कावड़ मेले के दौरान उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद में जहां अनोखी और आकर्षक कांवड़ें लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं तो वहीं नगर के शिव चौक पर एक ऐसा शिवभक्त भी पहुंचा था जिसकी हिम्मत और आस्था ने हजारों लोगों को भावुक और प्रेरित कर दिया. दिल्ली के शाहदरा निवासी मुकेश ठाकुर जिनका एक पैर कृत्रिम है हरिद्वार की हरकी पौड़ी से पवित्र गंगाजल लेकर वह दिल्ली तक पैदल कांवड़ यात्रा कर रहे हैं.

कभी पेशे से ड्राइवर रहे मुकेश ठाकुर वर्ष 2014 में हुए एक सड़क हादसे में अपना दाहिना पैर खो बैठे थे. हादसे के बाद उन्हें कृत्रिम पैर लगवाना पड़ा था, लेकिन उन्होंने जिंदगी से हार नहीं मानी. अब वही मुकेश बाबा भोलेनाथ के प्रति अटूट आस्था के साथ कृत्रिम पैर के सहारे सैकड़ों किलोमीटर की कठिन पदयात्रा कर रहे हैं.
जबलपुर क्रूज हादसा का पोस्टर
शिव चौक पर पहुंचे मुकेश ठाकुर की पीठ पर एक विशेष संदेश वाला बोर्ड भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ था. इस संदेश के माध्यम से उन्होंने अपनी कांवड़ यात्रा उस मां के त्याग और ममता को समर्पित की है, जिसने जबलपुर क्रूज हादसे के दौरान अपने बच्चे को आखिरी सांस तक अपने सीने से लगाए रखा था. मुकेश का कहना है कि एक मां का प्रेम और बलिदान पूरी मानवता के लिए प्रेरणा है इसलिए उन्होंने अपनी इस यात्रा को मातृत्व के उस अद्भुत रूप को नमन करते हुए समर्पित किया है.
मुकेश बताते हैं कि कृत्रिम पैर के साथ लंबी दूरी पैदल तय करना बेहद कठिन है. हर कदम पर दर्द होता है, लेकिन बाबा भोलेनाथ की कृपा और आस्था उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती है. उन्होंने कहा कि चाहे कितनी भी तकलीफ आए, वह अपनी कांवड़ यात्रा अधूरी नहीं छोड़ेंगे और दिल्ली पहुंचकर पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे. पिछले वर्ष भी उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए इसी तरह कांवड़ यात्रा की थी. इस बार उनकी ये यात्रा केवल भक्ति नहीं, बल्कि समाज को संघर्ष, मातृत्व और कभी हार न मानने का संदेश देने का माध्यम भी बन गई है.
शिवभक्त मुकेश ठाकुर की जुबानी
शिवभक्त मुकेश ठाकुर ने कहा कि मैंने हरिद्वार से जल भरा है और शाहदरा दिल्ली निवासी हूं. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। मैं पिछले साल भी कावड़ लाया था. वह कांवड़ पहलगाम के शहीदों के लिए लाया था. इस बार जो आप मेरे पीछे यह पोस्ट देख रहे हैं एक मां का अपने बच्चे को बचातेबचाते और संघर्ष करतेकरते अपनी भी जान न्योछावर कर दी. उस मां के लिए यह समर्पित है. आपने देखा होगा यह बहुत तगड़ा हादसा हो गया था. बड़ी बात यह है कि यह मां चाहती तो अपनी जान बचा सकती थी, लेकिन उन्होंने पूरा संघर्ष किया. अपनी छाती से लगाकर अपने बच्चे को रखा और मरते दम तक अपनी छाती से जुदा नहीं होने दिया.
उन्होंने कहा कि मेरा 2014 में एक्सीडेंट हो गया था. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। मैं ड्राइविंग करता था. मुझे जहां जगह मिल जाती थी वहां बैठ जाता था. मगर मुझे नहीं पता था कि उस दिन मेरा समय खराब है. ऑटो वाले की लापरवाही से ऑटो पलट गया था. अब समस्या यह होती है कि पैरों में दर्द हो रहा है. चुभन हो रही है. कुदरत की देन कुदरत की ही होती है.



