पिता भी कितने अजीब होते हैं. जब हम छोटे होते हैं, तो लगता है कि हमारी पूरी दुनिया उन्हीं में समाई है. घर का रास्ता उन्हें पता है. टूटा खिलौना कैसे ठीक होगा, स्कूल की किताबों के पैसे कहां से आएंगे, कोई परेशानी होगी तो क्या करना है, हर सवाल का जवाब उनके पास होता है. फिर हम बड़े होने लगते हैं. हमारी दुनिया में दोस्त, नौकरी, परिवार, बच्चे और सपने जुड़ते जाते हैं. हम उन जगहों तक पहुंच जाते हैं, जहां शायद हमारे पिता कभी नहीं गए. लेकिन इसी बीच, बिना किसी को पता चले, पिता की दुनिया छोटी होने लगती है. जो आदमी कभी हमारा हाथ पकड़कर सड़क पार कराता था, वही एक दिन दरवाजे पर हमारे कदमों की आहट सुनने का इंतजार करने लगता है.

कभी सोचा है कि हम पिता के लिए पिता होना कितना मुश्किल बना देते हैं? थोड़ा सख्त हों तो कहते हैं, हमें समझते नहीं. नरम हों तो कहते हैं, बच्चों को संभालना नहीं आता. देर से घर लौटें तो शिकायत होती है कि परिवार के लिए समय नहीं है. घर पर रहें तो पूछते हैं, दिनभर करते क्या हैं? हमारी मांग पूरी कर दें तो कहते हैं, यह तो उनका फर्ज है. कुछ खरीदकर न दे पाएं तो नाराज हो जाते हैं. भविष्य की चिंता करें तो हमें रोकनेटोकने वाले लगते हैं. चुप रहें तो लगता है कि उन्हें हमारी परवाह नहीं. पिता कुछ भी करें, हमें लगता है कि उन्हें कुछ और करना चाहिए था.
कोई आदमी पिता बनना सीखकर पैदा नहीं होता
लेकिन कोई आदमी पिता बनना सीखकर पैदा नहीं होता. वह भी एक साधारण इंसान होता है, जिसके कंधों पर अचानक किसी दूसरे जीवन की जिम्मेदारी आ जाती है. उसके भी डर होते हैं, गलतियां होती हैं और ऐसे सपने होते हैं, जिन्हें शायद उसने चुपचाप छोड़ दिया. कभी उसकी सख्ती के पीछे प्यार होता है, कभी अपना डर. कभी वह गलत भी होता है. पिता होने का मतलब यह नहीं कि उसका हर फैसला सही है या उससे किसी को दुख नहीं पहुंच सकता. फिर भी कई पिता अपने भीतर सवाल लिए बच्चों के हर सवाल का जवाब देने की कोशिश करते रहते हैं. हम उन्हें हमेशा पिता के रूप में देखते हैं, उस नौजवान के रूप में नहीं, जिसके कभी अपने सपने थे.
पिता का अंतर्मन
कल्पना कीजिए, रात को सबके सो जाने के बाद एक पिता खाने की मेज पर बैठा है. बच्चों की फीस भरनी है. अगले हफ्ते एक बिल देना है. घर की मरम्मत फिर टालनी पड़ेगी. वह दो बार हिसाब लगाता है, कागज समेटता है और बत्ती बुझा देता है. अगली सुबह बेटी कुछ मांगती है. पिता कहते हैं, देखता हूं. बेटी को लगता है कि उन्होंने मना कर दिया. लेकिन पिता के मन में डर है कि कहीं वह बेटी की एक और इच्छा पूरी न कर पाएं. दोनों एकदूसरे के मन की बात नहीं जानते. शायद वर्षों बाद बेटी समझे कि पिता का देखता हूं कई बार यह भी कहता था, काश, मैं तुम्हें और दे पाता.
पिता को किस बात से डर लगता है?
हमारे घरों में एक और खामोशी रहती है. हम पिता से उनके काम, दवाइयों, खाने और बिलों के बारे में पूछ लेते हैं. लेकिन कितनी बार पूछते हैं कि उन्हें किस बात से डर लगता है? उन्हें खुशी किससे मिलती है? अपनी जवानी की कौनसी बात याद आती है? पिता को बच्चों की पसंद, दोस्तों और परेशानियों के बारे में बहुत कुछ पता होता है. लेकिन बच्चों को कई बार यह भी नहीं मालूम होता कि उनके जन्म से पहले पिता कैसे इंसान थे. हम वर्षों तक उनका ध्यान पाते रहते हैं, यह सोचे बिना कि शायद वह भी चाहते हैं कि कोई उन्हें समझे.
हम पिता को बहुत देर से समझते हैं
शायद सबसे दुखद बात यह है कि हम पिता को बहुत देर से समझते हैं. पहले हमें उनके नियम दिखाई देते हैं. फिर उनकी जिम्मेदारियां समझ आती हैं. बहुत बाद में उनका अकेलापन महसूस होता है. और कभीकभी जब मन में उनसे पूछने के लिए ढेरों सवाल आते हैं, तब जवाब देने वाला कोई नहीं बचता. उनकी कुर्सी रहती है. उनकी चीजें रहती हैं. उनकी आवाज भी याद रहती है. लेकिन फिर कोई यह पूछने के लिए नहीं होता, सब ठीक है ना?
पिता से सवाल पूछने का मौका
मैं उस खामोशी को समझता हूं. अपने पिता से कुछ सवाल पूछने का मौका मैं खो चुका हूं. कई बातचीत आज भी मन में होती हैं, लेकिन अब उनसे बात नहीं हो सकती. बात केवल उनकी याद आने की नहीं है. कभी सोचता हूं कि क्या मैं उस इंसान को ठीक से जान पाया था, जिसे मैं पिता कहता था? उन्हें किस बात का डर था? कौनसा सपना अधूरा रह गया? वह कब अकेले महसूस करते थे? क्या कभी उन्हें भी जरूरत थी कि कोई पूछे, आप कैसे हैं? और मैं अपनी जिंदगी में इतना व्यस्त था कि समझ ही नहीं पाया?
हर बच्चे को पिता का प्यार नहीं मिलता
हर पिता अपना प्यार दिखा नहीं पाता. हर बच्चे को पिता का प्यार मिला भी नहीं होता. कुछ रिश्तों में ऐसे घाव होते हैं जो एक फोन से नहीं भरते. लेकिन जहां प्यार अभी बाकी है, वहां किसी खास दिन का इंतजार क्यों करें? उनके पास बिना कुछ मांगे बैठ सकते हैं. पुरानी कहानी फिर सुन सकते हैं. उनके बचपन, अधूरे सपनों और मन की बात पूछ सकते हैं. क्योंकि हम अपनी जिंदगी में पूरी दुनिया के लिए जगह बनाते रहते हैं, जबकि पिता की दुनिया में धीरेधीरे शायद हमारे सिवा बहुत कम लोग बचते हैं.
अगर आपके पिता आज भी आपके सवालों का जवाब देने के लिए मौजूद हैं, तो आखिरी बार आपने उनसे पिता समझकर नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की तरह, जिसे भी किसी अपने की जरूरत हो सकती है, कब पूछा था, पापा, आप सचमुच ठीक हैं ना?



