हिमाचली खबर: 20 मई 1991 की सुबह दिल्ली में अपने बूथ पर वोट डालने के लिए सोनिया के साथ राजीव गांधी कार खुद ड्राइव करते हुए गए. दिन की शुभ शुरुआत की कामना के साथ पार्टी का एक वर्कर पूजा की थाली के साथ उनकी ओर बढ़ा. सशंकित सोनिया का घबराहट में थाली पर हाथ लगा और थाली नीचे गिर उलट गई. इस अपशकुन ने सोनिया को इतना विचलित किया कि बिना वोट दिए ही वापसी के लिए वे सोचने लगीं. राजीव ने उनके लिए पानी मंगाकर धैर्य बंधाया.

उसी शाम राजीव गांधी की जल्दी घर वापसी ने सोनिया, प्रियंका को खुश किया था. लेकिन उन्हें फिर वापस जाना था. यह चुनाव प्रचार का आखिरी चरण था. सोनिया ने उनसे पूछा था कि क्या रुक नहीं सकते? राजीव ने मुस्कराते हुए विदा ली थी. कहा था कि सिर्फ दो दिन की बात है. फिर हम साथ होंगे. दुर्भाग्य से उनकी वापसी तिरंगे में लिपटे ताबूत में हुई. 21 मई को श्रीपेरंबदूर में लिट्टे उग्रवादियों के बम हमले में 46 साल के राजीव का शव इतना क्षत विक्षत हो गया था कि डॉक्टर मुश्किल से उसे रुईपट्टियों की मदद से आकार दे सके थे. लिट्टे को उनसे क्या नाराजगी थी, जिसके चलते उनकी जान ले ली? पुण्यतिथि पर पढ़िए इसकी अंतर्कथा.
श्रीलंका की अशांतिभारत के लिए चुनौती
आठवें दशक में श्रीलंका की बिगड़ती स्थिति के बीच भारत दोहरी चुनौती का सामना कर रहा था. एक ओर वहां अन्य विदेशी ताकतों के मजबूत होने से भारत के लिए खतरा बढ़ रहा था. दूसरी ओर भारत की तामिल आबादी के बीच श्रीलंका की घटनाओं को लेकर नाराजगी चरम पर थी. जातीय हिंसा की लपटें श्रीलंका को घेरे हुए थीं. वहां की सिंहली बहुमतवर्चस्व की सरकार से अल्पसंख्यक तामिल आबादी को अपनी उपेक्षा और शोषण की जबरदस्त शिकायत थी. विरोध में उन्होंने श्रीलंका के उत्तर और पूर्वी हिस्से में पूर्ण स्वायत्तता वाले “तामिल ईलम” के लिए सशस्त्र आंदोलन छेड़ रखा था.
सोनिया गांधी ने राजीव को श्रीपेरंबदूर जाने से पहले रोका था. फोटो: Getty Images
दिनोंदिन मजबूत होते लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तामिल ईलम ने स्वतंत्र तामिल देश की बात भी शुरू कर दी थी. उनकी सोच के नक्शे में श्रीलंका के तामिल आबादी वाले इलाकों के साथ ही भारत की तामिल आबादी का भूभाग भी शामिल था. सत्ता में आने पर राजीव इस चुनौती से रूबरू थे. श्रीलंका सेना के तीव्र हमलों के बीच तामिल शरणार्थियों के हुजूम भारत में प्रवेश कर रहे थे. हजारों शरणार्थियों के सिर्फ खानेरहने की ही समस्या नहीं थी. यह आशंका प्रबल थी कि तमिलों का यह असंतोष पृथक तामिलनाडु की मांग के साथ देश की एकताअखंडता के लिए खतरा बन सकता है.
श्रीलंका समस्या का राजीव चाहते थे जल्दी हल
नवंबर 1986 में बेंगलुरू में आयोजित सार्क सम्मेलन में श्रीलंका के राष्ट्रपति जे.आर.जयवर्धने भारत के सामने मुश्किल हालत पैदा कर दिए. अपने भाषण में जयवर्धने ने कहा कि गांधीनेहरू की धरती पर वे अपने स्वागत से अभिभूत हैं और आज वे जो भी बोलेंगे उसे दिल से बोलेंगे. पर आगे वे जो कुछ बोले, वह भारत को असहज करने वाला था.
जयवर्धने ने भारत पर श्रीलंका के तामिल उग्रवादियों को सहायता संरक्षण का आरोप लगाया और फूट पंचशील संधि की याद दिलाई जो अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की प्रतिबद्धता बताती है. जवाब में राजीव गांधी ने जयवर्धने को आश्वस्त किया कि भारत श्रीलंका की अखंडता, संप्रभुता का सम्मान करता है. वह स्वतंत्र ईलम का समर्थन नहीं करता लेकिन वहां की तामिल आबादी की समस्याओं का समाधान और उनकी इच्छाओं का आदर जरूरी है.
राजीव की सरकार में विदेश राज्यमंत्री रहे कुंवर नटवर सिंह ने अपनी किताब One Life Is Not Enough में लिखा है कि श्रीलंका की जातीय समस्या के निपटारे के लिए राजीव गांधी बहुत जल्दी में थे. नटवर सिंह के मुताबिक राजीव गांधी ने जयवर्धने से इस सिलसिले में कई मुलाकातें कीं. हालांकि नटवर सिंह का आकलन था कि श्रीलंका की जातीय समस्या के इतिहास से राजीव गांधी बहुत परिचित नहीं थे.
चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी और सोनिया गांधी.
भारत की कोशिशें श्रीलंका की जनता को थीं नापसंद
श्रीलंका में बढ़ती अशांति के बीच भारत सरकार ने वहां के लिए मानवीय सहायता की पेशकश की. लेकिन समुद्री रास्ते से भेजी गई सामग्री को श्रीलंका ने नौकाएं रोक कर वापस भेज दिया. फिर भारत ने फाइटर विमानों के संरक्षण में हवाई रास्ते से तामिल इलाकों में सहायता सामग्री गिराई. भारत की स्पष्ट चेतावनी थी कि इन्हें रोके जाने का मतलब युद्ध को निमंत्रण होगा. श्रीलंका को भारत के इस कदम पर सख्त ऐतराज था और उसने अपनी नाराजगी जाहिर की.
इस खींचतान के बीच दोनों देशों के प्रतिनिधियों की मुलाकातों का सिलसिला चलता रहा. समझौते के एक ड्राफ्ट पर सहमति बनी. इस ड्राफ्ट के अनुसार श्रीलंका प्रांतों को सत्ता का हस्तांतरण करना था. उत्तरीपूर्वी प्रांतों का जनमत संग्रह के अधीन विलय और तामिल भाषा को आधिकारिक दर्जा, श्रीलंका की सेना के उत्तरी प्रायद्वीप में आपरेशन बंद कर बैरकों में वापसी और तामिल उग्रवादियों के हथियार समर्पण के वादे के साथ ही भारत द्वारा अलगाववादी ताकतों को समर्थन न देने के आश्वासन ड्राफ्ट का हिस्सा थे.
श्रीलंका में भारतीय सेना भेजने का राजीव का फैसला
भारत और श्रीलंका के बीच 29 जुलाई 1987 को समझौता हुआ. लेकिन इस समझौते को लेकर श्रीलंका में नाराजगी का यह आलम था कि कोलंबो हवाई अड्डे पर उतरने के बाद सड़क मार्ग से राजीव का शहर में प्रवेश संभव नहीं हो सका. हजारों लोगों ने रास्ते जाम कर रखे हैं. जगह जगह आगजनी हुई थी. राष्ट्रपति जयवर्धने की निजी संपत्तियां भी आग के हवाले कर दी गईं थीं. विरोध करने वालों में प्रधानमंत्री प्रेमदासा, मंत्री और श्रीमावो भंडारनायके सहित समूचा विपक्ष शामिल था.
राजीव गांधी और उनके दल को हेलीकॉप्टरों से कार्यक्रम स्थल तक ले जाया गया था. नटवर सिंह के अनुसार लंच के दौरान राजीव गांधी ने उन्हें बताया था कि राष्ट्रपति जयवर्धने का कहना है कि श्रीलंका की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए अगर तुरंत भारतीय सेना यहां सहायता के लिए नहीं पहुंचती तो आज रात ही उनकी सरकार का तख्ता पलट हो सकता है. अगले क्षण नटवर सिंह यह जान कर चकित रह गए कि राजीव गांधी तुरंत भारतीय सेना के श्रीलंका कूच का आदेश पहले ही दे चुके हैं. यह जानकारी मिलने पर साथ हुए विदेश मंत्री नरसिंह राव भी काफी परेशान हुए लेकिन अपने स्वभाव के अनुसार उन्होंने राजीव गांधी से कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा.
राजीव गांधी 21 मई को रात आठ बजे तामिलनाडु पहुंचे.
एसपीजी ने गार्ड ऑफ ऑनर में शामिल न होने की दी थी सलाह
अगला दिन बेहद बुरा था. 30 जुलाई को गार्ड ऑफ ऑनर के दौरान श्रीलंकाई नौसैनिक विजिथा रोहन विजेमुनि ने राइफल के बट से प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर हमला कर दिया. जेवियर मोरो ने सोनिया गांधी पर केन्द्रित अपनी किताब “द रेड साड़ी” में लिखा है कि सिंहली बहुमत को इस समझौते से जबरदस्त नाराजगी थी और उन्होंने इसका हिंसात्मक विरोध पहले ही शुरू कर दिया था.
राजीव से एस.पी.जी. ने अनुरोध किया था कि वे गार्ड ऑफ ऑनर में न जाएं, क्योंकि वहां खतरा हो सकता है. राजीव ने इस सलाह को दरकिनार किया. मिलिट्री बैंड की धुन के बीच सेना की सलामी ले रहे राजीव पर नौसैनिक विजिथा रोहन विजेमुनि ने राइफल के बट से प्रहार किया. उसका निशाना राजीव के सिर पर था. लेकिन उसको हमले के लिए बढ़ता देख राजीव कुछ झुक गए थे और यह प्रहार उन्होंने कंधे पर झेला था. तुरंत तो नहीं लेकिन वापसी में हवाई जहाज में राजीव ने इस चोट से राहत के लिए डॉक्टर की मदद ली थी. जेवियर मोरो ने सोनिया गांधी को उद्धृत किया है , “काफी दिनों तक राजीव न अपना कंधा हिला पाते थे और न ही बाएं करवट सो पाते थे.
सेना भेजने का फैसला: सिंहली, तामिल दोनों नाराज
श्रीलंका में शांति स्थापना के लिए भारतीय सेना को भेजने का फैसला काफी महंगा साबित हुआ. भारत के चीफ ऑफ आर्मी स्टॉफ दो हफ्ते के भीतर वहां शांति स्थापना की उम्मीद लगाए हुए थे. शांति सेना का उद्देश्य गुरिल्ला लड़ाई में लगे उग्रवादियों से हथियार समर्पित कराना था. लेकिन यह ऐसा अभियान था, जिससे सिंहली और तामिल दोनों ही नाराज थे.
सिंहली बहुमत को अपनी प्रभुसत्ता में भारत की दखल से ऐतराज था. दूसरी ओर लिट्टे के तामिल लड़ाके, जिन्हें अब तक भारत का समर्थक माना जाता था, वे अब श्रीलंका के साथ भारतीय सेना से साझा दुश्मन के तौर पर मुक़ाबिल थे. धीरे धीरे भारत को वहां अपने सत्तर हजार से अधिक सैनिक भेजने पड़े. भारतीय सैनिकों को जाफना की भौगोलिक स्थितियों और लिट्टे उग्रवादियों के छिपने के ठिकानों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.सेना को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी. लगभग बारह सौ भारतीय सैनिकों का बलिदान हुआ. 1989 के चुनाव में राजीव गांधी सत्ता से बाहर हो गए. अगली वीपी सिंह की सरकार का कार्यकाल संक्षिप्त था. उसी सरकार के समय 1990 में अंतिम तौर पर भारतीय सेना की श्रीलंका से वापसी हुई. बेशक राजीव गांधी अब सत्ता में नहीं थे. लेकिन दुर्भाग्य से वे लिट्टे उग्रवादियों के निशाने पर थे.
सत्ता में वापसी के लिए 1991 में राजीव ने पूरी ताकत झोंकी
महज डेढ़ साल के अंतराल पर 1991 के चुनाव में राजीव गांधी के लिए सत्ता में वापसी की गुंजाइश थी. विश्वनाथ प्रताप सिंह की भाजपा और कम्युनिस्टों के समर्थन पर टिकी जनता दल की सरकार की महज ग्यारह महीने के भीतर विदाई हो गई . अगली चंद्रशेखर सरकार को कांग्रेस ने सिर्फ चार महीने समर्थन दिया. केंद्र में साझा सरकार का पहला प्रयोग बुरी तरह विफल हुआ था.
राजीव को उम्मीद थी कि वोटर इस सच को समझेंगे कि केवल कांग्रेस ही स्थिर सरकार दे सकती है. जीत के लिए चुनाव प्रचार में राजीव गांधी ने पूरी ताकत झोंक दी थी. आत्मविश्वास से भरे राजीव ने 20 मई की सुबह वोट डालने के लिए निकलते समय कार की स्टीयरिंग खुद संभाली. बगल में सोनिया बैठी हुई थीं. मतदान स्थल पर स्वागत के लिए पार्टी वर्कर मौजूद थे. उन्हीं में एक वर्कर अपने नेता और पार्टी की जीत की कामना के साथ पूजा की थाली लेकर आगे बढ़ा. सोनिया न जाने किस आशंका में सामान्य नहीं थीं. उनका हाथ थाली पर लगा और पूजा सामग्री साथ थाली नीचे पलट गई. किसी अपशकुन की आशंका में सोनिया इतनी परेशान हो गईं कि बिना वोट दिए वापस चलने को कहने लगीं. राजीव ने उन्हें एक गिलास पानी देकर और फिर हाथ थाम सामान्य किया.
सुरक्षा के बीच एक महिला धनु राजीव के पैरों की ओर झुकी, राजीव उसे रोक रहे थे और फिर महाभयंकर विस्फोट हुआ.
मौत खींच ले गई श्रीपेरंबदूर
20 मई की शाम चुनाव प्रचार से राजीव जल्दी ही घर वापस आ गए थे. अमेरिका में रह रहे राहुल से फोन पर बात कर उन्होंने इम्तहान में कामयाब होने के लिए शुभकामनाएं दीं. बेटी प्रियंका को प्यार किया. जल्दी ही अगले दौरे के लिए निकलने की उनकी तैयारी थी.
जेवियर मोरो ने लिखा, “सोनिया ने उनसे पूछा, “क्या तुम अभी रुक नहीं सकते? इस एक यात्रा से चुनाव पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला.” राजीव ने सोनिया का हौसला बढ़ाया, “मैं जानता हूं. लेकिन सारी तैयारियां हो चुकी हैं. बस एक बार और हो आऊं. फिर दोबारा हम शिखर पर होंगे. सिर्फ दो दिन की बात है. फिर हम साथ होंगे.” 21 मई को दिन में राजीव ने उड़ीसा में कई सभाएं कीं. शाम तक वे काफी थक गए थे. मन में आया कि श्रीपेरंबदूर की रात की आखिरी रैली रद्द कर दें. इंटेलिजेंस ब्यूरो ने भी लिट्टे के प्रभाव क्षेत्र के इलाके में रात में सभा न करने की सलाह दी थी. फिर उन्हें उन वर्करों और पब्लिक की याद आई, जो उनका इंतजार कर रही होगी.
थकावट और भूख के बीच वे विमान में बैठे. कुछ खाया. तभी विमान में कुछ यांत्रिक खराबी की खबर मिली. राजीव उतरकर एक एंबेसडर कार से डाक बंगले की ओर रवाना हो ही रहे थे कि एक पुलिस वाले ने विमान ठीक होने की खबर दी. मौत उन्हें अपनी ओर खींच रही थी. फिर से वे विमान में सवार हुए. रात आठ बजे वे तामिलनाडु पहुंचे.
न्यूयार्क टाइम्स की संवाददाता बारबरा क्रोसेटो उनके दौरे को कवर कर रही थीं. उन्होंने पाया कि भीड़ राजीव की ओर उमड़ रही थी. सुरक्षाकर्मी बीच में आते लेकिन राजीव उन्हें दूर कर देते थे. दो घंटे की देरी से श्रीपेरंबदूर की आखिरी सभा में एक महिला पुलिस अफसर ने राजीव की ओर बढ़ती महिला धनु को रोकने की कोशिश की थी. राजीव ने कहा आने दो. सब ठीक है. फिर वह पुलिस अफसर पीछे हट गई. धनु राजीव के पैरों की ओर झुकी. राजीव उसे रोक रहे थे. फिर महाभयंकर विस्फोट हुआ.
साथी और सहयोगी सुमन दुबे, जब पीछे मुड़े तो देखा, “लोग हवा में उड़ रहे हैं. जैसे स्लो मोशन की फिल्म हो.” सुमन ने बताया , ” मैं किसी सफेद चीज की तलाश कर रहा था. क्योंकि राजीव सफेद पोशाक पहनते थे. मुझे वहां सब काला और जला हुआ दिखाई दे रहा था.” हमले में राजीव का शव इतना क्षतविक्षत हो गया था कि डॉक्टर मुश्किल से उसे रुईपट्टियों की मदद से आकार दे सके थे. 46 साल के राजीव का शव इतना क्षतविक्षत हो गया था कि डॉक्टर मुश्किल से उसे रुईपट्टियों की मदद से आकार दे सके थे.


