राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले एक महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन जो लोग सवालों में हैं. जिनकी जवाबदेही असंख्य श्रद्धालुओं की तरफ से दिए गए चढ़ावे पर बिल्कुल साफसाफ बनती है. अब तक उन्हीं की तरफ से जिस तरीके की सफाई दी जा रही है, वो भी अपने आप में नए सवाल खड़े करती है. हम बात कर रहे राम मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि की.

जैसा कि नाम से समझा जा सकता है गोविंद देव गिरि के पास ही राम मंदिर के कोष की संपूर्ण जिम्मेदारी है. लेकिन चढ़ावा चोरी पर कई तरह की नई जानकारियां सामने आने के बीच इन्हीं गोविंद देव गिरि ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और जो कहा वो हैरान करता है.उन्होंने कहा कि चंपत राय से असावधानी हुई. ये तो मैंने कहा है लेकिन चंपत राय ने भी ये काम हमारे दूसरे न्यासी रहे अनिल मिश्रा को सौंपा हुआ था और वो इस काम को देख रहे थे.

उनकी तरफ से भी ये असावधानी हो गई. मैं SIT से पूछूंगा कि ये क्यों किया है? इस्तीफा क्यों दूंगा? SIT न्यायालय नहीं होता है. SIT जांच कमेटी होती है. ये न्यायालय में बोलने के विषय होते हैं. व्यक्तिगत रूप से मुझे प्रायश्चित करना चाहिए, वो मैं रोज अपनी पूजा में कर रहा हूं. रोज उसके लिए विशिष्ट जप और स्त्रोत पाठ आदि मैं कर रहा हूं. जिस स्थान में ये हुआ वहां भगवान के खिलाफ ये अपराध है और इसलिए वहां के लिए दोष के, पाप के, परिमार्जन के लिए वहां पर अनुष्ठान आरंभ किए हैं जिसके लिए 70 पंडितों की व्यवस्था की है.

जवाबदेही की जगह प्रायश्चित, सवालों के जवाब कौन देगा

तो जवाबदेही की जगह प्रायश्चित किया जा रहा है. पूजा और अनुष्ठान से. यही वजह है कि गोविंद देव गिरि ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. कई सवालों का जवाब देने के लिए, लेकिन उनकी इन बातों से नए तरह के सवाल उठ रहे हैं. पहला सवाल है कि ट्रस्ट में कोषाध्यक्ष के तौर पर गोविंद देव गिरि की जवाबदेही क्यों नहीं बनती? दूसरा सवाल राम मंदिर चढ़ावा चोरी के दाग पूजा पाठअनुष्ठान करने से क्या धुल जाएंगे? तीसरा सवाल चंपत राय और सभी सदस्य गलती करते रहे तो खुद गोविंद गिरि क्या कर रहे थे? चौथा सवाल ट्रस्ट के बाकी सदस्यों पर सवाल उठाकर खुद की जवाबदेही से बच जाएंगे गोविंद गिरि? पांचवां सवाल क्या कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि को SIT की जांच पर ही भरोसा नहीं है?

अब जमीन घोटाले की भी हो रही चर्चा

तो सवालों का जवाब देने वाले ही खुद सवालों के घेरे में हैं. और बात सिर्फ चढ़ावा चोरी की नहीं रही. चर्चा अब जमीन घोटाले की भी होने लगी है. ट्रस्ट के ट्रस्ट पर सवालों की अगली कड़ी जमीन खरीद में धांधली के आरोपों से जुड़ती है. दो मामलों का पर्दाफाश हुआ है. दोनों अपने में हैरान करने वाले. एक खरीद में नजूल की जमीन है. तो दूसरी खरीद देवोत्तर संपत्ति की. जिसे हड़पने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं. पूर्व कारसेवक संतोष दुबे ने SIT को इस बाबत कई सबूत भी सौंपे.

नजूल की जमीन खरीदी

सबसे पहले आपको नजूल की जमीन खरीद के बारे में बताते हैं. ये अयोध्या के सुग्रीव टीला के पास की वो जगह है जिसकी खरीद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की तरफ से की गई. गाटा संख्या 247 वाली ये जमीन मंदिर के निकास द्वार के नजदीक है. करीब 23 करोड़ रुपये से ज्यादा में डील तय हुई और जमीन ट्रस्ट ने खरीद ली. सवाल है, नजूल की जमीन तो सरकार की ही होती है. इसे खरीदाबेचा नहीं जा सकता, फिर ये सौदा किस तरह किया गया.

हिंदू धर्म सेना के प्रमुख ने चंपत को घेरा

अब आपको नजूल की जमीन खरीद से जुड़े संतोष दुबे के दावों पर जानकारी देते हैं. समझते हैं, आखिर ये मामला है क्या. हिंदू धर्म सेना के प्रमुख संतोष दुबे का कहना है कि नजूल की जमीन को ना बेचा जा सकता है और ना ही खरीदा जा सकता है. उस जमीन को चंपत राय ने मुरलीदास से 23 करोड़ रूपये में खरीद लिया. नजूल की जमीन पर क्या हक था? आपको ये काम नहीं करना था. ये बड़ा घोटाला है.

देवोत्तर संपत्ति भी खरीदी

इसी तरह देवोत्तर संपत्ति भी खरीदीबेची नहीं जा सकती. लेकिन ट्रस्ट की तरफ से ये काम भी किया गया. ऐसा आरोप हिंदू धर्म सेना के संतोष दुबे ने लगाया है. उन्होंने अयोध्या के ही हरि शंकर सफरीवाला के हवाले से दावा किया कि राम मंदिर ट्रस्ट के तत्कालीन पदाधिकारियों ने फर्जी दस्तावेज तैयार करके प्राचीन राम निवास मंदिर पर कब्जा किया. आज उसी जमीन पर ट्रस्ट का कैंप कार्यालय बनाया गया है.