औरंगज़ेब को कैदी बाप शाहजहां सचेत कर रहा था कि आगे तुम्हारे बेटे भी तुम्हारे साथ ऐसा ही सलूक करेंगे. जवाब में औरंगज़ेब ने बाप को उसकी करतूतों की याद दिलाई. याद करो कि तुमने अपने भाई खुसरो और परवेज़ को रास्ते से कैसे हटाया था? कैसे छोटेछोटे बेकसूर शहजादों और दावर बख़्श और शहरयार को कत्ल कराया था! हमने तो सबूत के तौर पर भाईजान जियू का कटा सिर इसलिये भेजा ताकि तुमको भरोसा हो सके कि तख़्त के लिए तुमने अपनी करनी से जो सिखाया, उसे हमने कितने अच्छे तरीके से सीखा और कामयाब हुए. उधर बहन जहांआरा लिख रही थी कि शहज़ादों के भीतर जो दस फ़ीसद जानवर बसता है, वह एक दिन उनकी हुकूमत के लिए कयामत का सबब बनेगा. पढ़िए औरंगज़ेब से जुड़े किस्से.

दारा की तरफदारी के बाद भी औरंगज़ेब ने बड़ी बहन जहांआरा से दुश्मनी नहीं ठानी. उसे कैदी बाप शाहजहां की खिदमत के लिए आगरा किले में साथ रहने की इजाज़त दे दी. बता दिया कि बाप कैदी हैं तुम नहीं. जहांआरा के लिए औरंगज़ेब का यह सलूक चौंकाने वाला था. कैद में शाहजहां की देखभाल के लिए गुलचिरा, फ़िदा, शकीला, दिलदार , महताब , रेहान बगैरह कई सेवक सेविकाएं मौजूद थे. लेकिन बेटी का साथ शाहजहां को कुछ राहत दे रहा था. उधर जहांआरा पिता को तसल्ली और हौसला देने के साथ अपना समय पढ़तेलिखते और तख़्त के लिए हुए खूनी संघर्ष की वजहों को तलाशते बिता रही थी.
औरंगज़ेब की बगावत, भाइयों के कत्ल और पिता को बंदी बनाने के फैसलों से वह दुःखी थी. लेकिन इसी के साथ याद कर रही थी कि बादशाह होने के पहले जहांगीर ने अपने पिता अकबर के खिलाफ बगावत की. शाहजहां ने यही काम अपने पिता जहांगीर के साथ किया. यानी हर अगली पीढ़ी पुरखों के रास्ते चल रही है. उसने लिखा कि क्या हिंदुओं के बीच प्रचलित कर्म फल यही है !
औरंगज़ेब क्यों जीता?
दारा क्यों हारा और औरंगज़ेब क्यों जीता? जहांआरा के मुताबिक दारा की तरह किसी मसले को लेकर औरंगज़ेब कभी दुविधा में नहीं रहा. तख़्त की जंग में उसने कुछ भी नाजायज़ नहीं माना. रास्ता रोकने वालों के साथ रिश्तों की परवाह नहीं की. उनके साथ कोई नरमी नहीं बरती. हर अगली चाल सधी हुई चली. दारा की हिमायत में रहने के बाद भी अब जहांआरा अब औरंगज़ेब की खूबियों की कायल हो चुकी थी. हालांकि दारा को बेदर्दी से मारे जाने की पीड़ा उसे बेचैन कर रही थी.
मुगल बादशाह औरंगजेब.
रंज के साथ जहांआरा ने लिखा, “यूं भी कोई अपने सगे भाई को मारता है! किसी दुश्मन को मारता तो बात अलग थी. इतनी बेदर्दी से भाई को मारा और फिर कटा हुआ सिर सोने की तश्तरी में पिता को तड़पाने के लिए भेज दिया. एक तरफ इतनी ज़लील हरकत और फिर इसे जायज ठहराने के लिए बाप को अपने भाइयों के साथ किए सलूक याद दिला शर्मिंदा करना क्या मुनासिब था?”
वो खौफ़नाक मंजर!
दारा का कटा सिर तश्तरी में देख सिर्फ शाहजहां सदमे में नहीं था. आगरे के किले में मौजूद हर शख़्स की आंखों में आंसू थे. किसी के मुख से बोल नहीं फूट रहे थे. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। उस मंजर को जहांआरा ने बयान किया, “किले में सब इकट्ठे थे. मगर इतनी बेचैन खामोशी. सब हदसे हुए थे. न बादशाह कुछ कह पा रहे थे. न हम उन्हें ढाढ़स बंधा पा रहे थे. हमें याद है. पूरा हरम शोक में डूबा रहा और रोने की आवाजें गूंजती रहीं. हमें याद है कि उस रोज किसी ने खाना ही नहीं, कुछ भी नहीं खाया.
दारा शिकोह.
भाई दारा के कटे सिर के साथ औरंगज़ेब ने जो खत भेजा, उसमें लिखा था कि याद होगा कि कैसे आपने बड़े भाई खुसरो और परवेज़ को रास्ते से हटाया था? कैसे छोटेछोटे बेकसूर शहजादों और दावर बख़्श और शहरयार को कत्ल कराया था! हमने तो सबूत के तौर पर भाईजान जियू का कटा सिर इसलिये भेजा ताकि आपको भरोसा हो सके कि तख़्त के लिए आपने अपनी करनी से जो सिखाया, उसे हमने कितने अच्छे तरीके से सीखा और कामयाब हुए. “
मुगल बादशाह शाहजहां.
पतन के रास्ते मुग़ल सल्तनत
विचलित जहांआरा को ऐसी हरकतों के चलते मुगल सल्तनत का भविष्य अंधकारमय दिख रहा था. वह मुगल शहजादी थी. जाहिर है कि अपने खानदान की कमियों के बारे में लिखना उसके लिए बहुत आसान नहीं था. लेकिन तख़्त के लिए जहांगीर की पिता अकबर, शाहजहां की जहांगीर और अब औरंगज़ेब की शाहजहां के खिलाफ बगावत और बेदर्दी से भाइयों के खून बहाये जाने के तीन पीढ़ियों के इतिहास को याद कर वह लिखने को मजबूर हुई, ” हिंदुओं का जो प्रारब्ध का सिद्धांत है वह यही है क्या ? जो आज शाहजहां को भोगना पड़ रहा है , क्या कल वही औरंगज़ेब को भोगना होगा? सब अपना भविष्य बो रहे हैं. “
जहांआरा.
हेरंब चतुर्वेदी ने अपनी किताब ” जहांआरा एक ख़्वाब, एक हकीकत ” में जहांआरा के हवाले से लिखा, “मुग़ल शहज़ादो के अंदर जो ये दस फ़ीसदी जानवर बसता है न, यह एक दिन मुग़ल हुकूमत के लिए क़यामत का सबब बनेगा. हमको मुग़ल हुकूमत का हश्र समझ में आ रहा है. महाभारत के युद्ध के पहले कृष्ण के मुंह से गीता के प्रवचन कहलवा सबको असलियत का अहसास कराया गया था. वाह रे मुल्क इतने ज्ञान या इल्म की बात जानते हो. फिर भी उसे भुला दिया जाए तो दंड तो भुगतना होगा.”
तख़्त पर कब्जा: पर हर ओर से धिक्कार
बाप को कैद और भाइयों को रास्ते से हटाकर तख़्त पर औरंगज़ेब काबिज था. उसके लिए कोई चुनौती नहीं थी. लेकिन बाप के तख्तापलट और उसे कैद करने के चलते इस्लामी दुनिया उसे धिक्कार रही थी. काज़ीएममालिक ने शाहजहां के रहते उसकी ताजपोशी को शह देने से इनकार कर दिया. नतीजे में औरंगज़ेब ने उसे बर्खास्त कर अब्दुल वाहब को इस पद पर बिठा दिया.
मक्का के शरीफ़ ने बाप के साथ बदसलूकी की वजह से औरंगज़ेब को असली बादशाह मानने से इनकार कर दिया और कई सालों तक उसके भेजे तोहफ़े ठुकराए जाते रहे. सफ़वी बादशाह शाह सुलेमान ने एक तीखे ख़त में उसे लिखा,” ग़लती से तुमने अपना लक़ब आलमगीर रख लिया. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। तुम दुनिया को काबू करने वाली आलमगीरी नहीं बल्कि महज बाप को काबू करने वाली पिदारगीरी जानते हो.” जवाब में औरंगज़ेब अपनी रहमदिली के सबूत के तौर पर ढेरों महसूल खत्म किए जाने के फैसले का जिक्र करता था. सफ़वी बादशाह को उसने यह भी लिखा कि शाहजहां ने खुद ही उसे हुकूमत सौंपी. औरंगज़ेब ने कभी नहीं कुबूला कि उसने बाप के साथ कुछ गलत हरकत या सुलूक किया.



