कहावत है कि इतिहास खुद को दोहराता है. तेल के बारे में यही होता हुआ दिखाई दे रहा है. लगातार हो रहे अमेरिकी हमलों से जहां ईरान कराह रहा है, वहीं दुनिया तेल संकट से जूझने की ओर बढ़ रही है. बीते एक सप्ताह में कच्चे तेल के दाम पूरी दुनिया में बढ़ते जा रहे हैं. कच्चा तेल की कीमतें बीते पांच हफ्तों में सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुकी हैं. 23 जुलाई को भी कच्चे तेल के दाम बढ़े.

सवाल उठ रहा है कि क्या साल 1973 का तेल संकट साल 2026 में भी आ सकता है? यदि हां तो इतिहास खुद को दोहराएगा. आइए, इस पूरे मामले को समझते हैं.
1973 का तेल संकट क्या था?
अक्टूबर 1973 में यॉम किपुर युद्ध शुरू हुआ. मिस्र और सीरिया ने इज़राइल पर हमला किया. उनका उद्देश्य 1967 के युद्ध में खोया क्षेत्र वापस लेना था. अमेरिका ने इज़राइल को सैन्य सहायता दी. इसके बाद अरब तेल निर्यातक देशों की अलग तरह से प्रतिक्रिया सामने आई. उन्होंने अमेरिका और इज़राइल समर्थक कुछ देशों पर तेल प्रतिबंध लगाया. इस संगठन को ओपेक कहा जाता है. यह अरब पेट्रोलियम निर्यातक देशों का समूह था. सऊदी अरब के राजा फैसल इस नीति के प्रमुख समर्थकों में थे. तेल केवल व्यापार की वस्तु नहीं रहा. वह विदेश नीति का हथियार बन गया. यही 1973 के संकट की सबसे बड़ी बात थी.
यॉम किपुर युद्ध मेंमिस्र और सीरिया ने इज़राइल पर हमला किया. फोटो: mwi.westpoint.edu
तेल की कीमतों में आया था बड़ा उछाल
प्रतिबंध अक्टूबर 1973 में शुरू हुआ. यह मार्च 1974 तक चला, लेकिन इसका आर्थिक असर कई वर्षों तक रहा. एक बैरल तेल की कीमत करीब 3 डॉलर से बढ़कर लगभग 12 डॉलर तक पहुंच गई यानी कीमत करीब चार गुना हो गई. अमेरिका और यूरोप में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लगीं. कई जगह ईंधन की बिक्री सीमित करनी पड़ी. कारखानों, परिवहन और बिजली उत्पादन की लागत बढ़ी. महंगाई तेज हुई. विकास की रफ्तार धीमी हुई. बेरोजगारी भी बढ़ी. अर्थव्यवस्था जर्जर हो चली.
1973 की दुनिया ज्यादा कमजोर क्यों थी?
उस समय बड़ी अर्थव्यवस्थाएं तेल पर बहुत निर्भर थीं. अमेरिका का घरेलू तेल उत्पादन अपनी सीमा पर पहुंच चुका था. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। उसका आयात बढ़ रहा था. यूरोप और जापान भी पश्चिम एशिया के तेल पर निर्भर थे. ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत बहुत कम थे. सौर और पवन ऊर्जा बेहद शुरुआती दौर में थे. तेल की कमी का मतलब था उत्पादन की कमी. उत्पादन की कमी का मतलब था महंगी वस्तुएं. इस तरह युद्ध का असर हर परिवार तक पहुंच गया. 1973 ने दुनिया को बताया कि ऊर्जा सुरक्षा भी राष्ट्रीय सुरक्षा है. इसके बाद कई देशों ने तेल भंडार बनाना शुरू किया. ऊर्जा बचत पर जोर बढ़ा. नई आपूर्ति के स्रोत खोजे गए.
ईरानअमेरिका जंग
2026 का ईरान युद्ध क्यों महत्वपूर्ण है?
साल 2026 में ईरान से जुड़ा संघर्ष केवल एक सीमा तक सीमित नहीं है. इसका असर पूरे पश्चिम एशिया पर पड़ रहा है. इसमें अमेरिका, इज़राइल, ईरान और क्षेत्र के कई साझेदारों के हित जुड़े हैं. संघर्ष का एक बड़ा पहलू ईरान की परमाणु गतिविधियां हैं. क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री व्यापार भी यहाँ महत्वपूर्ण भूमिका में हैं. सबसे अहम सवाल हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य का है. यह फारस की खाड़ी को खुले समुद्र से जोड़ता है. तेल और गैस के बहुत बड़े जहाज इसी रास्ते से गुजरते हैं. यदि इस रास्ते पर खतरा बढ़ता है, तो जहाजों की आवाजाही धीमी हो सकती है. बीमा महंगा हो सकता है. तेल और गैस की ढुलाई महंगी हो सकती है. बाजार में अस्थिरता का माहौल बन सकता है.
1973 और 2026 में क्या समान है?
दोनों घटनाओं में पश्चिम एशिया केंद्र में है. युद्ध और ऊर्जा बाजार जुड़े हुए हैं. इज़राइल की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. दोनों में अमेरिका की भूमिका अहम है. दोनों में तेल की आपूर्ति पर खतरा पैदा हुआ. बाजार ने तब भी अनिश्चितता प्रतिक्रिया दी और अब भी दे रहा है. ऊर्जा आयातक देशों को महंगाई का डर सता रहा है. सबसे बड़ी समानता यह है कि भूराजनीति फिर तेल की कीमत तय कर रही है. तेल बाजार केवल मांग और उत्पादन से नहीं चलता. युद्ध, समुद्री मार्ग और राजनीतिक फैसले भी कीमत बदल देते हैं. तब तेल आपूर्ति पर सीधा प्रतिबंध था. अब खतरा युद्ध, हमलों और समुद्री अवरोध का है.
क्रूड ऑयल.
दोनों स्थितियों में क्या है मुख्य अंतर?
1973 में अरब देशों ने तेल को जानबूझकर दबाव के साधन की तरह इस्तेमाल किया. यह एक संगठित तेल प्रतिबंध था. साल 2026 की स्थिति अधिक जटिल है. यहां केवल निर्यात रोकने का मामला नहीं है. यह युद्ध, मिसाइल, ड्रोन, समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक जोखिम का मामला है. आज दुनिया के पास 1973 की तुलना में अधिक विकल्प हैं. कई देशों के पास रणनीतिक तेल भंडार हैं. अमेरिका अब पहले जितना आयातनिर्भर नहीं है. कनाडा, ब्राजील, नॉर्वे और अन्य देशों की भूमिका भी बढ़ी है. नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ा है. इलेक्ट्रिक वाहन भी बढ़े हैं. फिर भी तेल की जरूरत खत्म नहीं हुई है. विमानन, जहाज, ट्रक और पेट्रोकेमिकल उद्योग अभी भी तेल पर निर्भर हैं. इसलिए पश्चिम एशिया का संकट आज भी पूरी दुनिया को प्रभावित करता है.
भारत पर क्या हो सकता है असर?
भारत तेल का बड़ा आयातक देश है. इसलिए तेल की हर बड़ी कीमतवृद्धि भारत के लिए चिंता का विषय है. कच्चा तेल महंगा होगा तो पेट्रोल और डीजल पर दबाव बढ़ेगा. परिवहन महंगा होगा. माल ढुलाई महंगी होगी. इसका असर अलगअलग तरीकों से सीधे रसोई पर पड़ेगा. तेल आयात बिल बढ़ने से रुपये पर दबाव आ सकता है. सरकार को ईंधन कर और सब्सिडी के बीच संतुलन बनाना पड़ सकता है.
भारतीय रिज़र्व बैंक के लिए भी महंगाई पर नियंत्रण कठिन हो सकता है, इसीलिए भारत के लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता बहुत जरूरी है. सिर्फ एक क्षेत्र या एक समुद्री मार्ग पर निर्भरता जोखिम बढ़ाती है.
1973 में मिला था सबसे बड़ा सबक
1973 का सबक साफ है. सस्ता तेल हमेशा उपलब्ध रहेगा, यह मानना गलत है. ऊर्जा सुरक्षा के लिए तीन चीजें जरूरी हैं. तेल के पर्याप्त रणनीतिक भंडार, कई देशों से आपूर्ति और तेल पर निर्भरता कम करना. ऊर्जा बचत भी उतनी ही जरूरी है. बेहतर सार्वजनिक परिवहन मदद कर सकता है. सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार जरूरी है. इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग भी बढ़ना चाहिए. लेकिन ऊर्जा बदलाव एक दिन में नहीं होगा, इसलिए संकट के समय तेल की उपलब्धता भी जरूरी रहेगी.
सरल शब्दों में कहें तो 1973 और 2026 एक जैसे नहीं हैं लेकिन दोनों में एक गहरी समानता है. पश्चिम एशिया का युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकता है. 1973 में तेल प्रतिबंध ने दुनिया को झटका दिया था. 2026 में युद्ध और समुद्री मार्गों का जोखिम वही डर वापस ला रहा है. इतिहास खुद को हूबहू नहीं दोहराता, लेकिन वह चेतावनी जरूर देता है. 1973 ने संदेश दिया था तेल पर अत्यधिक निर्भरता खतरनाक और 2026 की चेतावनी है कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला जितनी जुड़ी है, उतनी ही नाजुक भी है. दुनिया को युद्ध से बचना होगा. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। ऊर्जा के नए स्रोत विकसित करने होंगे और जरूरी समुद्री रास्तों को सुरक्षित रखना होगा. तभी अगला तेल संकट केवल इतिहास की किताबों में रहेगा, आम लोगों की रसोई और जेब में नहीं.



