दिल्ली के जंतरमंतर पर सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल शुक्रवार को भी जारी है. उनकी भूख हड़ताल का 20वां दिन है. डॉक्टरों का कहना है कि लगातार हड़ताल के बाद उनके ऑर्गन फेल्योर का खतरा बढ़ गया है. दिल्ली सरकार को उनका रोजाना मेडिकल टेस्ट करने के निर्देश दिए गए थे. 20 दिन में उनका वजन 8 किलो से ज्यादा घट चुका है.

विज्ञान के नजरिए से देखें शारीरिक रूप से भूखे रहने का असर शरीर पर तीन चरणों में होता है, जो एकदूसरे से जुड़े होते हैं. हर चरण में शरीर सक्रिय रहने की कोशिश रखता है, लेकिन बदलावों का असर दिखने लगता है. जानिए, भूख हड़ताल के बाद शरीर पर कबकितना असर होता है.
भूख हड़ताल का शरीर पर कितना असर होता है?
खाना बंद करने के बाद 48 घंटे में शरीर ब्लड शुगर लेवल को स्थिर रखने के लिए लिवर में जमा ग्लाइकोजन का इस्तेमाल करता है. इस प्रक्रिया को ग्लाइकोजेनोलिसिस कहते हैं और यह थोड़े समय का उपाय है. महज 24 से 48 घंटों में ग्लाइकोजन खत्म हो जाता है. इसके बाद शरीर एनर्जी के लिए फैट को तोड़ना शुरू कर देता है. यही वो स्टेज है जहां से भूख हड़ताल का असली असर शुरू होता है.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन के अनुसार, उम्र, जेंडर और फिजिकल एक्टिविटी के आधार पर हर वयस्क को अलगअलग एनर्जी की मात्रा की जरूरत होती है. यही एनर्जी सांस लेने, भोजन पचाने, शरीर का तापमान बनाए रखने के लिए जरूरी होती है, लेकिन जब इसका स्तर गिरता है तो हालात बिगड़ते हैं.
पहला हफ्ता : कमजोरी और एनर्जी की कमी
पहले हफ्ते में शरीर रिजर्व फैट का इस्तेमाल कर एनर्जी बनाता है, लेकिन इस प्रक्रिया में इंसान को कमजोरी, थकान और चक्कर आने जैसी दिक्कतें महसूस होने लगती हैं. भूख का एहसास शुरुआती दिनों में सबसे तेज होता है, लेकिन तीसरेचौथे दिन के बाद शरीर धीरेधीरे इस स्थिति के अनुसार ढलना शुरू कर देता है.
इस दौरान ब्लड शुगर लेवल गिरने लगता है, जिससे सिरदर्द और चिड़चिड़ापन भी बढ़ सकता है. अगर व्यक्ति सिर्फ पानी पी रहा है, तो शरीर अभी इस स्टेज को सामान्य तरीके से झेल लेता है, लेकिन अगर पानी भी नहीं लिया जा रहा तो एक हफ्ते के भीतर ही स्थिति गंभीर होनी शुरू हो जाती है.
भूख हड़ताल इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगाड़ती है और दिल पर असर होता है. फोटो: Pexels
दूसरा हफ्ता : मांसपेशियों पर दिखता है असर
दूसरे हफ्ते तक फैट रिजर्व भी घटने लगता है, जिसके बाद शरीर ऊर्जा के लिए मांसपेशियों को तोड़ना शुरू कर देता है. इससे शारीरिक कमजोरी काफी बढ़ जाती है और रोजमर्रा के छोटेछोटे काम करना भी मुश्किल हो जाता है. इसी दौरान शरीर में सोडियम और पोटैशियम जैसे जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ने लगता है, जिसका सीधा असर दिल की धड़कन पर पड़ सकता है.
ब्लड प्रेशर गिरना शुरू हो जाता है, जिससे बेहोशी या चक्कर आने का खतरा बढ़ जाता है. डॉक्टरों के मुताबिक इस स्टेज पर मेडिकल जांच बेहद जरूरी हो जाती है, क्योंकि दिल से जुड़ी दिक्कतें अचानक भी सामने आ सकती हैं.
Im Not in good shape but not so bad either…
Rather than asking me to break my fast please join me on 20th July… Peaceful March to the Parliament.#cockroachjanataparty #jantarmantar #cjpprotest #chalosansad pic.twitter.com/QZ6VyxVMAR— Sonam Wangchuk July 15, 2026
तीसरा हफ्ता : अंगों पर सीधा दबाव
तीसरे हफ्ते में हालात और नाजुक हो जाते हैं. शरीर अब अपने ही टिश्यू और मांसपेशियों को तेजी से तोड़कर ऊर्जा बनाने लगता है, जिससे वजन में भारी गिरावट आती है. इस स्टेज पर लिवर और किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंगों पर सीधा दबाव पड़ने लगता है, क्योंकि शरीर के टॉक्सिन्स को बाहर निकालने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है. रोगों से लड़ने वाला इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है, जिससे संक्रमण होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. डॉक्टरों के अनुसार, इस दौरान लगातार मेडिकल टीम की निगरानी में रहना जरूरी हो जाता है, ताकि किसी इमरजेंसी से तुरंत निपटा जा सके.
दिल की धड़कन अनियमित हो सकती है. फोटो: Pexels
चौथा हफ्ता और उसके बाद: जानलेवा हो सकती है स्थिति
अगर भूख हड़ताल तीन हफ्तों से आगे बढ़ती है, तो शरीर के अंग विफल होने का खतरा गंभीर रूप से बढ़ जाता है. दिल की धड़कन अनियमित हो सकती है, और दिमाग तक ठीक से ऊर्जा न पहुंच पाने से भ्रम या बेहोशी जैसी स्थिति भी बन सकती है. यही वजह है कि लंबी भूख हड़तालों में शामिल लोगों की सेहत पर डॉक्टरों की टीम हर घंटे नजर रखती है.
डॉक्टरों का कहना है, हड़ताल के बाद उनके ऑर्गन फेल्योर का खतरा बढ़ गया है. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। फोटो: PTI
पानी छोड़ने पर खतरा कई गुना ज्यादा
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पूरी प्रक्रिया इस बात पर बहुत हद तक निर्भर करती है कि व्यक्ति सिर्फ ठोस भोजन छोड़ रहा है या पानी भी नहीं ले रहा. अगर व्यक्ति सिर्फ पानी पर निर्भर है, तो शरीर हफ्तों तक इस स्थिति को झेल सकता है. लेकिन अगर पानी भी बंद कर दिया जाए, तो कुछ ही दिनों के भीतर अंग विफल होने का खतरा बन जाता है और स्थिति जानलेवा हो सकती है. वहीं अगर भूख हड़ताल के दौरान जूस, नारियल पानी या ORS जैसी चीजें ली जाती हैं, तो इनसे मिलने वाली थोड़ी ऊर्जा और इलेक्ट्रोलाइट्स की वजह से स्थिति उतनी गंभीर नहीं रहती, जितनी सिर्फ पानी पर निर्भर रहने पर होती है.
भूख हड़ताल की लिमिट
एक्सपर्ट कहते हैं, भूख हड़ताल की लिमिट बात पर निर्भर करती है कि इंसान पानी पी रहा है या नहीं, उसकी उम्र, स्वास्थ्य, वजन और उसे डॉक्टरी देखभाल मिल पा रही है या नहीं.Healthline की रिपोर्ट कहती है, बिना खाना और पानी के शरीर ज्यादा से ज्यादा एक हफ़्ते तक ज़िंदा रह सकता है. अगर सिर्फ पानी मिले और खाना न मिले, तो जीवन 2 से 3 महीने तक बढ़ सकता है.अगर पानी पीते रहें तो कई लोग 30 से 70 दिन या उससे अधिक समय तक जीवित रह सकते हैं, लेकिन इस दौरान शरीर को नुकसान होने लगता है.
क्या सब पर एक जैसा असर होता है?
विशेषज्ञ कहते हैं, भूख हड़ताल का असर हर इंसान पर एक जैसा नहीं होता. यह उम्र, पहले से मौजूद बीमारियों, शरीर की बनावट, पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स और मेडिकल मॉनिटरिंग जैसी कई बातों पर निर्भर करता है. यही वजह है कि किसी इंसान की हालत एक हफ्ते में गंभीर हो सकती है, तो किसी की स्थिति तीन हफ्ते बाद भी थोड़ा स्थिर रह सकती है.
भूख हड़ताल जैसेजैसे लंबी खिंचती है, शरीर पर खतरा भी उतना ही बढ़ता जाता है. यही वजह है कि लंबी भूख हड़तालों के दौरान डॉक्टरों की सलाह और लगातार मेडिकल निगरानी को बेहद जरूरी माना जाता है.



