स्वामी दयानंद सरस्वती: अंधविश्वास को तर्क से चुनौती देने वाले वो संन्यासी, जिनकी कहानी लाखों के लिए है प्रेरणा

Swami Dayanand Saraswati Jayanti Legacy Logic And Social Reform

Swami Dayanand Saraswati Jayanti 2026: हर साल 12 फरवरी को पूरा देश महर्षि दयानंद सरस्वती की जयंती मना रहा है। 19वीं सदी के उस दौर में जब भारत सामाजिक बुराइयों और गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था तब स्वामी जी ने वेदों की ओर लौटो का नारा देकर एक नई चेतना जगाई। उनकी जीवन यात्रा आज के युवाओं को तर्क और साहस का पाठ पढ़ाती है।

भारतीय पुनर्जागरण के इतिहास में महर्षि दयानंद सरस्वती एक ऐसे प्रकाश स्तंभ हैं जिन्होंने धर्म को कर्मकांडों से निकालकर तर्क की कसौटी पर कसा। गुजरात के टंकारा में 1824 में जन्मे मूलशंकर (बचपन का नाम) का महर्षि दयानंद बनने का सफर किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं है।

वो रात जिसने बदल दिया इतिहास

के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट शिवरात्रि की एक रात थी। मंदिर में उन्होंने देखा कि भगवान शिव की मूर्ति पर चढ़ाए गए प्रसाद को एक चूहा खा रहा है। बालक मूलशंकर के मन में सवाल उठा जो ईश्वर स्वयं पर चढ़े चूहे को नहीं हटा सकता वह पूरी सृष्टि की रक्षा कैसे करेगा? इस एक सवाल ने उन्हें मूर्तिपूजा और अंधविश्वास से विमुख कर सत्य की खोज में घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

तर्क का हथियार

स्वामी दयानंद केवल एक धार्मिक सुधारक नहीं थे बल्कि वे एक महान राष्ट्रवादी भी थे। उन्होंने 1857 की क्रांति से पहले ही पूरे देश का भ्रमण कर लोगों में देशभक्ति की अलख जगाई थी। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि का सबसे पहले प्रयोग स्वामी दयानंद सरस्वती ने ही किया था जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि विदेशी राज्य चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो वह स्वदेशी राज्य की तुलना में कभी सुखद नहीं हो सकता।

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समाज सुधार के क्रांतिकारी कदम

स्वामी जी ने 1875 में आर्य समाज की स्थापना की। उन्होंने उस दौर में छुआछूत, बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया जब समाज इन प्रथाओं को धर्म का हिस्सा मानता था। उन्होंने महिलाओं और दलितों की शिक्षा के लिए वेदों के द्वार खोले और सत्यार्थ प्रकाश जैसी कालजयी पुस्तक की रचना की जो आज भी तार्किक जीवन जीने का मार्ग दिखाती है।

आज के युवाओं के लिए संदेश

आज के डिजिटल युग में जहां फेक न्यूज़ और भ्रामक जानकारियों का बोलबाला है स्वामी दयानंद की तर्क शक्ति बेहद प्रासंगिक है। उन्होंने सिखाया कि किसी भी बात को सिर्फ इसलिए न मानें क्योंकि वह परंपरा है बल्कि उसे ज्ञान और तर्क की कसौटी पर परखें। ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे हैं। उनका जीवन संदेश है कि डर से नहीं बल्कि विवेक से समाज को बदला जा सकता है।

महर्षि दयानंद सरस्वती एक ऐसे संन्यासी थे जिन्होंने धर्म को कट्टरता से मुक्त कर उसे विज्ञान और नैतिकता से जोड़ा। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना असल में उस तार्किक भारत को याद करना है जिसका सपना उन्होंने 150 साल पहले देखा था।

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