Bareilly Girls’ Education Crisis: उत्तर प्रदेश की राजधानी से ढाई सौ किलोमीटर दूर बसा शहर बरेली के बाकरगंज, सराय खाम, हाजियापुर, शाहदाना, श्यामगंज और आसपास के इलाकों में बेटियों की पढ़ाई की तस्वीर आज भी चिंता बढ़ाने वाली है. सरकार की ओर से बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ और स्कूल चलो जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन इन इलाकों की कई बेटियां आर्थिक तंगी, परिवार की मजबूरी और जागरूकता की कमी के कारण पांचवीं या दसवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं.

कुछ बच्चियां तो प्राथमिक कक्षा तक भी नहीं पहुंच पातीं. स्कूल जाने की उम्र में कई बेटियां परिवार की आर्थिक मदद के लिए पतंग बनाने, जरीजरदोजी, कारचोबी, सिलाई और कढ़ाई का काम कर रही हैं. परिवारों का कहना है कि जब घर में दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो तो बच्चों की पढ़ाई पीछे छूट जाती है.

दो वक्त की रोटी और पढ़ाई में करना पड़ा चुनाव

आजमनगर की रिहाना बताती हैं कि उनके पति रिक्शा चलाकर परिवार का खर्च उठाते हैं. उनके पांच बच्चों में तीन बेटियां हैं. आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण कोई भी बेटी तीसरी कक्षा से आगे नहीं पढ़ सकी. बेटियां घर पर पतंग बनाकर कुछ रुपये कमा लेती हैं, जिससे परिवार के खर्च में मदद मिलती है. इसी इलाके की जैबुननिशा के पति का निधन हो चुका है. पांच बेटियों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है. वह दूसरों के घरों में काम करके परिवार चलाती हैं, जबकि बेटियां हथकरघा और कारचोबी का काम करती हैं.

मैनाज के परिवार की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. उनके पति लकवाग्रस्त हैं और परिवार की मदद के लिए बेटियां कारचोबी का काम करती हैं. श्यामगंज की आमना बताती हैं कि पति की मौत के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गई. उनकी तीनों बेटियां पतंग बनाने का काम करती हैं. उनका कहना है कि एक हजार पतंग बनाने पर करीब सौ रुपये मिलते हैं. ऐसे में परिवार के सामने पढ़ाई से ज्यादा पेट भरने की चिंता रहती है.

कई छात्राएं एडमीशन के बाद छोड़ देती हैं स्कूल

इलाके के कई सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या भी अपेक्षित तरीके से नहीं बढ़ रही है. प्राथमिक विद्यालय काजी टोला में इस साल 57 बच्चे पंजीकृत हैं, जिनमें करीब 20 छात्राएं हैं. प्राथमिक विद्यालय बांस मंडी में 35 बच्चे दर्ज हैं, जबकि ख्वाजा कुतुब स्कूल में सिर्फ दो छात्र हैं. प्राथमिक विद्यालय हाजियापुर में पिछले साल 78 बच्चे थे, लेकिन इस बार संख्या घटकर 58 रह गई है. प्रधानाध्यापक के मुताबिक, कई छात्राएं दाखिला लेने के बाद भी जरीजरदोजी, सिलाईकढ़ाई और घरेलू जिम्मेदारियों के कारण स्कूल आना छोड़ देती हैं. स्कूलों में शिक्षकों की कमी और एसआईआर, जनगणना जैसे दूसरे सरकारी कामों का असर भी पढ़ाई पर पड़ रहा है.

शाहदाना की फातिमा अपने पोतेपोतियों की देखभाल कर रही हैं. उनके पति का कई साल पहले निधन हो चुका है और बेटा पंजाब में मजदूरी करता है. घर की तीन बेटियां 15 साल तक की हैं, लेकिन स्कूल नहीं जातीं. फातिमा का कहना है कि स्कूल करीब एक किलोमीटर दूर है और बेटियों को ले जाने वाला कोई नहीं है. उनका मानना है कि बेटियां बड़ी होकर शादी कर लेंगी, इसलिए पढ़ाई की जरूरत नहीं समझी जाती.

बेटियां घर संभाल रही हैं

हाजियापुर के मोहम्मद रईस की पत्नी का भी कई साल पहले निधन हो गया था. उनकी पांच बेटियां घर संभाल रही हैं. बड़ी बेटी नाजिश बताती हैं कि मां की मौत के समय वह नौवीं कक्षा में पढ़ रही थीं. इसके बाद पढ़ाई छूट गई. पिता हृदय रोग से पीड़ित हैं और नियमित काम नहीं कर पाते. अब परिवार चलाने के लिए बेटियां जरी का काम करती हैं.

शिक्षा विभाग का कहना है कि स्कूलों से दूर बच्चों को चिह्नित करने के लिए अभियान चलाया जाएगा. डीएलएड प्रशिक्षु घरघर जाकर ऐसे बच्चों की पहचान करेंगे और उनका दाखिला कराया जाएगा. खंड शिक्षा अधिकारी तौसीफ के अनुसार छात्रों को स्कूलों से जोड़ने के लिए हर साल सर्वे कराया जाता है. बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह से बात की तो बताया कि सभी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई है.

जिलाधिकारी ने कहा कि छात्रों को स्कूलों से जोड़ने के लिए संबंधित अधिकारियों से बात की जाएगी. यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी.