बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री इन दिनों एक बार फिर चर्चा में हैं. वे भारत में निर्वासित जीवन जी रही हैं. बांग्लादेश सरकार ने भारत से औपचरिक अनुरोध कर हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की है. इस बीच हसीना ने दिसंबर तक स्वदेश वापसी की घोषणा की है. उन्होंने कहा है कि लौटते ही उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है. उनकी जान को खतरा भी है. फिर भी वे पांच अगस्त को वर्चुअल माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मीडिया से बातचीत भी करेंगी. सरकार से हटने के बाद वे पहली दफा सामने आने वाली हैं. उनका यह कदम किस करवट बैठेगा, यह समय बताएगा लेकिन दुनिया में कई नेता ऐसे रहे हैं, जो निर्वासित जीवन जीने के बाद सत्ता में लौटे हैं.

आइए, इसी बहाने जानते हैं कि निर्वासन में गए नेता कैसे सत्ता में लौटते हैं? दुनिया भर में कई उदाहरणों के जरिए इसे समझा जा सकता है. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। जानें इससे जुड़ी पांच कहानियां.

बेनजीर भुट्टो: लंदन और दुबई से पाकिस्तान वापसी

बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी थीं. 1977 में जनरल जियाउलहक ने उनके पिता की सरकार गिरा दी. साल 1979 में जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दे दी गई. इसके बाद बेनजीर को कई बार गिरफ्तार किया गया. लगभग तीन साल जेल में रहने के बाद उन्हें 1984 में पाकिस्तान से बाहर जाने की अनुमति मिली. वह लंदन चली गईं. वहां उन्होंने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी यानी पीपीपी का काम संभाला. उनका पहला निर्वासन लगभग दो वर्ष चला.

बेनजीर भुट्टो के साथ भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी. फोटो: पीटीआई

1986 में वह पाकिस्तान लौटीं. उस समय जिया शासन के खिलाफ जनता में असंतोष बढ़ रहा था. बेनजीर ने बड़ी रैलियां कीं. उन्होंने लोकतंत्र की बहाली का नारा दिया. 1988 में जियाउलहक की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई. इसके बाद आम चुनाव हुए. पीपीपी सबसे बड़ी पार्टियों में शामिल हुई. बेनजीर प्रधानमंत्री बनीं. वह किसी मुस्लिम देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं. उनकी सरकार 1990 में बर्खास्त कर दी गई. 1993 में वह फिर प्रधानमंत्री बनीं. 1996 में दूसरी सरकार भी बर्खास्त कर दी गई. इसके बाद उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे.

साल 1999 में वह फिर पाकिस्तान से बाहर चली गईं. दूसरा निर्वासन करीब आठ साल चला. इस दौरान उन्होंने लंदन और दुबई में रहकर पार्टी चलाई. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। वह फोन, ईमेल और राजनीतिक संपर्कों के जरिए पार्टी नेताओं से जुड़ी रहीं. साल 2007 में वह पाकिस्तान लौटीं. उनके लौटने पर कराची में विशाल स्वागत हुआ. उसी दिन उनकी रैली पर हमला हुआ. वह बच गईं. बेनजीर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थीं. 27 दिसंबर 2007 को रावलपिंडी में एक चुनावी रैली के बाद उनकी हत्या कर दी गई. इसलिए वह तीसरी बार प्रधानमंत्री नहीं बन सकीं. फिर भी उनकी पार्टी ने उनके नाम और विरासत के आधार पर चुनाव में सफलता पाई.

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ नवाज शरीफ. फोटो: पीटीआई

नवाज शरीफ: सऊदी अरब से चुनावी वापसी

नवाज शरीफ पाकिस्तान के तीन बार प्रधानमंत्री रहे हैं. 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने सैन्य तख्तापलट किया. नवाज शरीफ की सरकार गिरा दी गई. उन्हें गिरफ्तार किया गया. अदालत ने उन्हें लंबी जेल की सजा सुनाई. दिसंबर 2000 में एक समझौते के बाद वह सऊदी अरब चले गए. उनका निर्वासन करीब सात साल चला. उन्होंने जेद्दा और लंदन से राजनीतिक गतिविधियां जारी रखीं. उनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीगनवाज यानी पीएमएलएन देश में सक्रिय रही.

नवाज शरीफ ने विदेश में रहते हुए अपनी राजनीतिक पहचान बचाए रखी. पार्टी कार्यकर्ताओं से संपर्क बना रहा. उन्होंने अपने परिवार और पार्टी के जरिए पाकिस्तान की राजनीति में प्रभाव बनाए रखा. 2007 में वह पाकिस्तान लौटे. 2008 के चुनाव में उनकी पार्टी दूसरे स्थान पर रही. वह तुरंत प्रधानमंत्री नहीं बन सके. उन्होंने विपक्ष की राजनीति की. 2013 के चुनाव में पीएमएलएन को बड़ी सफलता मिली. नवाज शरीफ तीसरी बार प्रधानमंत्री बने. इस तरह निर्वासन के करीब सात साल बाद वह फिर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे.

अयातुल्लाह खोमैनी. फोटो: पीटीआई

अयातुल्लाह खोमैनी: निर्वासन से ईरानी क्रांति तक

रूहोल्लाह खोमैनी का पूरा नाम रूहोल्लाह मुसावी खोमैनी था. बाद में वे अयातुल्लाह खोमैनी के नाम से मशहूर हुए. वे ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बड़े आलोचक थे. 1964 में उन्हें ईरान से निर्वासित कर दिया गया. वह पहले तुर्की गए. वहां लगभग एक वर्ष रहे. 1965 में वह इराक के नजफ शहर चले गए. नजफ में उन्होंने धार्मिक शिक्षा दी. उन्होंने इस्लामी शासन से जुड़े अपने विचार विकसित किए. उनके भाषण और संदेश ईरान पहुंचते रहे.

उनके समर्थक कैसेट टेप और दूसरे माध्यमों से उनके संदेश जनता तक पहुंचाते थे. 1978 में इराक ने उन पर दबाव डाला. इसके बाद वह फ्रांस चले गए. वह पेरिस के पास नॉफ्ललेशातो में रहे. फ्रांस में उन्हें अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक बेहतर पहुंच मिली. उनके भाषण दुनिया भर में प्रसारित हुए. कुल मिलाकर खोमैनी लगभग 14 से 15 वर्ष निर्वासन में रहे. वह तुर्की, इराक और फ्रांस में रहे. उनके समर्थक सत्ता के खिलाफ आंदोलन करते रहे.

जनवरी 1979 में मजबूरन ईरान के शासक शाह देश छोड़कर चले गए. 1 फरवरी 1979 को खोमैनी ईरान लौटे. लाखों लोगों ने उनका स्वागत किया. उन्होंने अंतरिम सरकार बनाई. सेना के एक हिस्से ने क्रांतिकारियों का साथ दिया. 11 फरवरी 1979 को शाह का शासन समाप्त हो गया. बाद में जनमतसंग्रह हुआ. ईरान इस्लामी गणराज्य बना. खोमैनी देश के सर्वोच्च राजनीतिक और धार्मिक नेता बन गए.

नेपोलियन बोनापार्ट.

नेपोलियन बोनापार्ट: एल्बा से फ्रांस की सत्ता तक

नेपोलियन बोनापार्ट फ्रांस का सम्राट था. 1814 में यूरोपीय देशों की संयुक्त सेनाओं ने उन्हें हरा दिया. उन्हें पद छोड़ना पड़ा. उसे भूमध्य सागर के एल्बा द्वीप पर निर्वासित कर दिया गया. नेपोलियन वहां करीब दस महीने रहे. नेपोलियन को लगा कि फ्रांस में नई सरकार लोकप्रिय नहीं है. फ्रांसीसी सैनिकों और जनता का एक हिस्सा अब भी उनके समर्थक थे. मार्च 1815 में वह एल्बा से भाग निकले. वह फ्रांस के दक्षिणी तट पर उतरे. सरकार ने उन्हें रोकने के लिए सैनिक भेजे. लेकिन कई सैनिक नेपोलियन के साथ हो गए.

वह पेरिस पहुंचं. राजा लुई अठारहवें को देश छोड़ना पड़ा. नेपोलियन ने फिर सत्ता संभाल ली. यह दौर लगभग सौ दिन चला. यूरोपीय शक्तियों ने उसके खिलाफ फिर सेना बनाई. जून 1815 में वाटरलू की लड़ाई में नेपोलियन हार गए. इसके बाद उसे फिर निर्वासित किया गया. इस बार उसे अटलांटिक महासागर के सेंट हेलेना द्वीप भेजा गया. साल 1821 में वहीं उसकी मौत हो गई.

बोंगबोंग मार्कोस.

बोंगबोंग मारकोस: हवाई निर्वासन से राष्ट्रपति भवन तक

फर्डिनेंड रोमुअल्डेज़ मार्कोस जूनियर , फिलीपींस के पूर्व तानाशाह फर्डिनेंड मारकोस के बेटे हैं. साल 1986 में जनआंदोलन के बाद उनके पिता की सरकार गिर गई. मारकोस परिवार देश छोड़कर हवाई चला गया. बोंगबोंग मारकोस करीब पांच वर्ष तक हवाई में रहे. साल 1991 में वह फिलीपींस लौटे. यह वापसी सीधे राष्ट्रपति पद तक नहीं पहुंची. उन्होंने धीरेधीरे स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाई. वह पहले अपने गृह प्रांत इलोकोस नॉर्टे के गवर्नर बने. बाद में सांसद बने. फिर सीनेटर के रूप में काम किया.

2016 में उन्होंने उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ा. वह चुनाव बहुत कम अंतर से हार गए. इसके बावजूद उनका राजनीतिक आधार मजबूत रहा. उनके परिवार ने सोशल मीडिया, पारिवारिक नेटवर्क और पुराने समर्थकों के जरिए अपनी छवि दोबारा बनाई. साल 2022 में बोंगबोंग मारकोस राष्ट्रपति चुनाव जीत गए. इस तरह करीब तीन दशक बाद मारकोस परिवार फिर राष्ट्रपति भवन तक पहुंचा. उनकी कहानी व्यक्तिगत निर्वासन से ज्यादा परिवार की राजनीतिक वापसी की कहानी है. वह निर्वासन के बाद धीरेधीरे चुनावी राजनीति में लौटे. सत्ता तक पहुंचने में उन्हें स्थानीय राजनीति, पारिवारिक नाम और आधुनिक प्रचार माध्यमों का सहारा मिला.

इन पांच कहानियों में वापसी के अलगअलग रास्ते दिखाई देते हैं. बेनजीर और नवाज ने पार्टी संगठन पर भरोसा किया. खोमैनी ने धार्मिक आंदोलन को क्रांति में बदला. नेपोलियन ने सेना और लोकप्रिय स्मृति का सहारा लिया. बोंगबोंग मारकोस ने पारिवारिक राजनीति और चुनावी अभियान का इस्तेमाल किया. एक बात सभी में समान थी. निर्वासन के दौरान उन्होंने राजनीति से दूरी नहीं बनाई. उन्होंने समर्थकों से संपर्क रखा. उन्होंने अपनी छवि बचाई. उन्होंने सही समय का इंतजार किया.

सत्ता में वापसी के लिए केवल स्वदेश लौटना पर्याप्त नहीं होता. संगठन, जनसमर्थन, राजनीतिक अवसर और प्रभावी संदेश भी जरूरी होते हैं. शेख हसीना की कहानी कहां और कैसे खत्म होगी, यह आने वाले दिनों में पता चलेगा. क्योंकि बांग्लादेश में उनकी खालिदा जिया के बेटे अब प्रधानमंत्री हैं. जिया और हसीना की राजनीतिक रंजिश किसी से छिपी नहीं हैं.