आज आईवीएफ की मदद से दुनियाभर में लाखों कपल मातापिता बनने का सपना पूरा कर चुके हैं. इसके बावजूद इस आईवीएफ के ट्रीटमेंट को लेकर कई तरह की गलत धारणाएं और अफवाहें मौजूद हैं. कुछ लोग इसे आखिरी विकल्प मानते हैं, तो कुछ इसकी सफलता और सेफ्टी को लेकर कंफ्यूज रहते हैं. सही जानकारी के अभाव में कई दंपति इलाज शुरू करने में देरी कर देते हैं. लोग मानते हैं कि कि आईवीएफ से जन्मे बच्चे दूसरों की तरह नॉर्मल नहीं होते? क्या ये सच है या फिर महज एक मिथक.

ये ट्रीटमेंट काफी महंगा होता है? लोग ऐसे सवाल की वजह से भी इसको लेकर कंफ्यूजन में रहते हैं. इससे जुड़े कई मिथक को लेकर टीवी9 ने डॉ. स्वाति त्रिवेदी से खास बातचीत की. चलिए आपको बताते हैं…
आईवीएफ से जुड़े 7 बड़े मिथक
मिथक 1: आईवीएफ से पैदा होने वाले बच्चे सामान्य नहीं होते
सच्चाई: आईवीएफ से जन्म लेने वाले बच्चे भी दूसरे बच्चों की तरह पूरी तरह सामान्य होते हैं. उनका शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास नॉर्मल तरीके से होता है. वे पढ़ाई, खेलकूद और जीवन हर जगह दूसरे बच्चों की तरह ही आगे बढ़ सकते हैं. बच्चे की डेवलपमेंट इस बात पर डिपेंड करती है कि उसे कितना अच्छा न्यूट्रिएशन, केयर और पॉजिटिव माहौल मिलता है.
मिथक 2: आईवीएफ सिर्फ महिलाओं की समस्या का इलाज है
सच्चाई: यह धारणा सही नहीं है. गर्भधारण में परेशानी केवल महिलाओं की वजह से नहीं होती, बल्कि कई मामलों में पुरुषों से जुड़ी समस्याएं भी जिम्मेदार हो सकती हैं. पुरुषों में स्पर्म काउंट या क्वालिटी कम होना भी इनफर्टिलिटी का कारण बन सकता है. इसलिए आईवीएफ शुरू करने से पहले पति और पत्नी दोनों की जांच की जाती है और इलाज का फैसला दोनों की मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर लिया जाता है.
मिथक 3: आईवीएफ पहली बार में ही सफल हो जाता है
सच्चाई: आईवीएफ के कामयाब होने की सिचुएशन हर इंसान में अलग हो सकती है. यह महिला की उम्र, एग की क्वालिटी, पुरुष के स्पर्म की सिचुएशन, हार्मोन और दूसरे हेल्थ कारणों पर निर्भर करती है. कुछ कपल को पहली कोशिश में सफलता मिल जाती है, जबकि कुछ को एक से अधिक आईवीएफ साइकिल की जरूरत पड़ सकती है.
मिथक 4: आईवीएफ सिर्फ ज्यादा उम्र की महिलाओं के लिए होता है
सच्चाई: आईवीएफ सिर्फ ज्यादा उम्र की महिलाओं के लिए नहीं है. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। अगर किसी कपल को लंबे समय तक कोशिश के बाद भी प्रेगनेंसी कंसीव करने में परेशानी हो रही है या महिला में फैलोपियन ट्यूब ब्लॉक, एंडोमेट्रियोसिस, पीसीओएस जैसी समस्या है या पुरुष में शुक्राणुओं से जुड़ी परेशानी है, तो डॉक्टर आईवीएफ की सलाह दे सकते हैं. हालांकि कम उम्र में आईवीएफ की सफलता की संभावना आमतौर पर ज्यादा होती है, इसलिए जरूरत पड़ने पर समय पर विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है।
मिथक 5: आईवीएफ से हमेशा जुड़वां बच्चे होते हैं
सच्चाई: यह एक पुरानी सोच है. पहले कई बार एक से अधिक भ्रूण ट्रांसफर किए जाते थे, जिससे जुड़वां बच्चों की संभावना बढ़ जाती थी. लेकिन अब आधुनिक तकनीक में डॉक्टर जरूरत के अनुसार एक स्वस्थ भ्रूण ट्रांसफर करने को प्राथमिकता देते हैं. इससे स्वस्थ गर्भावस्था की संभावना बढ़ती है और जुड़वां बच्चों का जोखिम कम होता है. इसलिए आईवीएफ का मतलब हमेशा जुड़वां बच्चे होना नहीं है.
मिथक 6: आईवीएफ के बाद पूरे नौ महीने आराम करना पड़ता है
सच्चाई: आईवीएफ के बाद कुछ समय आराम की सलाह दी जा सकती है, लेकिन पूरे नौ महीने बिस्तर पर रहने की जरूरत नहीं होती. डॉक्टर की सलाह के अनुसार महिला सामान्य जीवन जी सकती है और हल्कीफुल्की एक्टिविटी जारी रख सकती है. जरूरत से ज्यादा आराम करना हमेशा जरूरी या फायदेमंद नहीं माना जाता.
मिथक 7: आईवीएफ के बाद प्राकृतिक तरीके से गर्भधारण नहीं हो सकता
सच्चाई: यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है. कई दंपतियों में आईवीएफ के बाद आने वाले वर्षों में प्राकृतिक रूप से भी गर्भधारण हो जाता है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि शुरुआत में गर्भधारण में परेशानी किस कारण से हो रही थी, महिला और पुरुष की फर्टिलिटी कैसी है और इलाज के बाद शरीर की स्थिति में कितना सुधार हुआ है. आईवीएफ कराने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में प्राकृतिक गर्भधारण की संभावना पूरी तरह खत्म हो जाती है.



