रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कांग्रेस और विपक्ष के कुछ नेताओं पर आरोप लगाया है कि वो जानबूझकर विवाद, गलत जानकारी और झूठे आरोपों के जरिए अफरातफरी पैदा कर रहे हैं. समाचार पत्र के लिए लिखे अपने लेख में सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि झूठ का मुकाबला करना और संवैधानिक संस्थाओं में जनता का भरोसा बहाल करना जरूरी है.

राजनाथ सिंह ने लिखा ‘कहा जाता है कि युद्ध में अक्सर सबसे पहले सच की ही बलि चढ़ती है.राजनीतिक मुकाबलों में भी यह बात तेजी से सच साबित हो रही है, जहां ‘पोस्टट्रुथ’ राजनीति सार्वजनिक विमर्श का एक अहम पहलू बनती जा रही है’. उन्होंने लिखा कि ‘पोस्टट्रुथ’ के इस दौर में, झूठा प्रचार, तोड़मरोड़ कर पेश की गई बातें और तर्कहीन भावनात्मक अपीलें, अक्सर ठोस तथ्यों और पुख्ता सबूतों पर हावी हो जाती हैं. यहां तार्किक बहस की जगह भड़काऊ बयानबाजी ले लेती है.

‘भ्रमित करने के लिए गलत सूचनाओं का अभियान’

कभी मुख्य रूप से अकादमिक चर्चाओं का विषय रहा ‘पोस्टट्रुथ’ अब रोजमर्रा की राजनीति का हिस्सा बन गया है. लोगों को भ्रमित करने के लिए चलाए जा रहे गलत सूचनाओं के अभियान, न केवल जनमत को प्रभावित करने के लिए, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को कम करने के लिए भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं. उन्होंने लिखा आरोपों को बारबार दोहराया और बढ़ाचढ़ाकर पेश किया जाता है, भले ही उन्हें साबित करने के लिए कोई सबूत मौजूद न हो. ऐसे में, सच न केवल सबसे पहले बलि चढ़ता है, बल्कि इसके पूरी तरह से खत्म हो जाने का भी खतरा पैदा हो जाता है.

राजनाथ सिंह ने कहा भारत की राजनीतिक चर्चा भी ‘पोस्टट्रुथ’ की इस प्रवृत्ति से अछूती नहीं है. विपक्ष के कुछ धड़े लगातार जानबूझकर आक्रोश पैदा कर रहे हैं, दुष्प्रचार फैला रहे हैं और अराजकता फैलाने के लिए गलत सूचनाओं का हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. वे अपने स्वार्थी राजनीतिक लक्ष्यों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रख रहे हैं.

रक्षा मंत्री ने बताया लेख का उद्देश्य

रक्षा मंत्री ने कहा कि इस लेख का उद्देश्य विपक्ष की आलोचना करना नहीं है, और न ही यह दावा करना है कि संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना नहीं की जा सकती. असहमति लोकतंत्र की प्राणवायु है. लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि झूठ फैलाने की छूट मिल जाए. बेहतर नीतिनिर्माण के लिए असहमति जरूरी है. लेकिन, इसका मतलब यह भी नहीं है कि जनविश्वास पर लगातार और द्वेषपूर्ण हमले किए जाएं, ऐसे आरोप लगाकर जो तथ्यों की जांच के सामने टिक ही नहीं पाते. इसलिए, इसका मकसद इन झूठों को चुनौती देना और संवैधानिक संस्थाओं में जनता के उस भरोसे को फिर से बहाल करना है, जिसे अविश्वास पैदा करने वाली कुटिल राजनीति ने कमजोर कर दिया है. यह बात तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जब हम देखते हैं कि विपक्ष के कुछ धड़ों ने चुनावी संस्थाओं और प्रक्रियाओं पर हमले किए हैं. ऐसा वे इसलिए कर रहे हैं ताकि इस सच्चाई को छिपा सकें कि जनता उन्हें बारबार नकार रही है.

विपक्ष द्वारा लगातार उठाए जा रहे तीन मुद्दों का जिक्र

राजनाथ सिंह ने अपने लेख में विपक्ष द्वारा लगातार उठाए जा रहे तीन मुद्दों का जिक्र किया. उन्होंने लिखा खास तौर पर तीन मुद्दे सामने आते हैं. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में हेरफेर के बारबार लगाए जाने वाले आरोप, मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ से जुड़ा विवाद, और भारत निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाने की अनुचित कोशिशें.

EVM पर क्या बोले राजनाथ सिंह

उन्होंने लिखा सबसे पहले, विपक्ष की ओर से EVMs में हेरफेर के आरोप बारबार लगाए जाते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर इन आपत्तियों की जांच की है, आखिरकार, 2024 में ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग’ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने सभी संदेहों को दूर कर दिया और पेपर बैलेट पर वापस लौटने की मांग को खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना किसी ठोस सबूत या डेटा के, केवल शक और संदेह के आधार पर बारबार सवाल उठाना निंदनीय और अवांछनीय है. लेकिन इसके बावजूद, विपक्ष बारबार वही झूठ दोहराने से बाज नहीं आया.

SIR को लेकर दी सफाई

वहीं SIR को लेकर उठाए जा रहे सवाल पर उन्होंने कहा कि मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ को लेकर खड़ा किया गया विवाद इस बात का एक और उदाहरण है कि कैसे आज के इस दौर में, कुछ लोग अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के लिए एक कानूनी रूप से सही और प्रशासनिक दृष्टि से उचित प्रक्रिया पर भी सवाल उठा रहे हैं. उन्होंने कहा कि 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग’ मामले में अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए मतदाता सूची की शुचिता आधारभूत है. कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची की सटीकता, पूर्णता और शुचिता सुनिश्चित करना न केवल एक वैध उद्देश्य है, बल्कि यह आयोग को सौंपे गए संवैधानिक दायित्व का एक अभिन्न अंग भी है.

उन्होंने कहा कि कोर्ट ने यह भी पाया कि मतदाता सूची में संशोधन के लिए दिए गए तर्क, एक विश्वसनीय चुनावी प्रक्रिया बनाए रखने से सीधे और तार्किक रूप से जुड़े थे. इन टिप्पणियों ने एक बुनियादी सिद्धांत को और मजबूत किया: मतदान के अधिकार की रक्षा करने के लिए न केवल हर पात्र मतदाता के अधिकारों की सुरक्षा जरूरी है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि मतदाता सूची सटीक, पूर्ण और विश्वसनीय बनी रहे.

चुनाव आयोग पर क्या बोले मंत्री

मंत्री ने अपने लेख में आगे कहा EVM और SIR के अलावा, मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद और व्यापक अर्थों में भारत निर्वाचन आयोग की संस्था को बदनाम करने के लिए एक निरंतर अभियान चलाया गया है. उन्होंने कहा कि लगभग सात दशकों तक, कांग्रेस सरकारों का मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति पर कार्यकारी नियंत्रण बना रहा. हमारी सरकार ने इस व्यवस्था को बदला और नियुक्ति प्रक्रिया को एक बहुसदस्यीय चयन समिति के माध्यम से संस्थागत रूप दिया, जिसमें विपक्ष के नेता भी शामिल होते हैं.

उन्होंने कहा कि अन्य संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का सम्मान करने के मामले में भी कांग्रेस का रिकॉर्ड कुछ खास प्रेरणादायक नहीं रहा है. 1951 में, तत्कालीन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को पलटने के लिए पहला संवैधानिक संशोधन पेश किया, जिससे बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो गई.

मंत्री ने कहा ‘आपातकाल के दौरान, संवैधानिक संशोधनों का इस्तेमाल सरकार के हितों को साधने के लिए एक हथियार के रूप में किया गया. इन संशोधनों के जरिए आपातकाल की घोषणा को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया गया और प्रधानमंत्री के चुनाव को भी अदालती जांच से परे कर दिया गया. इसके अलावा, उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को व्यापक छूट दी गई और न्यायिक समीक्षा के अधिकार को सीमित कर दिया गया. इस तरह, संविधान में संशोधन करने की शक्ति, जो संवैधानिक सुधार का एक जरिया होनी चाहिए थी, उसे कार्यपालिका की ताकत बढ़ाने के एक साधन में बदल दिया गया’.

राजनाथ सिंह ने कहा कि इस दौरान न केवल संस्थाओं को कुचला गया, बल्कि नागरिकों के मानवाधिकारों का भी उल्लंघन किया गया. उन्होंने कहा कि तत्कालीन केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए अटॉर्नी जनरल निरेन डे ने दलील दी कि अगर कोई पुलिस अधिकारी निजी दुश्मनी के चलते किसी निर्दोष व्यक्ति की हत्या भी कर दे, तो भी पीड़ित का परिवार अदालत से कोई राहत नहीं मांग सकता.

मोदी सरकार से की तुलना

रक्षा मंत्री ने अपने लेख में मोदी सरकार का भी जिक्र किया. उन्होंने लिखा ‘अब, इसकी तुलना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों के दौरान संविधान के प्रति दिखाए गए सम्मान से कीजिए. संसद के विशेष बहुमत से पारित 99वें संविधान संशोधन अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था. न केवल इस फैसले का सम्मान किया गया, बल्कि किसी भी तरह के ‘पिछले दरवाजे’ से कानून बनाकर इसे पलटने की कोशिश भी नहीं की गई. संविधान और उसके सिद्धांतों के प्रति इसी सम्मान ने देश के सामने मौजूद कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दों पर हमारे दृष्टिकोण को दिशा दी है.

उन्होंने कहा कि राम मंदिर का निर्माण सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही शुरू हुआ. जब अनुच्छेद 370 को हटाया गया और सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को सही ठहराया, तब भी विपक्ष के कई लोगों ने इस फैसले से असहमति जताई.मंत्री ने कहा कि कांग्रेस ने विधायी प्रक्रियाओं और पदों को भी नहीं बख्शा. जब लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष के नेता से केवल नियमों का पालन करने के लिए कहा, तो उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया.

राजनाथ सिंह ने कहा कि पोस्टट्रुथ’ राजनीति अब राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों तक भी पहुंच गई है. 2019 में, कांग्रेस के एक नेता ने सुप्रीम कोर्ट के राफेल फैसले से जोड़ते हुए गलत तरीके से एक नारा पेश किया था, जिसके लिए बाद में उन्हें अदालत की अवमानना की कार्यवाही में बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी. अगस्त 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय क्षेत्र पर कब्जे को लेकर राहुल गांधी के दावों के आधार पर फिर सवाल उठाया और पूछा कि इन दावों के समर्थन में क्या कोई विश्वसनीय सबूत है.

तीन कृषि कानूनों का जिक्र

मंत्री ने कहा कि अलगअलग विचारों का सम्मान करना हमेशा से हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों का एक अहम हिस्सा रहा है. जब लोगों ने संसद द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों पर चिंता जताई, तो हमने न केवल उन चिंताओं को सुना, बल्कि व्यापक जनहित में उन कानूनों को वापस भी ले लिया.

‘असहमति झूठ पर आधारित नहीं होनी चाहिए’

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में, किसी भी फैसले से असहमत होने की पूरी आजादी है. लेकिन ऐसी असहमति झूठ पर आधारित नहीं होनी चाहिए, और न ही इसका मकसद अव्यवस्था या अराजकता फैलाना होना चाहिए. संविधान सभा में दिए गए अपने प्रसिद्ध भाषण में जिसे अक्सर ‘अराजकता का व्याकरण’ कहा जाता है डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने असंवैधानिक तरीकों को अपनाने के खतरों के प्रति आगाह किया था. मंत्री ने कहा कि उनका यह संदेश आज भी बेहद प्रासंगिक है.

अपने लेख के आखिर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि विपक्ष के नेताओं के लिए अच्छा होगा कि वे इस ऐतिहासिक भाषण को पढ़ें और लोकतंत्र में ‘असहमति’ और ‘अराजकता’ के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को समझें.