हिमाचली खबर: पीने का पानी सिर्फ साफ दिखना ही काफी नहीं होता, बल्कि उसका टीडीएस लेवल सही होना भी बेहद जरूरी है। अगर पानी का टीडीएस बहुत ज्यादा या बहुत कम हो, तो यह सेहत पर बुरा असर डाल सकता है। इसलिए हेल्दी रहने के लिए सही टीडीएस वाला पानी पीना जरूरी माना जाता है। आइए जानते हैं टीडीएस का क्या मतलब है और पीने के पानी का सही टीडीएस कितना होना चाहिए?

पीने के पानी का TDS कितना होना चाहिए? जानें कैसे करें सही गुणवत्ता की पहचान?​
पीने के पानी का TDS कितना होना चाहिए? जानें कैसे करें सही गुणवत्ता की पहचान?​

टीडीएस का क्या मतलब है?

टीडीएस का मतलब पानी में घुले हुए पदार्थों की कुल मात्रा है, जो Total Dissolved Solids को दिखता है। इसमें कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे खनिज, सोडियम और क्लोराइड जैसे पदार्थ शामिल होते हैं। यह प्राकृतिक स्रोतों या प्रदूषण दोनों से पानी में मिल सकते हैं।

पानी का टीडीएस कितना होना चाहिए?

पीने के पानी का टीडीएस 50 से 150 ppm के बीच हो तो उसे अच्छा माना जाता है। वहीं 300 ppm तक का पान भी सामान्य तौर पर सुरक्षित माना जाता है। 300 ppm से ज्यादा टीडीएस होने पर पानी का स्वाद बदल सकता है और यह सेहत के लिए सही नहीं माना जाता। 500 ppm से अधिक TDS वाला पानी लंबे समय तक पीना नुकसानदायक हो सकता है। 

ज़्यादा टीडीएस वाला पानी में मौजूद क्लोराइड और सल्फेट पाइप और उपकरणों में जंग लगने का कारण बनते हैं। इससे प्लंबिंग और उपकरणों में पपड़ी भी जम सकती है, जिससे कार्यक्षमता और जीवनकाल कम हो जाता है।

पानी की गुणवत्ता की पहचान कैसे करें?

  • टीडीएस मीटर का इस्तेमाल करें: घर पर आसानी से मिलने वाला TDS मीटर पानी की गुणवत्ता जांचने का सबसे आसान तरीका है।

  • पानी का स्वाद जांचें: बहुत ज्यादा खारा, कड़वा या अजीब स्वाद वाला पानी खराब गुणवत्ता का संकेत हो सकता है।

  • पानी की गंध पर ध्यान दें: अगर पानी से बदबू या केमिकल जैसी स्मेल आए तो उसे पीने से बचें।

  • RO और नॉर्मल पानी में फर्क समझें: RO पानी का TDS बहुत कम हो सकता है, इसलिए जरूरत से ज्यादा फिल्टर किया हुआ पानी हमेशा बेहतर नहीं होता।

  • पानी का रंग देखें: अगर पानी पीला या धुंधला दिखे तो उसकी जांच जरूर कराएं।