राजस्थान हाईकोर्ट के चर्चित फैसले ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है. कोर्ट ने कहा कि यदि विवाह कानूनी रूप से वैध है और शादी के समय पति-पत्नी दोनों बालिग थे, तो ऐसे मामलों में पति पर रेप की धारा लगाना कानून के दुरुपयोग की श्रेणी में आ सकता है. जस्टिस अनूप कुमार ढांड की एकल पीठ ने दो मामलों में दर्ज दुष्कर्म के मुकदमे खारिज करते हुए टिप्पणी की कि इस तरह के मुकदमे “फैशन” बनते जा रहे हैं, जिससे अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है.

कानून को हथियार बनाना बंद करो, बालिग पत्नी से संबंध रेप नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला दिया है जिसकी चर्चा देश तमाम राज्य उच्च न्यायालयों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक हो रही है. गजेंद्र मौर्या बनाम राज्य (Gajendra Maurya Vs State of Rajasthan and others) मामले में सबको चौंकाने वाला यह फैसला, राजस्थान उच्च न्यायालय के जस्टिस अनूप कुमार ढांड (Justice Anoop Kumar Dhand, Rajasthan High Court) की एकल पीठ ने सुनाया है. मामले की सुनवाई के के बाद फैसले में न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढांड ने लिखा है, “यदि विवाह कानूनी रुप से वैध है. विवाह के वक्त पत्नी बालिग रही हो. तब ऐसे में पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 यानी दुष्कर्म-बलात्कार का मामला तो बनता ही नहीं है.”

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एकल पीठ ने इस अहम मुकदमे की सुनवाई के दौरान दो अलग अलग मामलों में दर्ज रेप (बलात्कार-दुष्कर्म) ही न केवल रद्द (खारिज) कर दिया है. अपितु उन्होंने यहां तक कहा कि ‘इस तरह के मामलों में मुकदमे दर्ज कराया जाना एक फैशन बनता जा रहा है. इसी तरह के वाहियात के मुकदमों से देश की अदालतों के ऊपर बे-वजह का बोझ बढ़ता जा रहा है. इसी बोझ के चलते जरूरी मुकदमों की सुनवाई प्रभावित होती है.

‘विवाह सिर्फ समझौता नहीं, एक पवित्र बंधन’

फैसला सुनाने वाले एकल पीठ के न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढांड ने “विवाह की विशिष्टता’ बताते हुए लिखा है अगर शिकायतकर्ता और आरोपी ‘समझौते पर पहुंच जाते हैं’ तो उनके फैसले को बलात्कार के आरोपों को रद्द करने के लिए मिसाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. राजस्थान हाईकोर्ट की इस एकल पीठ ने मामले की सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय के दो फैसलों का भी जिक्र किया जिनमें से प्रत्येक में महिला और पुरुष के विवाह के बाद पुरुष के खिलाफ बलात्कार के आरोप हटा दिए गए थे. विवाह दो विपरीत-लिंगी व्यक्तियों के बीच पवित्र बंधन माना जाता है. जो शारीरिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक बंधनों से कहीं ज्यादा ऊपर है.

प्राचीन हिंदू कानूनों के अनुसार, विवाह और उसके अनुष्ठान ‘अर्थ'(अधिकार),’धर्म’ (कर्तव्य) तथा ‘काम’ (शारीरिक इच्छा) की पूर्ति के लिए किए जाते हैं. विवाह एक रस्म से कहीं अधिक है जिसे याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखकर नष्ट होने की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती. मुकदमे में इन आरोपों पर अब और आगे बढ़ने से दंपत्ति की वैवाहिक जिंदगी में बाधा पड़ना तय है.’

महिला ने लगाया था शादी का वादा कर संबंध बनाने का आरोप

हाईकोर्ट में पेश मामले के मुताबिक, महिला ने ब-जरिए वकील शिकायत की थी कि उसने आरोपी द्वारा किए गए शादी के वायदे पर विश्वास करने के बाद ही उसके साथ (अब दुष्कर्म का आरोपी और पति दोनो रिश्ते) शारीरिक संबंध बनाए थे. जबकि शिकायतकर्ता महिला के गर्भवती होने के बाद आरोपी ने कथित तौर पर गर्भपात करने के बाद पीड़िता से कोई संबंध आगे नहीं रखा था.

इस चर्चित मुकदमे में आ चुके राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के मुताबिक, “यदि शादी के समय पति-पत्नी दोनो बालिग थे. तो उसके बाद पति के खिलाफ दर्ज कराया गया रेप-दुष्कर्म का मुकदमा, बलात्कार के लिए बने कानून का सरासर दुरुपयोग ही माना, कहा या समझा जाएगा. जोकि कदापि सही नही है.” इस फैसले के चर्चाओं में आने की वजह यह भी है कि क्योंकि आजकल वास्तव में रेप के झूठे मुकदमों की देश की अदालतों में बाढ़ सी आई हुई है. हजारों दुष्कर्म के ऐसे मुकदमे भी हैं जिनके चलते Marital Rape Law ही मुसीबत में फंसा दिखाई देता है.

हालांकि इस फैसले से समाज में दो तरह की बहस भी छिड़ चुकी है. पहली, कई लोग इसे झूठे रेप मुकदमों को रोकने के लिए सख्त फैसला और मील का पत्थर मान रहे हैं. जबकि दूसरी ओर महिला अधिकारों और महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ने वाला वर्ग इस फैसले पर सवालिया निशान लगा रहा है यह कहकर कि यह तो महिला अधिकारों का संवैधानिक और सामाजिक दृष्टि से दोहन या कहिए हनन है. जोकि नहीं होना चाहिए. फिलहाल यह फैसला जितना चर्चा में है. उससे कहीं ज्यादा इस फैसले ने समाज को बहस का एक ज्वलंत विषय या मुद्दा तो हाल-फिलहाल दे ही दिया है.

यहां विशेष रुप से उल्लेखनीय है कि यह चर्चित फैसला देने वाले न्यायमूर्ति ने ही जून 2024 में राजस्थान हाईकोर्ट में ही एक बेहद संवेदनशील मुकदमे की सुनवाई की थी. जिसमें टिप्पणी करते हुए इसी कोर्ट ने कहा था कि ‘लड़की के अंडरगार्मेंट्स उतारना और खुद के कपड़े भी उतारना रेप करने का प्रयास नहीं माना जाएगा. लड़की का इनरवियर उतारना IPC की धारा 376 के साथ धारा 511 के तहत रेप करने का प्रयास नहीं है. हां, यह धारा 354 के तहत महिला की शील भंग करने का अपराध माना जाएगा.’ तब भी देश में इस फैसले पर खूब चर्चा ही नहीं हुई अपितु हो-हल्ला भी मचा था.