जापान ने दूसरी राजधानी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. इसके लिए संसद ने एक कानूनी ढांचा मंजूर किया है. इसका मतलब यह नहीं कि टोक्यो की राजधानी का दर्जा खत्म होगा. टोक्यो आगे भी जापान की मुख्य राजधानी रहेगा. लेकिन किसी बड़े संकट में दूसरा शहर देश की सरकार और प्रशासन को संभाल सकेगा. यह फैसला केवल इमारतें या शहर बदलने का नहीं है. यह आपदा प्रबंधन, अर्थव्यवस्था, जनसंख्या और राजनीतिक संतुलन से जुड़ा मुद्दा है.

आइए, जापान में शुरू इस नई पहल के बहाने समझते हैं कि कैसे कोई शहर राजधानी बनता है? जापान को क्यों चाहिए दूसरी राजधानी? कौनकौन से शहर इस दौड़ में शामिल हैं?
राजधानी आखिर होती क्या है?
राजधानी वह शहर होता है जहां देश की मुख्य राजनीतिक व्यवस्था काम करती है. आम तौर पर वहीं संसद होती है. वहीं प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का कार्यालय होता है. बड़े मंत्रालय और केंद्रीय प्रशासन भी राजधानी में होते हैं. राजधानी केवल सरकार का पता नहीं होती. वह देश की शक्ति, पहचान और निर्णय लेने का केंद्र भी होती है. हालांकि, हर देश में राजधानी का मॉडल एक जैसा नहीं है. कुछ देशों में एक ही शहर सभी काम संभालता है. कुछ जगह प्रशासनिक और आर्थिक केंद्र अलग होते हैं. दक्षिण अफ्रीका इसका उदाहरण है. वहां अलगअलग शहरों में विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक भूमिकाएं बंटी हुई हैं. इसलिए राजधानी बनना केवल इतिहास या परंपरा का मामला नहीं है. यह प्रशासनिक जरूरत और राष्ट्रीय रणनीति से भी तय होता है.
किसी शहर को राजधानी चुनने के पीछे कई कारण होते हैं. पहला कारण होता है राजनीतिक महत्व. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। वह शहर शासक वर्ग, संसद या ऐतिहासिक सत्ता के केंद्र के करीब हो सकता है. दूसरा है भौगोलिक स्थिति. शहर देश के बीच में हो, पहुंच आसान हो और सुरक्षा बेहतर हो, तो उसकी दावेदारी मजबूत बनती है. एक और मजबूत कारण है बुनियादी ढांचा.
राजधानी के लिए अच्छे सड़क नेटवर्क, रेल, हवाई अड्डे, संचार व्यवस्था, अस्पताल, कार्यालय और आवास चाहिए. सरकार के हजारों कर्मचारियों को काम करना होता है. राजधानी को बड़े स्तर के वित्तीय और कारोबारी ढांचे का साथ चाहिए. बैंक, कंपनियां, डेटा नेटवर्क और संचार व्यवस्था भी अहम होती है. युद्ध, भूकंप, बाढ़, समुद्री तूफान या किसी बड़े संकट के समय भी सरकार चलती रहनी चाहिए, इसलिए आधुनिक दौर में आपदा जोखिम एक बड़ा पैमाना बन गया है.
रेस में कौनकौन से चार शहर या क्षेत्र हैं?
दूसरी राजधानी की दौड़ में चार प्रमुख दावेदार शहर सामने हैं. इनमें ओसाका, फुकुओका, आइचीनागोया और साप्पोरो शामिल हैं.
ओसाका: टोक्यो बाद दूसरा बड़ा आर्थिक केंद्र
यह सबसे आगे माना जा रहा है. यह टोक्यो के बाद जापान का दूसरा सबसे बड़ा महानगरीय क्षेत्र है. यह एक बड़ा आर्थिक केंद्र भी है. ओसाका के पास मजबूत परिवहन नेटवर्क है. यहां बड़े उद्योग, कंपनियां, विश्वविद्यालय और सरकारी कार्यालय हैं. शहर का प्रशासनिक और आर्थिक आकार उसे स्वाभाविक दावेदार बनाता है. ओसाका के सामने एक बड़ी चुनौती भी है. एक सरकारी भूकंपीय आकलन के अनुसार, बड़े भूकंप की स्थिति में ओसाका की करीब एकतिहाई जमीन बाढ़ की चपेट में आ सकती है.
ओसाका.
फुकुओका: टोक्यो के साथ आपदा का खतरा कम
यह शहर जापान के दक्षिणपश्चिम हिस्से में स्थित है. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। यह एशिया के अन्य हिस्सों के साथ व्यापार और संपर्क के लिहाज से भी महत्वपूर्ण शहर है. फुकुओका के गवर्नर ने पूरे प्रांत के स्तर पर दावेदारी की बात कही है. वहां स्थानीय निकायों और कारोबारी समुदाय को साथ लेकर तैयारी की जा रही है. फुकुओका का लाभ यह है कि वह टोक्यो से दूर है. इसलिए एक ही आपदा के दोनों शहरों को एक साथ प्रभावित करने की आशंका कम हो सकती है. लेकिन उसे यह साबित करना होगा कि उसके पास केंद्रीय प्रशासन चलाने के लिए पर्याप्त बड़ा सरकारी ढांचा है.
फुकुओका.
आइची और नागोया: जापान के बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में गिनती
आइची प्रांत और उसका प्रमुख शहर नागोया भी दौड़ में हैं. यह जापान के बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में गिना जाता है. यहां विनिर्माण, ऑटोमोबाइल और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी गतिविधियां मजबूत हैं. आइची के गवर्नर ने दावा किया है कि नागोया और आसपास का क्षेत्र दूसरी राजधानी के लिए जरूरी सभी सुविधाएं रखता है. नागोया की स्थिति जापान के मुख्य द्वीप पर अपेक्षाकृत केंद्रीय मानी जाती है. इससे देश के अलगअलग हिस्सों तक पहुंच आसान हो सकती है. इसकी आर्थिक ताकत भी बड़ी है. फिर भी, चयन में केवल उद्योग नहीं, बल्कि आपदा जोखिम और सरकारी संचालन की क्षमता भी अहम होगी.
साप्पोरो उत्तरी द्वीप होक्काइडो में है.
साप्पोरो: टोक्यो से दूरी बड़ा पक्ष
यह जापान के उत्तरी द्वीप होक्काइडो में है. यह दावेदारों में भौगोलिक रूप से सबसे अलग विकल्प है. साप्पोरो के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क दूरी है. टोक्यो में भूकंप या सुनामी जैसी आपदा आए, तो होक्काइडो पर उसका असर एक जैसा होने की संभावना कम हो सकती है. होक्काइडो क्षेत्र में पहले से केंद्रीय सरकार के कई शाखा कार्यालय मौजूद हैं. वहां के अधिकारियों का तर्क है कि सरकारी तंत्र की कुछ समझ और व्यवस्था पहले से है. लेकिन साप्पोरो की चुनौती भी साफ है. वह देश के मुख्य राजनीतिक और कारोबारी केंद्रों से दूर है. सर्द मौसम और दूरी आपातकालीन संचालन को कठिन बना सकते हैं.
क्या टोक्यो की ताकत कम होगी?
तुरंत ऐसा होने की संभावना कम है. टोक्यो जापान का मुख्य राजनीतिक और आर्थिक केंद्र बना रहेगा. लेकिन लंबे समय में निवेश का एक हिस्सा दूसरे शहरों की ओर जा सकता है. नए सरकारी कार्यालय, तकनीकी केंद्र, परिवहन परियोजनाएं और कंपनियां दूसरे क्षेत्रों में बढ़ सकती हैं. इससे जापान की अर्थव्यवस्था अधिक संतुलित हो सकती है.
इस तरह कहा जा सकता है कि जापान की दूसरी राजधानी की योजना भविष्य की तैयारी है. इसका मुख्य लक्ष्य टोक्यो को हटाना नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी बड़ी आपदा के बाद देश की सरकार काम करती रहे. ओसाका, फुकुओका, नागोया और साप्पोरो सभी के पास अपनीअपनी ताकत है. अंतिम फैसला आपदा सुरक्षा, प्रशासनिक क्षमता, आर्थिक आकार और राजनीतिक सहमति पर निर्भर करेगा.
जापान की राजधानी टोक्यो.
जापान में टोक्यो इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
टोक्यो जापान का राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक केंद्र है. संसद, प्रधानमंत्री कार्यालय, मंत्रालय और बड़े वित्तीय संस्थान यहीं हैं. दुनिया की बड़ी कंपनियों, बैंकों और मीडिया संस्थानों की मौजूदगी भी टोक्यो को बहुत शक्तिशाली बनाती है, लेकिन यही ताकत एक जोखिम भी है. जब बहुत अधिक सरकारी और आर्थिक गतिविधियां एक ही शहर में सिमट जाती हैं, तो किसी आपदा का असर पूरे देश पर पड़ सकता है.
टोक्यो जापान के आर्थिक उत्पादन का करीब पांचवां हिस्सा पैदा करता है. देश की लगभग 30 प्रतिशत आबादी राजधानी क्षेत्र में रहती है. यदि टोक्यो लंबे समय तक काम न कर पाए, तो सरकार, कारोबार, परिवहन, बैंकिंग और संचार पर गंभीर असर पड़ सकता है.
जापान में हाल में आए भूकंप ने मचाई तबाही.
जापान को दूसरी राजधानी की जरूरत क्यों पड़ी?
जापान भूकंप के लिए जाना जाता है. यह देश कई टेक्टोनिक प्लेटों के आसपास स्थित है. इसलिए यहां भूकंप और सुनामी का खतरा बना रहता है. जापानी सरकार की चिंता यह है कि टोक्यो महानगरीय क्षेत्र में आने वाला बड़ा भूकंप देश के प्रशासन को रोक सकता है.
एक आकलन के अनुसार, अगले 30 वर्षों में टोक्यो क्षेत्र में 7 तीव्रता के भूकंप की संभावना करीब 70 प्रतिशत मानी गई है. अगर ऐसा होता है, तो प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद, मंत्रालय और वित्तीय संस्थान प्रभावित हो सकते हैं. बिजली, इंटरनेट, सड़कें और संचार सेवाएं भी बाधित हो सकती हैं. इसीलिए जापान एक ऐसे शहर या क्षेत्र की तलाश में है जो आपात स्थिति में बैकअप के तौर पर काम करे. वहां से सरकार के जरूरी फैसले लिए जा सकें. कुछ मंत्रालय काम कर सकें. राष्ट्रीय प्रशासन की निरंतरता बनी रहे.
नई व्यवस्था में क्या होगा?
जापान ने जो कानून पारित किया है, वह सीधे किसी एक शहर को दूसरी राजधानी घोषित नहीं करता. यह केवल चयन की प्रक्रिया और ढांचा तय करता है. राज्य या प्रांत अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं. उन्हें दिखाना होगा कि उनका क्षेत्र आपदाओं के लिहाज से अपेक्षाकृत सुरक्षित है. वहां पर्याप्त सरकारी ढांचा है. आर्थिक क्षमता है. जनसंख्या और प्रशासनिक संसाधन भी पर्याप्त हैं.
चुने गए क्षेत्र को संकट के समय राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनने में सक्षम होना चाहिए. इसका अर्थ यह नहीं कि टोक्यो से सभी मंत्रालय या संसद तुरंत हट जाएंगे. शुरुआत में कुछ कार्यालय, डेटा सिस्टम, आपदानियंत्रण केंद्र और प्रशासनिक सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं.



