सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अवमानना याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि एम्स, नई दिल्ली ने 15 साल की नाबालिग लड़की के 30 हफ्ते का गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देने वाले कोर्ट के हालिया आदेश का पालन नहीं किया। यह अवमानना याचिका 24 अप्रैल के उस आदेश के बाद दायर की गई, जिसमें कोर्ट ने 15 साल की बच्ची के सात महीने से अधिक की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने कहा था कि किसी महिला को यह कहकर अनचाही गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि बच्चे को जन्म के बाद गोद दे दिया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि किसी महिला, खासकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था पूरी करने के लिए मजबूर करना उसके मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालता है और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

अनचाही प्रेग्नेंसी और मासूम उम्र, 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने का बच्ची की शारीरिक और मानसिक सेहत पर कैसा करेगा असर, डॉक्टर से जानिए
अनचाही प्रेग्नेंसी और मासूम उम्र, 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने का बच्ची की शारीरिक और मानसिक सेहत पर कैसा करेगा असर, डॉक्टर से जानिए

Birla Fertility and IVF सेंटर में स्पेशलिस्ट और सेंटर हेड डॉक्टर मुस्कान छाबरा ने बताया 15 साल की कच्ची उम्र और उसमें 7 महीने की प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने का हुक्म देना बच्ची की फिजिकल और मानसिक सेहत के लिए मुनासिब नहीं है। प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने के लिए 7 महीने तक का इंतजार काफी लम्बा समय है। डॉक्टर ने बताया 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी का मतलब है कि गर्भावस्था अपने अंतिम चरण यानी थर्ड ट्राइमेस्टर में पहुंच चुकी है। सामान्य तौर पर पूरी प्रेग्नेंसी 3840 हफ्तों की होती है, इसलिए 30 हफ्ते का गर्भ लगभग पूरी तरह विकसित अवस्था में होता है। इस समय भ्रूण के ज्यादातर अंग बन चुके होते हैं और वह कई मामलों में गर्भ के बाहर भी जीवित रह सकता है। यही वजह है कि इस स्टेज पर गर्भपात को मेडिकल रूप से जटिल और संवेदनशील माना जाता है।

30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी में शरीर की स्थिति कैसी होती है?

इस समय मां के शरीर में प्रेग्नेंसी से जुड़े लगभग सभी हार्मोनल और फिजिकल बदलाव अपने चरम पर होते हैं। प्लेसेंटा पूरी तरह विकसित हो चुका होता है और भ्रूण तेजी से बढ़ रहा होता है। कई मामलों में अगर समय से पहले डिलीवरी हो जाए , तो बच्चे को NICU में रखकर बचाया भी जा सकता है। यानी यह स्टेज ‘viability’ के बेहद करीब मानी जाती है।

24 हफ्ते के बाद गर्भपात क्यों जटिल हो जाता है?

जैसेजैसे प्रेग्नेंसी आगे बढ़ती है, भ्रूण का आकार बड़ा हो जाता है और गर्भाशय में ब्लड सप्लाई भी काफी बढ़ जाती है। इससे किसी भी मेडिकल हस्तक्षेप के दौरान भारी ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा शरीर इस समय डिलीवरी के लिए तैयार नहीं होता, इसलिए प्राकृतिक लेबर की जगह दवाइयों के जरिए लेबर को इंड्यूस करना पड़ता है, जो एक जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया हो सकती है।

टर्मिनेशन के दौरान कौनसी मेडिकल प्रक्रिया अपनाई जाती है?

इस स्टेज पर गर्भपात आमतौर पर ‘इंड्यूस्ड लेबर’ के जरिए किया जाता है। इसमें दवाइयों या जेल की मदद से सर्विक्स को सॉफ्ट और ओपन किया जाता है, ताकि डिलीवरी जैसी प्रक्रिया शुरू हो सके। अगर यह तरीका सफल नहीं होता, तो कुछ मामलों में सर्जिकल हस्तक्षेप जैसे हिस्टेरोटॉमी या सिजेरियन की जरूरत पड़ सकती है। यह प्रक्रिया सामान्य शुरुआती गर्भपात की तुलना में ज्यादा जटिल और जोखिम भरी होती है।

मां के लिए शॉर्टटर्म हेल्थ रिस्क क्या हैं?

30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी को टर्मिनेट करने पर मां को कई तरह के तात्कालिक स्वास्थ्य जोखिम हो सकते हैं। इनमें सबसे बड़ा खतरा भारी ब्लीडिंग का होता है, जिसके लिए ब्लड ट्रांसफ्यूजन तक की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा इंफेक्शन , गर्भाशय को नुकसान, और कुछ मामलों में लेबर का इंड्यूस न होना भी बड़ी समस्या बन सकता है, जिससे सर्जरी करनी पड़ सकती है।

लॉन्गटर्म हेल्थ रिस्क क्या हो सकते हैं?

अगर प्रक्रिया के दौरान जटिलताएं होती हैं, तो इसका असर भविष्य की प्रेग्नेंसी पर पड़ सकता है। जैसे गर्भाशय पर स्कार यानी निशान बनना, जिससे आगे चलकर नॉर्मल डिलीवरी में दिक्कत आ सकती है। इंफेक्शन की वजह से फर्टिलिटी पर भी असर पड़ने का खतरा रहता है। हालांकि यह जोखिम हर केस में नहीं होता और यह काफी हद तक मेडिकल मैनेजमेंट पर निर्भर करता है।

15 साल में यह जोखिम क्यों और बढ़ जाता है?

कम उम्र की लड़कियों में शरीर पूरी तरह विकसित नहीं होता, खासकर पेल्विस संकरी हो सकती हैं। इससे डिलीवरी या इंड्यूस्ड लेबर के दौरान जटिलताएं बढ़ जाती हैं। इसके अलावा, इस उम्र में मानसिक और भावनात्मक परिपक्वता भी नहीं होती, जिससे ऐसी स्थिति का सामना करना उनके लिए और ज्यादा कठिन हो जाता है।

क्या ऐसे मामलों में डॉक्टर तुरंत अनुमति दे देते हैं?

मेडिकल और एथिकल दोनों ही नजरिए से यह ग्रे ज़ोन होता है। डॉक्टर हर केस में मां और भ्रूण दोनों के स्वास्थ्य जोखिमों को ध्यान में रखकर फैसला लेते हैं। आमतौर पर ऐसे मामलों में मल्टीडिसिप्लिनरी टीम की सलाह ली जाती है और कोर्ट की अनुमति भी अहम भूमिका निभाती है।

इस स्थिति से बचने का सबसे अहम तरीका क्या है?

एक्सपर्ट्स के अनुसार, सबसे जरूरी है कि ऐसी स्थिति तक पहुंचने ही न दिया जाए। इसके लिए सेक्स एजुकेशन, कॉन्ट्रासेप्शन की जानकारी और समय पर मेडिकल सलाह बेहद जरूरी है। अगर प्रेग्नेंसी हो भी जाए, तो शुरुआती चरण में सुरक्षित और सरल तरीके से टर्मिनेशन संभव होता है, जिससे जटिलताओं का जोखिम काफी कम हो जाता है।

मानसिक और भावनात्मक असर कितना गंभीर हो सकता है?

फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया इतनी एडवांस स्टेज पर गर्भपात कराना मानसिक रूप से बेहद कठिन अनुभव हो सकता है। एक तरफ अनचाही प्रेग्नेंसी का तनाव, और दूसरी तरफ इतने समय तक गर्भ में रहे भ्रूण को खोने का दुख दोनों मिलकर गंभीर भावनात्मक ट्रॉमा पैदा कर सकते हैं। खासकर नाबालिगों में डिप्रेशन, एंग्जाइटी और लंबे समय तक मानसिक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

इतनी कम उम्र में गर्भावस्था और फिर उसका टर्मिनेशन दोनों ही बड़े मानसिक आघात की तरह होते हैं। शुरुआत में बच्ची को डर, घबराहट और असुरक्षा महसूस हो सकती है। उसे यह समझना मुश्किल होता है कि उसके साथ क्या हो रहा है, जिससे उसकी मानसिक स्थिति अस्थिर हो सकती है।

शारीरिक कमजोरी और दर्द भी बच्ची पर मानसिक तनाव को बढ़ाते हैं। यह समय भावनात्मक रूप से बहुत संवेदनशील होता है, जहां उसे लगातार सहारे की जरूरत होती है। ऐसी स्थिति में बच्ची पर लॉग टर्म इफेक्ट जैसे उदासी, डिप्रेशन, एंग्जायटी या पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर जैसी समस्याओं का शिकार हो सकती है। यह अनुभव उसके लिए एक गहरे ट्रॉमा की तरह होता है, जिससे उबरने में महीनों या कभीकभी सालों तक का समय लग सकता है। इतनी कम उम्र में मां बनने की जिम्मेदारी, सामाजिक दबाव और भविष्य को लेकर चिंता, ये सभी मिलकर लंबे समय तक मानसिक तनाव पैदा कर सकते हैं।

बच्ची कैसे इस तनाव से उभरे

समाज और परिवार का व्यवहार इस स्थिति में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर बच्ची को सपोर्ट और समझ मिले, तो वह इस ट्रॉमा से बेहतर तरीके से उबर सकती है। वहीं, नकारात्मक प्रतिक्रिया या जजमेंट उसकी सेल्फएस्टीम को नुकसान पहुंचा सकती है और मानसिक समस्याएं बढ़ा सकती है। बच्ची के लिए सही समय पर काउंसलिंग, साइकोलॉजिस्ट से मदद और परिवार का भावनात्मक समर्थन बहुत जरूरी होता है। नियमित बातचीत, सुरक्षित माहौल और देखभाल से बच्ची धीरेधीरे सामान्य जीवन की ओर लौट सकती है।

सबसे जरूरी है जागरूकता। बच्चों और किशोरों को सेक्स एजुकेशन, कॉन्ट्रासेप्शन और उनके परिणामों के बारे में सही जानकारी देना बेहद जरूरी है। इससे अनचाही प्रेग्नेंसी और उससे जुड़े मानसिक व शारीरिक जोखिमों को काफी हद तक रोका जा सकता है।

डिस्क्लेमर

यह जानकारी विशेषज्ञों की राय और सामान्य मेडिकल जानकारी पर आधारित है। हर केस अलग होता है, इसलिए किसी भी स्थिति में स्वयं निर्णय लेने के बजाय योग्य डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।