
Pandit Narendra Sharma Birth Anniversary: हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में जब शब्दों की मिठास और दर्शन का संगम सुनाई देता था, तब उसके पीछे अक्सर एक नाम होता था पंडित नरेन्द्र शर्मा। उनकी लेखनी में भक्ति, प्रेम, दर्शन और भारतीय संस्कृति की गहरी छाप देखने को मिलती है। आज यानी 28 फरवरी को उनकी जयंती पर चलिए जानते हैं उनसे जुड़े कुछ खास और कम चर्चित पहलुओं के बारे में।
पंडित नरेन्द्र शर्मा का साहित्य से सिनेमा तक का सफर
दरअसल, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. करने वाले नरेंद्र शर्मा का झुकाव शुरुआत से ही लेखन की ओर था। साल 1934 में उन्होंने ‘अभ्युदय’ नामक अखबार का प्रकाशन किया, जो उनके वैचारिक व्यक्तित्व का परिचायक था। फिल्मों में उनकी शुरुआत ‘हमारी बात’ से हुई और यहीं से हिंदी सिनेमा को एक संवेदनशील गीतकार मिला।
‘सत्यम शिवम सुंदरम’ से मिली अमर पहचान
सत्यम शिवम सुन्दरम के शीर्षक गीत ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। की इस फिल्म का यह गीत सिर्फ एक धुन नहीं, बल्कि सत्य, शिव और सुंदर के दार्शनिक भावों का संगम था। इस रचना के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। गीत की गहराई आज भी श्रोताओं को आध्यात्मिक अनुभूति कराती है।
लता मंगेशकर से था आत्मीय रिश्ता
स्वर कोकिला उन्हें पिता समान मानती थीं। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि पंडित जी की सीख ने उन्हें जीवन की कठिन परिस्थितियों में संभलने की ताकत दी। यह रिश्ता सिर्फ पेशेवर नहीं, बल्कि भावनात्मक भी था।
विविध भारती और महाभारत से रहा जुड़ाव
पंडित नरेंद्र शर्मा ऑल इंडिया रेडियो की लोकप्रिय सेवा ‘विविध भारती’ के संस्थापकों में रहे। इसके अलावा वो महाभारत के वैचारिक सलाहकार भी थे और इसके लिए गीत लेखन किया। ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे हैं। यह उनका अंतिम बड़ा प्रोजेक्ट साबित हुआ।
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100 से ज्यादा फिल्मों के लिखे गीत
प्रेम रोग, सागर,‘राधा कृष्ण’, ‘अफसर’ और ‘ज्वार भाटा’ जैसी फिल्मों समेत उन्होंने 100 से अधिक फिल्मों में गीत लिखे। लगभग हर बड़े संगीतकार और गायक के साथ काम करते हुए उन्होंने हिंदी सिनेमा को कई अमर नगमे दिए। आपको बता दें कि 12 फरवरी 1989 को 76 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन उनके लिखे गीत आज भी भारतीय संगीत प्रेमियों के दिलों में गूंजते हैं। उनकी लेखनी ने साबित किया कि सिनेमा में शब्द भी आत्मा का काम करते हैं।