बाजार में जब भी हम पनीर, दही या मक्खन खरीदने जाते हैं, तो एक अच्छे ब्रांड की तलाश हमेशा रहती है. एक ग्राहक के तौर पर हम सिर्फ उत्पाद देखते हैं, उसके पीछे का संघर्ष नहीं. लेकिन आज जिस कंपनी का पनीर या दही दक्षिण भारत से लेकर देश के कई हिस्सों में बड़े चाव से खाया जाता है, उसकी शुरुआत बेहद मुश्किल हालात में हुई थी. यह कहानी है ‘मिल्की मिस्ट’ के संस्थापक सतीश कुमार टी की.

एक ऐसा लड़का जिसने 16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी थी. तब उनके पास न तो कोई बड़ी फैक्ट्री थी और न ही कोई इन्वेस्टर. लेकिन आज तीन दशक बाद, वह अपनी कंपनी का 1,553 करोड़ रुपये का आईपीओ लेकर शेयर बाजार में उतरने जा रहे हैं. इस आईपीओ के बाद कंपनी का मूल्यांकन 10,778 करोड़ रुपये के करीब पहुंचने की उम्मीद है. 11 अगस्त 2026 को बाजार में दस्तक देने वाली इस कंपनी की कहानी किसी भी इंसान को प्रेरित करने के लिए काफी है.

डूबते कारोबार के बीच 16 साल की उम्र में उठाया बड़ा कदम

सतीश कुमार के उद्यम की कहानी तमिलनाडु के इरोड शहर से शुरू होती है. साल 1980 के दशक की शुरुआत में उनके पिता और चाचा ने मिलकर एक छोटा पावर लूम का काम शुरू किया था. लेकिन यह काम ज्यादा दिन नहीं चल पाया और कुछ ही सालों में इसे बंद करना पड़ा. इसके बाद परिवार ने दूध के व्यापार में किस्मत आजमाने का फैसला किया. वे लोग स्थानीय किसानों से दूध खरीदते, उसे ठंडा करते और हर दिन करीब 3,000 लीटर दूध कैन में भरकर बेंगलुरु भेजते थे.

इतनी मेहनत के बावजूद इस व्यापार में भी मुनाफा नहीं हो रहा था. पैसों की तंगी और नुकसान के चलते 1990 में सतीश के चाचा ने इस काम से किनारा कर लिया. आखिरकार 1992 में परिवार को दूध का यह कारोबार भी बंद करना पड़ा. परिवार का आर्थिक ढांचा चरमरा रहा था. यही वह समय था जब 16 साल के सतीश कुमार ने एक अहम फैसला लिया. उन्होंने स्कूल वापस जाने के बजाय परिवार के इस डूबते कारोबार को खुद संभालने की ठानी.

जब बैग में 10 किलो पनीर लेकर पहली बार बाजार पहुंचे सतीश

कारोबार संभालने के बाद सतीश ने एक बहुत बारीक बात पर गौर किया. उन्होंने देखा कि बेंगलुरु में उनका एक ग्राहक उनसे कच्चा दूध खरीदता है और फिर उसी दूध से पनीर बनाकर बड़े होटलों में बेच देता है. सतीश को इसमें एक बड़ा मौका नजर आया. दिक्कत बस यह थी कि उनके परिवार में किसी को भी व्यावसायिक स्तर पर पनीर बनाना नहीं आता था. उस दौर में आज की तरह न तो गूगल था और न ही यूट्यूब, जहां से वीडियो देखकर कुछ सीखा जा सके. सतीश ने खुद ही प्रयोग करने शुरू किए. उन्होंने दूध को गर्म करके उसमें सिरका डालकर फाड़ने का तरीका अपनाया.

शुरुआती दिनों में कई बार प्रयोग असफल रहे. पनीर का टेक्सचर और गुणवत्ता वैसी नहीं आती थी जैसी उन्हें चाहिए थी. दूध काफी बर्बाद भी हुआ, लेकिन सतीश ने हिम्मत नहीं हारी और प्रक्रिया को सुधारते रहे. आखिरकार 1993 में उनकी मेहनत रंग लाई. वह अपनी पहली 10 किलो पनीर की खेप एक बैग में रखकर बेंगलुरु ले गए. शुरुआत में इसे डीलरों के जरिए होटलों और रेस्तरां में थोक में बेचा गया. यह छोटा सा प्रयोग धीरेधीरे एक कारोबार में बदलने लगा और 1995 आतेआते वे हर दिन 50 से 100 किलो पनीर बेचने लगे.

कच्चा दूध बेचना बंद किया और यहीं से पड़ी ‘मिल्की मिस्ट’ की नींव

कारोबार के बढ़ने पर परिवार ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला लिया. उन्होंने तरल दूध बेचना पूरी तरह बंद कर दिया और जो भी दूध वे खरीदते थे, उसका इस्तेमाल सिर्फ पनीर बनाने में करने लगे. यही वह मोड़ था जिसने कंपनी की पक्की नींव रखी. सतीश ने महसूस किया कि कच्चा दूध बेचना एक बहुत ही मुश्किल काम है. यह जल्दी खराब हो जाता था, बाजार में बहुत कड़ा मुकाबला था और इसमें मार्जिन भी बहुत कम था. उन्होंने समझा कि दूध को पनीर जैसे उत्पादों में बदलकर उसी कच्चे माल से कहीं ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है. इसके बाद कंपनी ने दही, मक्खन, घी, चीज, योगर्ट और आइसक्रीम जैसी कई अन्य श्रेणियों में भी कदम रखा.

1997 में जब उत्पादन बढ़ा, तो सतीश ने खुदरा बाजार में उतरने की योजना बनाई. इसके लिए एक ब्रांड नाम की जरूरत थी. उन्होंने ‘मिल्की मिस्ट’ नाम चुना क्योंकि इसे बोलना और याद रखना आसान था. इसका कोई विशेष क्षेत्रीय या धार्मिक जुड़ाव भी नहीं था. 2007 में कंपनी ने अपना लोगो भी तैयार कर लिया. मांग इतनी तेजी से बढ़ी कि पनीर और अन्य उत्पादों के लिए दूध कम पड़ने लगा. ऐसे में 2005 में कंपनी ने तरल पैकेज्ड दूध का व्यापार भी पूरी तरह रोक दिया और अपना पूरा ध्यान ज्यादा मुनाफे वाले उत्पादों पर लगा दिया. आज मिल्की मिस्ट स्मार्टशेफ, कैपेला और मिस्टी लाइट जैसे ब्रांड भी चलाती है.

मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और 10 हजार करोड़ की कंपनी का सफर

डेयरी उत्पाद बहुत जल्दी खराब होते हैं, इसलिए उन्हें प्लांट से ग्राहक तक सही सलामत पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है. मिल्की मिस्ट ने इसके लिए रेफ्रिजरेटेड वाहनों और कोल्ड स्टोरेज के ढांचे पर भारी निवेश किया. कंपनी केवल दुकानदारों के फ्रिज पर निर्भर नहीं रही, बल्कि अपने उत्पादों को ठंडा रखने के लिए खुदरा दुकानों पर अपने उपकरण लगाए. साल 2010 में मिल्की मिस्ट ने पनीर के लिए अपना पहला टीवी विज्ञापन निकाला, जिसने उन्हें दक्षिण भारत के हर घर में पहुंचा दिया. 2008 से उन्होंने दक्षिण भारत में अपना लॉजिस्टिक्स मजबूत करना शुरू किया. इसके बाद 2018 में कंपनी ने ऑटोमेटेड पनीर और दही पैकेजिंग लाइन और 2019 में ऑटोमेटेड चीज प्लांट स्थापित किया.

इस पूरी मेहनत का असर कंपनी की वित्तीय स्थिति पर साफ दिखता है. साल 2024 में कंपनी की कुल कमाई 1,826.86 करोड़ रुपये थी, जो 2025 में 2,354.79 करोड़ रुपये और 2026 में 3,145.01 करोड़ रुपये तक पहुंच गई. मुनाफे की बात करें तो 2024 में 19.44 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था, जो 2025 में 46.07 करोड़ और 2026 में बढ़कर 127.01 करोड़ रुपये हो गया. अब 11 अगस्त 2026 को मिल्की मिस्ट अपना 1,553 करोड़ रुपये का आईपीओ खोलने जा रही है. इसमें 1,428 करोड़ रुपये के नए शेयर होंगे और 125 करोड़ रुपये का ऑफर फॉर सेल होगा. जो सफर एक किशोर ने 10 किलो पनीर के साथ शुरू किया था, वह आज 10,778 करोड़ रुपये के मूल्यांकन वाली एक विशाल डेयरी कंपनी में तब्दील हो चुका है.