पूरे देश में एक्सप्रेसवे का जाल बढ़ता जा रहा है. इससे यात्रा सुगम हुई है. देश का पहला एक्सप्रेस वे मुंबई से पुणे कहा जाता है. उसके बाद तो जैसे सिलसिला चल पड़ा. अलगअलग एक्सप्रेस वे देश की यात्रा को सुगम बना रहे हैं. आम यात्रियों, माल ढुलाई, व्यापार, सेना आदि का समय बचने लगा है. जब नेशनल हाइवेज, स्टेट हाइवेज का जमाना नहीं था तो देश की सबसे लंबी सड़क ग्रैंड ट्रंक रोड यानी जीटी रोड हुआ करती थी. यह अंग्रेजों के जमाने से भी पहले की बात है.

आइए, समझते हैं देश के सबसे पुराने माने जाने वाले जीटी रोड की पूरी कहानी. कहां से शुरू और कहां खत्म होती है? कितनी पुरानी सड़क है? अब इसके क्या हाल हैं? असल में किसने बनवाया? क्या वाकई शेरशाह सूरी ने बनाया या किसी और शासक ने?

ग्रैंड ट्रंक रोड कहां से कहां तक जाती है?

ऐतिहासिक रूप से ग्रैंड ट्रंक रोड का मार्ग बहुत लंबा था. यह वर्तमान बांग्लादेश के चटगांव क्षेत्र से शुरू होकर भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान की ओर जाता था. भारत में इसका पुराना मार्ग मुख्य रूप से कोलकाता से दिल्ली, पंजाब और अमृतसर की ओर जाता था. इसके बाद यह लाहौर, पेशावर और काबुल से जुड़ता था. इसलिए इसे दक्षिण एशिया का एक बड़ा संपर्क मार्ग कहा जाता है.

अमृतसर और लाहौर के बीच बना वाघाअटारी बॉर्डर ग्रैंड ट्रंक रोड पर स्थित है.

इस सड़क ने पूर्वी भारत को उत्तर भारत और उत्तरपश्चिमी क्षेत्रों से जोड़ा. आज भारत में जीटी रोड का संबंध कई राष्ट्रीय राजमार्गों से है. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। इसका बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय राजमार्ग 19 और राष्ट्रीय राजमार्ग 44 जैसे मार्गों में शामिल है. अलगअलग राज्यों में इसके नाम और मार्ग में कुछ बदलाव भी हुए हैं.

2300 साल पुरानी सड़क परंपरा

ग्रैंड ट्रंक रोड का इतिहास प्राचीन भारत के उत्तरापथ से जुड़ा माना जाता है. उत्तरापथ का अर्थ है उत्तर दिशा का प्रमुख मार्ग. यह प्राचीन व्यापार और यात्रा का रास्ता था. मौर्य काल में इस तरह के रास्तों का बहुत महत्व था. चंद्रगुप्त मौर्य और बाद में सम्राट अशोक के समय बड़े साम्राज्य को जोड़ने के लिए सड़कों की जरूरत थी. प्रशासन, सेना, व्यापार और संदेश भेजने के लिए मार्ग बनाए और सुधारे जाते थे. प्राचीन यात्रियों और इतिहासकारों के विवरणों से भी पता चलता है कि भारत में दूरदूर तक जाने वाले रास्ते थे. इन मार्गों से व्यापारी, सैनिक, साधु, विद्यार्थी और विदेशी यात्री यात्रा करते थे. यह कहना अधिक सही होगा कि जीटी रोड का मूल मार्ग बहुत पुराना है. लेकिन इसे एक व्यवस्थित और मजबूत सड़क के रूप में कई शासकों ने अलगअलग समय पर विकसित किया.

किसने बनवाई ग्रैंड ट्रंक रोड?

ग्रैंड ट्रंक रोड के निर्माता के रूप में शेरशाह सूरी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. पर, तथ्यों को देखें तो पता चलता है कि यह बात पूरी तरह सत्य नहीं है. क्योंकि शेरशाह सूरी दिल्ली की गद्दी पर बमुश्किल पांच साल ही रहा. घोषित तौर पर वह 1540 से 1545 के बीच सिंहासन पर रहा. उसने कन्नौज में हुमायूं को हराकर सत्ता हासिल की थी. पांच साल के संक्षिप्त कार्यकाल में इतनी लंबी सड़क कोई बनवा ही नहीं सकता.

शेरशाह सूरी.

हां, इतिहास बताता है कि शेरशाह सूरी ने इस मार्ग को सुधारने में बड़ी भूमिका अदा की थी. जिस कन्नौज में सूरी ने हुमायूं को मात दी थी, वह इसी जीटी रोड पर बसा हुआ है. उसने पुराने मार्गों को ठीक कराया. कई स्थानों पर सड़क चौड़ी कराई. यात्रियों के लिए सराय बनवाई. पेड़ लगवाए. कुएं और डाक व्यवस्था भी विकसित की. दूरी मापने को सूरी ने सड़क कोस मीनारें बनवाईं. एक कोस लगभग तीन किलोमीटर के आसपास माना जाता था. इन मीनारों से यात्रियों को दूरी समझने में मदद मिलती थी. इस तरह कहा जाना चाहिए कि सूरी ने प्राचीन मार्ग को नए रूप में व्यवस्थित और मजबूत किया.

कैसी थी शेरशाह सूरी की सड़क व्यवस्था?

शेरशाह सूरी की व्यवस्था अपने समय के लिए बहुत उन्नत थी. उसने सड़क को केवल सेना की आवाजाही का साधन नहीं माना. उसने इसे आम लोगों और व्यापारियों की जरूरत से भी जोड़ा. सड़क के किनारे बनाए गए सराय में यात्रियों को आराम मिलता था. घोड़ों और जानवरों के लिए भी जगह होती थी. कई सरायों के पास पानी की व्यवस्था की जाती थी. कुछ स्थानों पर हिंदू और मुस्लिम यात्रियों के लिए अलग व्यवस्था होने का भी उल्लेख मिलता है. यह उस समय की सामाजिक जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया प्रबंध था.

मुगल बादशाह अकबर. फोटो: Getty Images

मुगल काल में भी महत्वपूर्ण थी जीटी रोड

मुगल शासकों ने भी इस मार्ग का खूब उपयोग किया. दिल्ली, आगरा, लाहौर और अन्य बड़े शहरों को जोड़ने में इस सड़क की भूमिका रही. सेना की आवाजाही के लिए यह बहुत उपयोगी थी. मुगल काल में व्यापार बढ़ा. कपड़ा, मसाले, अनाज, धातु, घोड़े और अन्य सामान इस मार्ग से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचते थे. कई कस्बे और बाजार इसी सड़क के आसपास विकसित हुए. यह सड़क केवल सामान नहीं ले जाती थी. इसके साथ विचार, भाषाएं, खानपान और परंपराएं भी यात्रा करती थीं. अलगअलग क्षेत्रों के लोग आपस में मिलते थे. इससे सांस्कृतिक संबंध भी मजबूत हुए.

अंग्रेजों ने क्या बदलाव किए?

ब्रिटिश शासन के दौरान ग्रैंड ट्रंक रोड को आधुनिक तरीके से विकसित किया गया. अंग्रेजों को सेना, व्यापार और प्रशासन के लिए तेज संपर्क चाहिए था, इसलिए उन्होंने इसके कई हिस्सों को पक्का कराया. 19वीं सदी में सड़क की मरम्मत, पुल निर्माण और यातायात व्यवस्था पर काम हुआ. कई जगह सड़क को नई इंजीनियरिंग के अनुसार बनाया गया. डाक और माल ढुलाई के लिए भी इसका उपयोग बढ़ा. ब्रिटिश काल में रेल नेटवर्क आने के बाद सड़क का महत्व कुछ क्षेत्रों में बदला. फिर भी जीटी रोड महत्वपूर्ण बनी रही. यह शहरों और कस्बों को जोड़ने वाली मुख्य सड़क थी.

दिल्ली के शाहदरा से गुजरती जीटी रोड.

व्यापार और अर्थव्यवस्था में भूमिका

ग्रैंड ट्रंक रोड ने भारत की अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभाई. पुराने समय में व्यापारी बैलगाड़ियों, घोड़ों और ऊंटों के साथ इस मार्ग से यात्रा करते थे. वे दूरदूर के बाजारों तक पहुंचते थे. इस मार्ग से कपास, रेशम, मसाले, नमक, अनाज और हस्तशिल्प का सामान भेजा जाता था. इससे बाजारों का विस्तार हुआ. कई शहर व्यापारिक केंद्र बने. आज भी सड़क परिवहन भारत की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है. जीटी रोड से जुड़े कई औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्र सक्रिय हैं. ट्रक, बसें, निजी वाहन और स्थानीय यातायात इस मार्ग का उपयोग करते हैं.

आज ग्रैंड ट्रंक रोड किस हाल में है?

आज ग्रैंड ट्रंक रोड एक ही रूप में मौजूद नहीं है. इसके कई हिस्से आधुनिक राष्ट्रीय राजमार्गों में बदल चुके हैं. कुछ हिस्सों पर चौड़ी सड़कें, फ्लाईओवर और बाईपास बन चुके हैं. दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में इसके अलगअलग हिस्से दिखाई देते हैं. हालांकि, कई जगह इसे अब भी जीटी रोड के नाम से पहचाना जाता है. शहरों के पास ट्रैफिक बहुत बढ़ गया है. जाम, अतिक्रमण और प्रदूषण जैसी समस्याएं भी हैं. कुछ पुराने हिस्सों की हालत खराब है. बरसात में गड्ढे और जलभराव की परेशानी होती है. दूसरी ओर, कई हिस्सों में सड़क चौड़ी की गई है. नए पुल, बाईपास और टोल मार्ग बनाए गए हैं. इससे लंबी दूरी की यात्रा पहले की तुलना में तेज हुई है.

ग्रैंड ट्रंक रोड भारत के लंबे इतिहास की जीवित निशानी है. इसका मूल मार्ग प्राचीन काल से मौजूद रहा. मौर्य काल से लेकर शेरशाह सूरी, मुगलों और अंग्रेजों तक कई शासकों ने इसे उपयोग किया और सुधारा. शेरशाह सूरी का योगदान सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. उसने इस मार्ग को व्यवस्थित सड़क, सराय, डाक चौकी और कोस मीनारों से जोड़ा. इसी कारण जीटी रोड का नाम उसके साथ विशेष रूप से लिया जाता है. आज यह सड़क आधुनिक भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों का हिस्सा बन चुकी है. फिर भी इसके भीतर सदियों का इतिहास छिपा है. ग्रैंड ट्रंक रोड हमें बताती है कि सड़कें केवल रास्ते नहीं होतीं. वे लोगों, शहरों, व्यापार और इतिहास को जोड़ने वाली जीवनरेखा होती हैं.