नई दिल्ली: होर्मुज जलडमरूमध्य में एक बार फिर बारूद की बू आने लगी है और दुनिया एक बार फिर से तेल की किल्लत का वो मंजर सोचकर कांप उठी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ सीजफायर रद्द करने का ऐलान कर दिया और कह दिया कि बुधवार रात को ही तेहरान पर हमले हो सकते हैं. सिर्फ यही नहीं उन्होंने होर्मुज पर एक बार फिर से ब्लॉकेड लगाने का ऐलान कर दिया है. अगर ईरानअमेरिका की जंग शुरू हो गई तो दुनिया भर की रेंगरेंग कर चल रही तेल सप्लाई फिर से ठप हो जाएगी. भारत को क्रूड ऑयल रूस और अमेरिका से मिल जाएगा लेकिन लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि कि एलपीजी गैस कहां से आएगी?

ईरानअमेरिका के होर्मुज ब्लॉकेड का भारत पर क्या होगा असर?
अगर अमेरिका और ईरान के बीच का यह तनाव एक भीषण और लंबे युद्ध में बदल जाता है, तो भारत के लिए सबसे भयावह स्थिति पैदा होगी. पश्चिम एशिया में होने वाली किसी भी हलचल का सीधा और सबसे पहला असर भारत के मिडिल क्लास फैमिली पर पड़ता है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा, कच्चे तेल और सबसे जरूरी घरेलू एलपीजी के लिए सबसे ज्यादा खाड़ी देशों के इसी रास्ते पर निर्भर है.

$130 तक पहुंच सकता है कच्चा तेल: अगर जंग के चलते दुनिया का सबसे सेंसेटिव समुद्री रास्ता यानी ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ पूरी तरह ब्लॉक हो जाता है और ये लंबे समय तक चलता रहता है तो ये मार्च 2026 के संकट से भी बदतर हालात पैदा कर देगा. एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसी स्थिति में वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें $120 से $130 प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं.

महंगाई का डबल अटैक और एलपीजी का संकट: भले ही भारत कच्चे तेल के लिए रूस या अमेरिका का रुख कर ले, लेकिन भारत अपनी आधी से ज्यादा एलपीजी खाड़ी देशों जैसे सऊदी अरब, कतर और यूएई से मंगाता है. अगर होर्मुज का रास्ता बंद हुआ तो देश में रसोई गैस सिलेंडरों की भारी किल्लत हो जाएगी और इसके दाम आम आदमी का बजट पूरी तरह बिगाड़ देंगे. घरेलू बाजार में ईंधन, खानेपीने की चीजें और खाद के दाम बेतहाशा बढ़ जाएंगे.

एक्सपोर्ट कारोबार पूरी तरह ठप: पश्चिम एशिया को होने वाला भारत का निर्यात भी इस जंग की वजह से बुरी तरह प्रभावित होगा, खासकर यूएई को भेजे जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स और ईरान को जाने वाला बासमती चावल का एक्सपोर्ट पूरी तरह बैठ जाएगा. कुल निर्यात में 50% से ज्यादा की भारी गिरावट आ सकती है. इसके साथ ही, सेंट्रल एशिया का गेटवे कहे जाने वाले ईरान के चाबहार पोर्ट में भारत द्वारा किया गया भारी निवेश भी अधर में लटक जाएगा.

भारत के लिए क्या है राहत की खबर
इस पूरी जंग और तनाव के बीच भारत के लिए एक राहत भरी तस्वीर भी बन सकती है, बशर्ते ये दुश्मनी सिर्फ छिटपुट हमलों तक ही सीमित रहे और समुद्र का रास्ता पूरी तरह बंद न हो. फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $75 से $80 प्रति बैरल के आसपास स्थिर बनी हुई हैं.

भारत इस संकट के दौरान अपनी उस बेहतरीन रणनीति का इस्तेमाल कर सकता है, जिसके तहत वो दुनिया के 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल खरीद रहा है. इसमें जोखिम तो है लेकिन भारत दोबारा ईरान से मिलने वाले सस्ते और डिस्काउंटेड तेल और गैस का फायदा उठाकर अपनी डोमेस्टिक सप्लाई को सुरक्षित रख सकता है.

अगर तेल और गैस की सप्लाई सुचारू रूप से चलती रही, तो देश के मजबूत आर्थिक आंकड़े जैसे कि शानदार तिमाही जीएसटी कलेक्शन भारत की रफ्तार को धीमा नहीं होने देंगे. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस रणनीति के दम पर भारत की जीडीपी ग्रोथ 7% के आसपास बनी रह सकती है.

दुनिया के दूसरे देशों पर क्या गुजरेगी?
अगर ये युद्ध लंबा खिंचता है तो सुपरपावर अमेरिका से लेकर खाड़ी के अमीर देशों तक, कोई भी इससे बच नहीं पाएगा.

अमेरिका : अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में पूरी तरह नौसैनिक नाकेबंदी होती है तो अमेरिका में महंगाई फिर से 5% के पार चली जाएगी. इससे फेडरल रिजर्व को ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ेंगी, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार बेहद सुस्त हो जाएगी.
खाड़ी देश : सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत और बहरीन जैसे देशों के बुनियादी ढांचे पर ईरान समर्थित विद्रोही गुट बड़े हमले कर सकते हैं. पानी साफ करने वाले प्लांट और लॉजिस्टिक्स हब निशाना बने तो खाड़ी देशों में पीने के पानी और राशन का हाहाकार मच जाएगा.

पूर्वी एशिया और यूरोप: चीन, जापान और दक्षिण कोरिया अपनी 80% ऊर्जा जरूरतों के लिए इसी रास्ते पर निर्भर हैं. नाकेबंदी हुई तो वहां की फैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी और दुनिया भर में मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट बढ़ जाएगी. वहीं, पश्चिमी यूरोप को खाड़ी से मिलने वाली एलएनजी गैस की सप्लाई ठप होने से उन्हें अमेरिका की महंगी गैस पर निर्भर होना पड़ेगा, जिससे उनकी विंटर एनर्जी सिक्योरिटी खतरे में आ जाएगी.