 को इस हत्याकांड का खुलासा हुआ. पुलिस ने मुस्कान और साहिल से पूछताछ की और वारदात से जुड़े साक्ष्यों को जोड़ना शुरू किया. जांच के दौरान चाकू, ड्रम, सीमेंट और दवाइयों की खरीद से जुड़े पहलुओं की पड़ताल की गई. आरोपियों के हिमाचल प्रदेश जाने की जानकारी भी सामने आई, जिसके बाद उनकी यात्रा और गतिविधियों की जांच की गई. किसी भी आपराधिक मामले में केवल आरोप या बयान ही पर्याप्त नहीं होते. जांचकर्ताओं को उपलब्ध भौतिक साक्ष्यों, पोस्टमार्टम की जानकारी और घटनाक्रम को आपस में जोड़ना पड़ता है. इस मामले में भी पुलिस ने इसी आधार पर हत्या की कड़ियां जोड़ने की कोशिश की.

पोस्टमार्टम में क्या सामने आया?

सौरभ राजपूत हत्याकांड की जांच के दौरान तत्कालीन एएसपी अंतरिक्ष जैन ने पोस्टमार्टम से जुड़ी जानकारी साझा की थी. उन्होंने बताया था कि शव पर चाकू से चोट के निशान थे. गर्दन और कलाइयों को काटे जाने के संकेत भी सामने आए थे. पोस्टमार्टम के निष्कर्षों ने पुलिस को वारदात की प्रकृति समझने में मदद की. इन जानकारियों को घटनास्थल से जुटाए गए साक्ष्यों और पूछताछ में सामने आए तथ्यों के साथ मिलाकर देखा गया. इस मामले में कथित तंत्र-मंत्र और अनुष्ठान को लेकर भी कई चर्चाएं हुईं. हालांकि, ऐसी चर्चाओं को हत्या का प्रमाण नहीं माना जा सकता. पुलिस की जांच में कथित तंत्र-मंत्र को हत्या से जोड़ने वाला ठोस सबूत मिलने की बात सामने नहीं आई थी.

जांच के दौरान चर्चा में आए दो युवा IPS अधिकारी कौन थे?

सौरभ राजपूत हत्याकांड के दौरान मेरठ में तैनात दो युवा IPS अधिकारी- आयुष विक्रम सिंह और अंतरिक्ष जैन भी चर्चा में आए. दोनों ने मामले से जुड़ी पुलिस कार्रवाई और जांच के अलग-अलग पहलुओं की जानकारी मीडिया के सामने रखी थी. आयुष विक्रम सिंह: पूछताछ और पुलिस कार्रवाई से जुड़ी जानकारी आयुष विक्रम सिंह 2020 बैच के IPS अधिकारी हैं. उनका जन्म 29 अक्टूबर 1992 को लखनऊ में हुआ था. उन्होंने केमिकल इंजीनियरिंग में बीटेक और एलएलबी की पढ़ाई की है.

दिसंबर 2023 में उन्होंने मेरठ के एसपी सिटी का पद संभाला था. मार्च 2025 में जब सौरभ राजपूत हत्याकांड सामने आया, तब वह इसी पद पर तैनात थे. उन्होंने आरोपियों से पूछताछ में सामने आई जानकारियों और पुलिस की कार्रवाई से जुड़े पहलुओं के बारे में मीडिया को बताया. इस मामले में जांच की चुनौती घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने और उपलब्ध साक्ष्यों की पड़ताल करने की थी. आयुष विक्रम सिंह की भूमिका जांच से जुड़ी जानकारियां सार्वजनिक करने के लिहाज से महत्वपूर्ण रही. अप्रैल 2026 में उनका तबादला बहराइच में अपर पुलिस अधीक्षक (नगर) के पद पर हुआ.

अंतरिक्ष जैन कौन?

अंतरिक्ष जैन 2022 बैच के IPS अधिकारी हैं. उनका जन्म 3 सितंबर 1998 को पंजाब के मोहाली में हुआ था. उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया और UPSC सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 130 हासिल की. मेरठ में तैनाती के दौरान वह एएसपी के रूप में कार्यरत थे. सौरभ राजपूत हत्याकांड में उन्होंने पोस्टमार्टम से जुड़ी अहम जानकारी साझा की थी. शव पर चाकू के निशान और गर्दन तथा कलाइयों को काटे जाने के संकेतों के बारे में भी उन्होंने जानकारी दी थी. इन जानकारियों ने वारदात की प्रकृति को समझने और जांच के घटनाक्रम को सामने लाने में मदद की. अप्रैल 2026 में उनका तबादला बुलंदशहर में अपर पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) के पद पर हुआ. यहां यह समझना जरूरी है कि किसी अधिकारी की ओर से जांच की जानकारी साझा करना और पूरी जांच का अकेले नेतृत्व करना अलग-अलग बातें हैं. इस मामले का खुलासा पुलिस की जांच और जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर हुआ.

मुस्कान और साहिल कैसे बने आरोपी?

जांच के दौरान पुलिस ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला की भूमिका की पड़ताल की. दोनों के संबंधों, सौरभ की हत्या की परिस्थितियों और वारदात के बाद की गतिविधियों को जांच का हिस्सा बनाया गया. पुलिस ने पूछताछ और दूसरे साक्ष्यों के आधार पर घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ने की कोशिश की. शव को छिपाने के लिए इस्तेमाल किए गए ड्रम और सीमेंट, चाकू तथा दवाइयों की खरीद से जुड़े पहलुओं की भी जांच हुई. हिमाचल प्रदेश की यात्रा से संबंधित जानकारी भी जुटाई गई. इन तथ्यों के आधार पर मामला अदालत तक पहुंचा. इसके बाद अभियोजन पक्ष को अदालत में आरोपों के समर्थन में साक्ष्य पेश करने थे. अदालत ने सुनवाई के दौरान उपलब्ध सामग्री का आकलन किया और 30 सितंबर 2026 को मुस्कान और साहिल को हत्या के मामले में दोषी करार दिया.

590 दिन बाद आया फैसला, मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा

3 मार्च 2025 को हुई हत्या से लेकर 14 अक्टूबर 2026 को सजा सुनाए जाने तक करीब 590 दिन बीते. इस दौरान मामला पुलिस जांच से होते हुए अदालत की सुनवाई तक पहुंचा. 30 सितंबर 2026 को दोनों को दोषी ठहराए जाने के बाद अदालत ने 14 अक्टूबर को मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाई. इस फैसले के साथ मामला एक अहम कानूनी पड़ाव पर पहुंचा. अदालत ने अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए सजा सुनाई. सुनवाई के दौरान महाभारत का संदर्भ भी चर्चा में आया. हालांकि, अदालत की टिप्पणी को समझने के लिए फैसले के वास्तविक शब्दों और संदर्भ को देखना जरूरी है. मौत की सजा सुनाए जाने के बाद भी कानूनी प्रक्रिया के विकल्प हो सकते हैं. दोषी पक्ष कानून के तहत उच्च अदालत में अपील कर सकता है. इसलिए सजा सुनाया जाना और सभी कानूनी विकल्पों का समाप्त हो जाना एक ही बात नहीं है.

आखिर कौन हैं सजा सुनाने वाले जिला जज अरविंद कुमार?

सौरभ राजपूत हत्याकांड में मुस्कान और साहिल को मौत की सजा सुनाने वाले जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा का भी नाम चर्चा में आया. मेरठ जिला न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उनका जन्म 2 जुलाई 1971 को उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में हुआ था. उन्होंने 1990 में बीए की डिग्री हासिल की. इसके बाद 1994 में एलएलबी और 1996 में एलएलएम की पढ़ाई पूरी की. न्यायिक सेवा में उनका करियर 2003 में शुरू हुआ. 16 जुलाई 2008 को उन्हें प्रमोट कर सिविल जज (सीनियर डिविजन) बनाया गया और उसी दिन उन्हें क्लास-1 अधिकारी का दर्जा भी मिला. 2013 में वह जिला जज नियुक्त हुए.

अरविंद कुमार ने अपने न्यायिक करियर में कई जिलों और संस्थानों में जिम्मेदारी संभाली. 2013 और 2014 में वह गोरखपुर और कानपुर नगर के जिला जज रहे. मई 2015 से अप्रैल 2018 तक उन्होंने कानपुर नगर की फैमिली कोर्ट में एडिशनल प्रिंसिपल जज के रूप में काम किया. इसके बाद 18 अप्रैल 2018 से 10 अगस्त 2020 तक वह उत्तर प्रदेश सरकार के कानून विभाग में स्पेशल सेक्रेटरी रहे. अगस्त 2020 से मई 2022 तक बस्ती की फैमिली कोर्ट में प्रिंसिपल जज की जिम्मेदारी संभाली. 5 मई 2023 से 13 नवंबर 2024 तक वह लखनऊ में स्टेट ट्रांसपोर्ट ट्रिब्यूनल के चेयरमैन रहे. 14 नवंबर 2024 से 19 मई 2026 तक वह मिर्जापुर जिला न्यायालय में जिला जज रहे. इसके बाद उनका तबादला मेरठ हुआ और 21 मई 2026 से वह मेरठ के जिला जज के रूप में कार्यरत हैं.

नीले ड्रम से अदालत के फैसले तक- इस मामले ने क्या दिखाया?

सौरभ राजपूत हत्याकांड की कहानी सिर्फ एक हत्या और शव छिपाने की कोशिश तक सीमित नहीं रही. इस मामले में पुलिस के सामने घटनास्थल के साक्ष्य जुटाने, पोस्टमार्टम के निष्कर्षों को समझने, आरोपियों की गतिविधियों की जांच करने और पूरी कड़ी को अदालत के सामने रखने की चुनौती थी. आयुष विक्रम सिंह और अंतरिक्ष जैन जैसे अधिकारियों ने जांच से जुड़े अलग-अलग पहलुओं की जानकारी सार्वजनिक की. इसके बाद अदालत में चली सुनवाई के दौरान साक्ष्यों का आकलन किया गया और मुस्कान रस्तोगी तथा साहिल शुक्ला को दोषी ठहराकर मौत की सजा सुनाई गई. 3 मार्च 2025 की वारदात से 14 अक्टूबर 2026 के फैसले तक करीब 590 दिनों का यह सफर एक भयावह अपराध की जांच और न्यायिक प्रक्रिया का अहम अध्याय बन गया. अब आगे की कानूनी प्रक्रिया यह तय करेगी कि इस फैसले पर उच्च अदालतों में क्या होता है.