ज्यादातर नए मातापिता के लिए पेरेंटल लीव अपने परिवार और बच्चे के साथ समय बिताने का मौका होती है. लेकिन एक कर्मचारी के लिए यही छुट्टी एक लंबी कानूनी लड़ाई की वजह बन गई. आखिरकार कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला सुनाते हुए कंपनी को करीब 18.5 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है.

यह मामला दुनिया की बड़ी निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स से जुड़ा है. लंदन की एम्प्लॉयमेंट ट्रिब्यूनल ने फैसला सुनाया कि कंपनी ने अपने पूर्व कर्मचारी जोनाथन रीव्स को गलत तरीके से नौकरी से निकाला और उनके साथ लिंग के आधार पर भेदभाव भी किया. यह सब उस समय हुआ, जब वह पैटरनिटी लीव पर था.

15 साल तक किया शानदार काम

रिपोर्ट के मुताबिक, जोनाथन रीव्स ने गोल्डमैन सैक्स के लंदन स्थित कंप्लायंस विभाग में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और डिप्टी हेड ऑफ कंट्रोल रूम के पद पर काम कर रहे थे. उन्होंने बैंक में करीब 15 साल तक सेवाएं दीं. साल 2011 से 2019 के बीच उन्हें लगातार कंपनी के सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों में गिना गया.

नौकरी से क्यों निकाला गया?

इस विवाद की शुरुआत कोरोना महामारी के दौरान हुई. साल 2019 में अपने पहले बच्चे के जन्म के बाद रीव्स ने अपने मैनेजर से कहा कि कोरोना के दौरान वर्क फ्रॉम होम करते हुए नौकरी और छोटे बच्चे की देखभाल दोनों संभालना उनके लिए काफी मुश्किल हो रहा है. रीव्स का कहना था कि जब उन्होंने अपनी परेशानी बताई, तो उनके मैनेजर ने बारबार गुस्से में कहा, “खुद ही इसका कोई तरीका निकालो.” हालांकि मैनेजर ने कोर्ट में इस बात से इनकार किया कि उन्होंने ऊंची आवाज में बात की थी.

कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि रीव्स के मैनेजर ने कोरोना लॉकडाउन के समय छोटे बच्चों की देखभाल कर रहे मातापिता की मुश्किलों को गंभीरता से नहीं समझा. कोर्ट ने यह भी माना कि रीव्स के साथ उचित व्यवहार नहीं किया गया और उन्हें गलत तरीके से नौकरी से हटाया गया. साथ ही उनके साथ लिंग के आधार पर भेदभाव भी हुआ. इसी वजह से अदालत ने गोल्डमैन सैक्स को आदेश दिया कि वह अपने पूर्व कर्मचारी को 1.45 मिलियन पाउंड यानी करीब 18.5 करोड़ रुपये का मुआवजा दे.