बिहार में घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं के सामने सिर्फ सफर की परेशानी नहीं है. सार्वजनिक शौचालयों की कमी, साफसफाई का अभाव, महंगा किराया और सुरक्षा की चिंता भी उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती है. इन समस्याओं का असर नौकरी करने वाली महिलाओं, छात्राओं और इलाज के लिए घर से निकलने वाली महिलाओं पर पड़ सकता है. बिहार में महिलाओं की सेहत और यात्रा से जुड़े दो अलगअलग अध्ययनों के आंकड़े इस चुनौती को समझने में मदद करते हैं.

छह मेडिकल कॉलेजों में 3.56 लाख महिलाओं की स्टडी

यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ बिहार चैप्टर ने जनवरी 2025 से अगस्त 2026 के बीच छह मेडिकल कॉलेज अस्पतालों की ओपीडी में पहुंचीं 3.56 लाख महिलाओं के आंकड़ों का अध्ययन किया. इनमें करीब 2 लाख महिलाओं में किडनी संबंधी समस्याएं सामने आईं. रिपोर्ट में लंबे समय तक पेशाब रोकने को इन समस्याओं से जुड़ा बताया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, सार्वजनिक शौचालयों की कमी और गंदगी के कारण महिलाओं को घर से बाहर कई घंटों तक पेशाब रोकना पड़ता है. पुलिसकर्मी, टीचर, दुकानों में काम करने वाली महिलाएं और प्राइवेट नौकरी करने वाली महिलाएं भी इस परेशानी का सामना करती हैं.

हालांकि, इन आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अध्ययन अस्पतालों की ओपीडी में पहुंचीं महिलाओं से जुड़ा है. इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बिहार की सभी महिलाओं में किडनी संबंधी समस्याओं की यही दर है या इन सभी मामलों का कारण सार्वजनिक शौचालयों की कमी है

बिहार में कितने सार्वजनिक शौचालय हैं?

केंद्र सरकार के स्वच्छ भारत मिशनशहरी से जुड़े राज्यवार आंकड़ों के अनुसार, बिहार में सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालयों की कुल 28,677 सीटें दर्ज थीं. यह आंकड़ा 20 मार्च 2023 को राज्यसभा में दिए गए सरकारी जवाब में शामिल था. 28,677 का आंकड़ा शौचालयों की संख्या नहीं, बल्कि सीटों की संख्या है. किसी राज्य में सार्वजनिक शौचालयों की सुविधा का आकलन सिर्फ उनकी संख्या से नहीं किया जा सकता. यह भी जरूरी है कि वे कहां बने हैं, कितने चालू हैं और महिलाओं के लिए उनमें साफसफाई, पानी, रोशनी और अलग शौचालय की सुविधा उपलब्ध है या नहीं.

27% महिलाओं की पढ़ाई और नौकरी पर सफर का असर

बिहार में महिलाओं की मुश्किलें शौचालयों तक सीमित नहीं हैं. बिहार राज्य पथ परिवहन निगम और माइक्रोसेव कंसल्टिंग की साझा स्टडी के मुताबिक, परिवहन की कमी, महंगे किराए और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण 27% महिलाओं को पढ़ाई या नौकरी छोड़नी पड़ी. यह स्टडी फरवरी से जून 2026 के बीच राज्य के शहरी और ग्रामीण इलाकों की करीब 5 लाख महिलाओं के बीच की गई थी.

रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाएं आनेजाने पर पुरुषों की तुलना में सालाना औसतन 18,800 रुपये अधिक खर्च करती हैं. इसकी एक वजह सार्वजनिक परिवहन की जगह निजी वाहन, टैक्सी और रिजर्व ऑटो का इस्तेमाल करना है. इस स्टडी में यह भी सामने आया कि महिलाओं को सुरक्षित और सस्ता परिवहन उपलब्ध कराना जरूरी है.

पिंक बस से क्या बदला?

माइक्रोसेव कंसल्टिंग की 12 अगस्त 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट में पटना, मुजफ्फरपुर और गया में पिंक बस सर्विस के असर का आकलन किया गया. अध्ययन के मुताबिक, सर्वे में शामिल 93% महिलाओं ने मुख्य रूप से सुरक्षा की वजह से पिंक बस चुनी, जबकि 78% महिलाएं इसका इस्तेमाल पढ़ाई या नौकरी के लिए करती थीं.

यह उदाहरण दिखाता है कि बेहतर सार्वजनिक परिवहन महिलाओं के लिए काम और पढ़ाई तक पहुंच आसान बना सकता है. लेकिन सुरक्षित बस सेवा और सार्वजनिक शौचालय दो अलग जरूरतें हैं. महिलाओं को घर से निकलने से लेकर गंतव्य तक पहुंचने के बीच दोनों सुविधाओं की जरूरत पड़ सकती है.

समाधान सिर्फ शौचालय बनाने तक सीमित नहीं

बिहार में महिलाओं की इस समस्या को समझने के लिए तीन स्तरों पर काम करना जरूरी है. पहला, सार्वजनिक शौचालयों की वर्तमान संख्या, उनकी स्थिति और महिलाओं के लिए उपलब्ध सीटों का जिलावार आंकड़ा सामने आए. दूसरा, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, बाजार, अस्पताल, स्कूलकॉलेज और कामकाजी इलाकों में शौचालयों की उपलब्धता की जांच हो. तीसरा, यह देखा जाए कि इन सुविधाओं में पानी, रोशनी, साफसफाई और सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हैं या नहीं. हेल्थ एक्सपर्ट्स की मदद से यह भी समझना जरूरी है कि लंबे समय तक पेशाब रोकने और पानी कम पीने से किन स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. इसके साथ ही, महिलाओं की यात्रा, किराए और सुरक्षा से जुड़े आंकड़ों को भी शामिल करना चाहिए.

बिहार की महिलाओं के लिए सार्वजनिक शौचालय और सुरक्षित परिवहन सिर्फ बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. इनका संबंध उनकी सेहत, पढ़ाई, रोजगार और स्वतंत्र रूप से आनेजाने की क्षमता से भी है. इसलिए असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राज्य में कितने शौचालय बने, बल्कि यह है कि जरूरत पड़ने पर महिलाएं उनका इस्तेमाल कर सकती हैं या नहीं.