हिमाचली खबर: Barrister Asaf Ali: उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के ऐतिहासिक कस्बे स्योहारा ने देश को कई गौरवशाली व्यक्तित्व दिए हैं. इनमें बैरिस्टर आसफ अली का नाम भी है. साल 1909 से 1914 तक लंदन में रहकर उन्होंने कानून की पढ़ाई की और बैरिस्टर की उपाधि हासिल की. भारत लौटने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की, लेकिन देश में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया. उन्होंने आरामदायक जीवन छोड़कर खुद को पूरी तरह आजादी की लड़ाई के लिए समर्पित कर दिया. महात्मा गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ मिलकर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई.

आजाद हिंद फौज के सैनिकों का लड़ा केस, भगत सिंह के खास… कौन थे बिजनौर के आसफ अली, जिनकी वकालत से कांपते थे अंग्रेज?​
आजाद हिंद फौज के सैनिकों का लड़ा केस, भगत सिंह के खास… कौन थे बिजनौर के आसफ अली, जिनकी वकालत से कांपते थे अंग्रेज?​

11 मई 1888 को स्योहारा की मिट्टी में जन्मे आसफ अली ने अपनी शुरुआती शिक्षा स्थानीय स्कूलों से प्राप्त की. बचपन से ही वे तेज बुद्धि और राष्ट्रप्रेम की भावना से ओतप्रोत थे. आगे की पढ़ाई के लिए वे दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफन कॉलेज पहुंचे. उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कानून के क्षेत्र में करियर बनाने का निर्णय लिया और बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैंड के लंदन चले गए.

भगत सिंह ने जताया था भरोसा

आसफ अली का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे चर्चित मुकदमों में शामिल सेंट्रल असेंबली बम कांड से भी जुड़ा है. 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अंग्रेजी हुकूमत को जगाने के लिए दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका था. गिरफ्तारी के बाद जब उन पर मुकदमा चला, तब भगत सिंह ने बैरिस्टर आसफ अली पर भरोसा जताया. आसफ अली ने अदालत में बटुकेश्वर दत्त का पक्ष मजबूती से रखा और अंग्रेजों की कानूनी चालों का डटकर सामना किया. मुकदमे की तैयारी के लिए वे कई बार जेल जाकर भगत सिंह से मिले. इस दौरान उनकी पत्नी अरुणा आसफ अली ने भी क्रांतिकारियों की गुप्त रूप से सहायता की. बाद में अरुणा आसफ अली दिल्ली की पहली मेयर बनीं और स्वतंत्रता आंदोलन की बड़ी नेता के रूप में उभरीं.

आसफ अली ने केवल भगत सिंह ही नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के अधिकारियों की भी अदालत में पैरवी की. जब कर्नल प्रेम सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लन और मेजर जनरल शाहनवाज खान पर लाल किले में राजद्रोह का मुकदमा चला, तब आसफ अली ने निर्भीकता से उनका पक्ष रखा. इस मुकदमे ने पूरे देश में स्वतंत्रता की भावना को और मजबूत किया.

मंत्री से लेकर राज्यपाल तक का सफर

आजादी के बाद भी आसफ अली ने देश सेवा का कार्य जारी रखा. वे संविधान सभा के सदस्य बने और स्वतंत्र भारत की पहली अंतरिम सरकार में रेलवे और परिवहन मंत्री का दायित्व संभाला. इसके अलावा उन्हें अमेरिका में स्वतंत्र भारत का पहला राजदूत बनने का सम्मान भी मिला. उन्होंने भारत और अमेरिका के संबंधों को मजबूत आधार दिया. बाद में वे ओडिशा के राज्यपाल भी बने.

साल 1953 में स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में भारत के राजदूत रहते हुए उनका निधन हो गया. देश ने उनके योगदान को हमेशा याद रखा. दिल्ली की प्रमुख सड़क आसफ अली रोड उनके सम्मान में नामित की गई और भारत सरकार ने 1989 में उनके नाम पर डाक टिकट जारी किया. स्योहारा का यह महान सपूत आज भी देशभक्ति, साहस और न्यायप्रियता का प्रतीक माना जाता है.